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Thursday, 11 June 2009

‘‘ईमानदारी आज भी जिन्दा है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

दो दिन पूर्व की बात है। मन हुआ कि आज सब्जी मण्डी से अपने मन की सब्जियाँ लाई जायें।

शाम को सात बजे के लगभग मैं सब्जी मण्डी गया। साथ में मेरा 10 वर्षीय पौत्र प्रांजल भी था। मैंने एक ही दूकान से 100रु0 की कुछ सब्जियाँ ले लीं और दुकानदार को पैसे देकर चलता बना।

मैं अपने स्कूटर के पास तक पहुँचा ही था कि सब्जीवाले का लड़का दौड़ता हुआ आया और कहने लगा- ‘‘बाबू जी! आपको मेरे पापा बुला रहे हैं।’’

मैं जब दुकानदार के पास गया तो उसने कहा- ‘‘बाबू जी! आप पाँच सौ का नोट दे गये थे। ये चार सौ रुपये आपके रह गये है।’’

हुआ यों था कि मैंने भूल से उसे 500 रु0 का नीले रंग का नोट, सौ रुपये का नोट समझ कर दे दिया था।

मैंने उसे धन्यवाद दिया।

जहाँ आज दुनिया दो-दो रुपये के लिए मारने मरने पर उतारू है, वहीं एक गरीब सब्जीवाला भी है। जो ईमानदारी की मिसाल बन गया है।

मेरे मुँह से बरबस निकल पड़ा कि ईमानदारी आज भी जिन्दा है।

Tuesday, 9 June 2009

श्रद्धा-सुमन

भाव-भीनी श्रद्धांजलि

श्री हबीब तनवीर जी

श्री ओमप्रकाश आदित्य जी

श्री नीरज पुरी जी

श्री लाड सिंह गुज्जर जी

आप सब का असमय

इस नश्वर संसार से चले जाना,

साहित्य-जगत की अपूरणीय क्षति है।

परमपिता परमात्मा से प्रार्थना है कि

वो दिवंगत आत्माओं को

सद्-गति प्रदान करें और

परिवारीजनों को

इस दारुण-दुख को

सहन करने की शक्ति दें।

दुख की इस घड़ी में

सभी ब्लॉगर्स आपके साथ हैं।

Sunday, 7 June 2009

‘‘दादी जी! प्रसाद दे दो ना’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


जून माह छुट्टियों का होता है। इन दिनों मेरे घर छोटी बहिन विजयलक्ष्मी आयी हुई है। वो प्रत्येक माह की पूर्णमासी के दिन सत्यनारायण स्वामी का व्रत रखती है। प्रसाद बनाती है और कथा भी पढ़ती है।
आज पूर्णमासी है। मेरी बहिन ने जबसे प्रसाद बनाना शुरू किया है । मेरी पाँच वर्षीया पौत्री प्राची उसके पास से हिली तक नही है।
बार-बार कहती है- ‘‘दादी जी! प्रसाद दे दो ना।’’
बहिन ने उससे कहा- ‘‘पहले कथा पढ़ लेने दो। फिर प्रसाद मिलेगा।’’
अब कथा पढ़ी जा रही है। जैसे ही कथा का एक अध्याय समाप्त होता है।
प्राची कहती है- ‘‘दादी जी! प्रसाद दे दो ना।’’
हर अध्याय पूरा होने पर प्राची की एक ही रट है- ‘‘दादी जी! प्रसाद दे दो ना।’’
अंततः पाँचों अध्याय पूरे हो जाते हैं, अब पौत्री प्राची और पौत्र प्रांजल को प्रसाद मिलता है। दोनों बड़े खुश हैं और प्रसाद खा रहे हैं।
घर के सब लोग कह रहे हैं कि इतने मनोयोग से किसी ने भी कथा नही सुनी है ,जितने ध्यान से प्राची ने पूरी कथा सुनी है।
पता नही, यह ललक प्रसाद के लिए थी या सत्यनारायण स्चामी की जय बोलने के लिए।
लेकिन इतना तो मानना ही पड़ेगा कि घर में धार्मिक अनुष्ठान होने से बच्चों पर तो संस्कार पड़ते ही हैं।

Saturday, 6 June 2009

‘‘काश् गुस्से पर काबू रखते’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

‘‘क्रोधी व्यक्ति अकेला ही रह जाता है’’
अगली कड़ी-
इसके बाद शुरू होता है अहम और बदले की भावना का खेल।
इन शायर महोदय की पत्नी बड़ी कर्मठ थी। घर-गृहस्थी का एक-एक सामान उन्होंने बड़े मन से जुटाया था। फ्रिज, कूलर, वाशिंग मशीन आदि सभी सामान तो था घर में। लेकिन इन्हें वो रास नही आया।
धीरे-धीरे करके फ्रिज, कूलर, वाशिंग मशीन और सिलाई मशीन तक औने-पौने दाम में बेच डाली। ये अपने को साहित्यकार तो कहलाते ही थे। अतः इक्का-दुक्का लोग इनसे मिलने भी चले जाते थे। जिनमें अधिकांश तो केवल भेद लेने के लिए ही जाते थे।
गर्मी के मौसम में ठण्डे पानी की जगह टंकी का गरम पानी पीकर ही इनको अपनी प्यास बुझानी पड़ती थी। यार-दोस्तों को भी मजबूरी में वही पानी पीना पड़ता था। अकेला दम और दिनचर्या वही।
खाये बिना तो रहा नही जाता था। कुछ दिन तो होटल में, खाया पर रोज-रोज होटल के खाने से जब इनका मन ऊब गया तो घर पर ही खाना बनाने लगे।
इनकी श्रीमती जी ने जब इनका यह हाल सुना तो वह इन्हें मनाने के लिए आयीं लेकिन बात और बिगड़ गयी।
इन्होंने अपने क्रोधी स्वभाव के कारण मध्यस्थ लोगों को गवाह बना कर तीन बार तलाक-तलाक कह दिया।
अच्छा भरा-पूरा घर महज गुस्से के कारण तबाह हो गया।
अब लोग जब इनकी शायरी सुनते हैं तो उपहास करने से नही चूकते हैं।
जो उम्र नाती पोतों के बीच गुजरनी चाहिए थी, वो अब तन्हा रहकर अकेले गुजार रहे हैं।
तलाक के बाद पत्नी ने मेहर और गुजारे के लिए न्यायालय में केस दर्ज करा दिया है। प्रति माह लगभग आधी पेंशन तो बकीलों के पेट में ही चली जाती है।
काश् गुस्से पर काबू रखते तो यह दुर्दशा तो नही होती।

Wednesday, 3 June 2009

‘‘क्रोधी व्यक्ति अकेला ही रह जाता है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)


कई वर्ष पुरानी बात है। मेरे एक मित्र थे। केन्द्र सरकार के महत्वपूर्ण विभाग में महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत थे। कभी-कभी उनके कार्यालय में जाना होता था, तो वो ढंग से बात नही करते थे। उनकी इस आदत से सभी परेशान थे।
एक दिन नगर में एक कवि गोष्ठी थी। संयोगवश् ये सज्जन भी उसमें बतौर शायर पधारे थे। मैंने जब इन्हें इस रूप में देखा तो विश्वास ही नही हो रहा था कि ये वही होंगे, जो कि अपने दफ्तर में इतने बद-तमीज हैं।
खैर, जब इन्होंने मेरी कविताएँ सुनी तो ये खासे प्रभावित हुए और इनसे दोस्ती हो गयी। इनके घर आना जाना भी हो गया। परन्तु अपने स्वभाव के अनुसार इन्होंने अपनी व अपने परिवार की श्लाघा करनी नही छोड़ी। मैं भी हाँ-हूँ करके इनकी बाते सुन लिया करता था।
एक दिन शाम को 6 बजे के लगभग मैं इनके घर अनायास ही पहुँच गया। वहाँ मैंने जो दृश्य देखा उसे शब्दों में वर्णन करना एक कठिन कार्य है। संक्षेप में इतना ही लिखना पर्याप्त है कि इनके बच्चे व पत्नी इन्हे जूते चप्पल मार रहे थे और ये भी पलट वार कर रहे थे।
आज स्थिति यह है कि इन्होंने अपनी सेवा से स्वेच्छा से अवकाश ले लिया है। 3 कमरों का एक घर भी बनाया हुआ है। परन्तु इनकी पत्नी व पुत्र दूसरे शहर में किराये के मकान में रहते हैं और ये उस घर में अकेले रहने को मजबूर है।
कहने का तात्पर्य यह है कि क्रोधी व्यक्ति अकेला ही रह जाता है। घर परिवार वाले भी उसका साथ छोड़ देते हैं।
क्रमशः..................

Tuesday, 2 June 2009

"भा0ज0पा0 की हार के कारण" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

भारतीय जनता पार्टी उत्तराखण्ड में सत्ता में रहते हुए भी लोकसभा की पाँचों सीटें क्यों हार गयी?

इसी गुणा-भाग में पार्टी के वरिष्ठ नेता लगे हुए हैं, परन्तु इसके असली कारण पार्टी दफ्तर में बैठ कर नही अपितु जनता के बीच जाकर तलाश करने होंगे।

मेरा भा0ज0पा0 से कुछ लेना देना नही है तथा नही मैं इस पार्टी का सदस्य हूँ। लेकिन एक नागरिक होने के नाते हार के कारणों की समीक्षा तो कर ही सकता हूँ।

मेरी पहचान के एक व्यक्ति हैं, जो भा0ज0पा0 कोटे से आयोग के नये-नये मेम्बर बने हैं। उन्होंने चुनाव से 5-6 दिन पहले एक बोलेरो जीप हायर की और 8-9 निठल्लों को बैठा कर प्रचार के चुनाव यात्रा पर लिए निकल पड़े। उनके पास एक बहुत बढ़िया कैमरा भी था, जिसमें वो अपनी चुनाव प्रचार यात्रा की फोटो खिंचवाते रहे।

ये सज्जन केवल वहाँ-वहाँ ही गये जहाँ कि प्रत्याशी जा रहा था। अर्थात् ये प्रत्याशी के साथ रहे और उसके साथ ही फोटों का कलेक्शन करते रहे। जब इनका मकसद पूरा हो गया तो संयोग से ये मेरे शहर में भी आये।

आयोग का पूर्व सदस्य होने के नाते ये सज्जन अपनी निठल्ली फौज को लेकर दिन में 11 बजे मेरे पास पहुँचे। सबने भोजन किया, दोपहर मे आराम किया और शाम को 5 बजे वापिस लौट गये।

जब मैंने इन सज्जन से चुनाव के बारे में चर्चा की तो वो बोले कि हमें यहाँ जानता ही कौन है? हम तो यहाँ से साढ़े तीन सौ कि.मी. दूर के रहने वाले हैं।

इन्होंने आगे कहा कि वैसे भी हमारा प्रत्याशी तो जीत ही रहा है। बस हमें तो कैण्डीडेट को अपनी शक्ल दिखानी थी। इसलिए दो-चार सभाओं में उनके साथ रहे। उनकी लोकप्रियता की सूची में अपना नाम आ गया और हो गया चुनाव प्रचार।

अब इनसे कोई पूछे कि आपने अपने क्षेत्र में जहाँ आपका प्रभाव था चुनाव प्रचार क्यों नही किया? तो इसका कोई उत्तर इनके पास नही था।

सच पूछा जाये तो बड़बोलापन भा0ज0पा0 को ले डूबा। इसके साथ ही सरकार में बैठे नेताओं ने भी पार्टी के साथ गद्दारी करने में कोई कसर नही छोड़ी और भा0ज0पा0 के ताबूत में कील ठोकते चले गये।

यही थे भा0ज0पा0 की हार के कारण।

Monday, 1 June 2009

‘‘संस्कार’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

ब्लॉग जगत में श्रीमती वन्दना गुप्ता मेरी एक अच्छी मित्र हैं। उन्होंने अपने ब्लॉग पर ‘‘कुछ अनुत्तरित प्रश्न’’ पोस्ट प्रकाशित की। जिसे पढ़कर मेरे मन में उनके प्रति सम्वेदना का भाव जाग्रत हुआ और मैंने अपनी टिप्पणी में लिखा-
‘‘वन्दना जी!आपने तो जीवन का वो पृष्ठ खोल कर सामने रख दिया। जिसे हर व्यक्ति छिपाता रहता है। आपका साहस काबिले-तारीफ है। समय की प्रतीक्षा करो, सब ठीक हो जायेगा।’’
वन्दना जी के ब्लाग पर माडरेशन सक्षम है, लेकिन उनकी महानता देखिए कि उन्होंने मेरी टिप्पणी को प्रकाशित कर दिया।
थोड़ी देर बाद उनका मेल मुझे प्राप्त हुआ जिसमें लिखा था-
‘‘शास्त्री जी! ये सब मेरे साथ नही हुआ है। सिर्फ लिखा है- आज के हालात पर, जो अधिकांश के साथ घट चुका है।’’
उनकी इस पोस्ट ने कुछ ऐसे प्रश्न उछाल दिये हैं। जिन पर हमें गम्भीरता से सोचने की आवश्यकता है। वो प्रश्न निम्न हैं-
‘‘क्या आज मैं घर के कोने में पड़ी एक अवांछित वस्तु से ज्यादा नही ?
क्या अब मुझे इस सत्य को स्वीकारना होगा?
क्या मुझे अब जिन्दगी को गुजारने के लिए एक नए सिरे से सोचना होगा?
क्या कभी मेरा भी कोई अस्तित्व होगा ?
न जाने कितने अनुत्तरित प्रश्न मुखर हो उठे हैं ।
शायद अब उम्र के इस पड़ाव पर इन प्रश्नों का उत्तर खोजना होगा।’’
ऐसी घटनाएँ रोजमर्रा की जिन्दगी में अक्सर घटती ही रहती है, परन्तु हमारी मानवीय सम्वेदनाएँ इतनी शून्य हो गयी है कि हमारा ध्यान उन पर जाता ही नही है।
प्रसंगवश् मुझे एक कथानक याद आ रहा है।
‘‘एक कलयुगी पुत्र अपने बूढ़े पिता से मुक्ति पाना चाहता था। इसके लिए उसने एक युक्ति निकाली कि क्यों न पिता को जंगल में छोड़ दिया जाये। अतः वह अपने पिता को जंगल में ले जाने लगा। साथ में उसका 12 वर्ष का पुत्र भी था। जो इस बात को लेकर बड़ा दुखी था। इसलिए उस बालक ने अपने हाथ में एक पेन्ट का डिब्बा ले लिया और ब्रुश से पेड़ो पर निशान लगाता हुआ साथ-साथ चलने लगा।
अचानक बालक के पिता ने जब उससे पूछा कि बेटा यह कया कर रहे हो।
पुत्र ने उत्तर दिया-‘‘पापा जी! कुद दिनों के बाद आप जब बूढ़े हो जायेंगे तो आपको भी तो जंगल में छोड़ने के लिए इसी रास्ते से आना होगा। मैं कहीं रास्ता न भूल जाँऊ। इसीलिए पेड़ों पर निशान लगाता जा रहा हूँ।"
इतना सुनते ही कलयुगी पुत्र की अक्ल ठिकाने पर आ गयी और वह अपने बूढ़े पिता को वापिस घर ले आया।
कहने का तात्पर्य यह है कि जो व्यवहार हम अपने घर के बड़े-बूढ़ों के प्रति कर रहे हैं उसको हमारी आने वाली पीढ़ी भी संस्कार के रूप में हमसे सीख रही है। इसलिए हम कोई भी ऐसा काम न करें जो कि आने वाले कल में हम पर ही भारी न पड़ जाये।