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Thursday, 1 December 2011

"सैर-सपाटा और भारत बन्द" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

कल भारत बन्द था। इसलिए हमने भी सोचा कि छुट्टी के दिन सैर-सपाटा ही हो जाए। तभी मेरे मित्र और सरस पायस के सम्पादक रावेंद्रकुमार रवि और उनकी पत्नी शोभा भी हमारे घर आ गये। 
पिकनिक का नाम सुनकर वे भी हमारे सात हो लिए। श्रीमती जी भी तैयार हो गई और हमारी पोती प्राची भी कार में बैठ गई।


सबसे पहले हम लोग गये अपने नानकमत्ता स्थित आवास पर। जो बहुत दिनों से बन्द पड़ा था। ताला खोलकर हमने उसकी साफ-सफाई की और अब रुख़ किया नानकमत्ता साहिब गुरूद्वारे का! 
थोड़ी देर के लिए हम गुरूद्वारा प्रबन्धक कमेटी के दफ्तर में भी गये।। 

  अब हम लोगों ने गुरूद्वारे के परिसर में स्थित 
प्राचीन पीपल के वृक्ष (पीपल साहिब) के भी दर्शन किये। 
जिसके साथ में गुरूद्वारे का पवित्र सरोवर 
अपनी पावनता से मन को लुभा रहा था।
गुरूद्वारे का लंगर हाल भी बहुत विशाल है। 
यहाँ प्रतिदिन दोनों समय लंगर चलता है।
लंगर छकने के बाद हम लोग गये बाउली साहिब।
यहाँ गुरू नानक देव जी ने जमीन में फावड़ा मार कर
फाउड़ी गंगा की धारा प्रवाहित की थी।
सन्1965 में नानक सागर बाँध का निर्माण होने पर 
यह स्थान अब नानकसागर के वीच में आ गया है। 
मगर इसके ऐतिहासिक महत्व को ध्यान में रखते हुए 
सरकार ने एक पुल बना कर इस स्थान के दर्शन करने की 
सुविधा कर दी थी।
बाउली साहब के पास जाने पर सीढ़ियों के समीप ही 
हमने अपनी कार पार्क कर दी।
यहाँ पर दो पिल्ले हमारे स्वागत में खड़े थे।
इस पिल्ले की आँखों में कितनी ममता है।
यह देख रहा है कि लोग यहाँ आयेंगे और इसे कुछ खाने को देंगे।
यहाँ पर यात्री नाव भी हैं जो नानकसागर के पार बसे 
गाँव में लोगों को लाते पहुँचाते हैं।
इस नाविक की टूटी हुई नाव में पानी भर गया है 
और यह डब्बे लेकर नाव में से पानी उलीच रहा है।
रावेन्द्र कुमार रवि इन नज़ारों को देख रहे हैं!
साथ में इनकी धर्मपत्नी शोभा भी हैं।
ये हैं बाउली साहिब के भीतर के दृश्य!
श्रीमती अमर भारती और शोभा
मेरे साथ मेरी श्रीमती जी और बीच में मेरी पोती प्राची।
अगम जल से भरा हुआ नानक सागर!
 
अब दिन ढलने को है!
चलो घर को चलते हैं।
नानक मत्ता साहिब
दिल्ली से 270 किमी,
मुरादाबाद से 140 किमी,
बरेली से 100 किमी दूर है
और मेरे घर खटीमा से 
मात्र 15 किमी दूर है।
हैप्पी ब्लॉगिंग!
हिन्दी चिट्ठाकारी की जय हो!!

Tuesday, 3 November 2009

"तीन पत्थरों का चूल्हा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

"गंगा-स्नान मेला"
आज कार्तिक पूर्णिमा का दिन है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने का प्रचलन पौराणिक-काल से ही हमारे देश में चला आ रहा है। अतः परम्परा का निर्वहन करने के लिए हम भी "माँ पूर्णागिरि" के पद पखार रही शारदी नदी के किनारे जा पहुँचे। यह पावन स्थल था- "बूम"। जो उत्तराखण्ड के चम्पावत जिले में टनकपुर से 12 किमी दूर पहाड़ों के ठीक नीचे है। 

चित्र में दिखाई दे रहे पर्वत की चोटी पर सती-माता "माँ पूर्णागिरि" का निवास है और उसके ठीक नीचे पावन शारदा नदी की जल-धारा कल-कल निनाद करती हुई श्रद्धालुओं को पवित्र स्नान का निमन्त्रण दे रही है।





यहाँ भगवान के प्रिय फल "बेल" के पेड़ों के मध्य हमलोगों ने भी दो-तीन बेड-शीट बिछा कर अपना आसन जमा दिया।


इसके बाद पावन जल में डुबकी लगाने के लिए पावन शारदा नदी की ओर प्रस्थान किया।

महिलाओं ने तीन पत्थरों का चूल्हा बनाया और खिचड़ी बनानी शुरू कर दी।

इसके बाद सबने बैठकर बड़े प्रेम से खिचड़ी खाई। 






दही, अचार-चटनी और सिरके वाली मूली के साथ खिचड़ी में छप्पन-भोग का जैसा परमानन्द प्राप्त हुआ।

इसके बाद मजेदार घर-परिवार की बातें हुईं और इन बेल के पेड़ों की शीतल छाया में एक घण्टा विश्राम किया गया।
अब पिकनिक पूरी हो गई थी और घर वापिस आने की भी जल्दी थी क्योंकि ब्लॉगिंग की तलब लग रही थी।

लौटते हुए चकरपुर के घने जंगलों मे स्थित "श्री वनखण्डी महादेव" के मन्दिर मे जाकर भोले बाबा के दर्शन किये।
शिवरात्रि की रात को यहाँ पर स्थित कैलाशपति की पिण्डी सात बार अपना रंग बदलती है।
इसकी चर्चा किसी और दिल अलग से पोस्ट लगाकर किया जायेगा।