| मेरी एक दिन की पन्तनगर यात्रा |
बहुत दिन हो गये थे घर में पड़े-पड़े!
रोज़मर्रा का वही काम। सुबह ठना कम्प्यूटर खोलना, मेल चेक करना और ब्लॉगिंग करना।
इस काम से अब खीझ होने लगी थी! इसलिए सोचा कि कहीं पर घूम आया जाए।
तभी अपने शिष्य सुरेश राजपूत का फोन आ गया कि गुरू जी मेरे पास आ जाइए !
मेरा भी मन था कहीं घूमने जाने का।
तब मैंने 30 जुलाई को अपराह 3 बजे कार निकाल ही ली
और चल पड़ा पन्त नगर की यात्रा के लिए।
रास्ते में किच्छा का रेलवे क्रॉसिंग पड़ा वह बन्द था इस लिए मुझे रुकना पड़ा।

सोचा कि कैंमरे से कुछ फोटो ही खींच लिए जाएँ।

तभी मीटर गेज की रेलगाड़ी किच्छा की ओर से आती हुई दिखाई पड़ी!
उसके बाद मैं पन्तनगर पहुँच गया! |
सीधे सुरेश जी के घर पहुँचा और पेटभर कर चाय नाश्ता किया!

यह है सुरेश राजपूत का घर।
दोमंजिले पर रहते हैं वो अपनी माता जी के साथ।
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सुरेश जी के घर के बाहर अमरूद के पेड़ लगे हैं।

जिन पर अमरूद के फल लगे थे!
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खाली जगह में भिण्डी के पौधे भी लगाए हुए हैं।

इन पर भिण्डी के फूल और कलियाँ भी दिखाई दे रहीं थीं।

घर के बाहर रोड के किनारे नीम का एक पेड़ भी मुझे दिखाई दिया।

जिसके नीचे ही मैंने अपनी कार खड़ी की थी।
नीम के पेड़ पर निम्बौरियाँ लदी हुई थीं और वो पर कर नीचे टपक रहीं थी।
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इसके बाद हम लोग पन्तनगर के अन्तरराष्ट्रीय अतिथि गृह में गये।
सुरेश जी ने मेरे रात्रि विश्राम का प्रबन्ध यहाँ ही किया था।
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गेस्ट हाउस के बाहर का नजारा बहुत मनमोहक था।
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चारों ओर हरियाली ही हरियाली पसरी थी

मैदान में चीड़ का यह विशालकाय वृक्ष
उत्तराखण्ड के पहाड़ी राज्य का आभास करा रहा था ! |
सुरेश जी ने अपनी फोटो भी इसी चीड़ के पेड़ के नीचे खिंचवाई।
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इसके बाद मेरी भी फोटो सुरेश जी ने खींच ही ली!
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सुरेश राजपूत जी ने अपने घर की सीढ़ियों के साथ
दीवार में गणेश जी की बहुत सारी पेंटिग अपने हाथों से बनाईं हैं।
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यहाँ आने और जाने पर मैं गणेश जी को प्रणाम करना न भूला! |
| इस प्रकार से मेरी एक दिन की पन्तनगर विश्वविद्यालय की यात्रा सम्पन्न हुई! |