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Thursday, 10 March 2011

"सोये हुए बिल्ली-कुत्ते का चित्र बनाया करो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"


    आज मुझे विख्यात चित्रकार श्री हरिपाल त्यागी का एक संस्मरण याद आ रहा है! यह सन् 1989 की घटना है मगर ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात हो।

उन दिनों त्यागी जी दाढ़ी नहीं रखते थे। बाबा नागार्जुन उन्हीं के मुहल्ले सादतपुर में रहते थे और खटीमा प्रवास पर आए हुए थे। वे राजकीय महाविद्यालय, खटीमा में कार्यरत प्रो. वाचस्पति के यहाँ ठहरे थे। प्रो. वाचस्पति मेरे अभिन्न मित्रों में थे। प्रतिदिन की भाँति मैं जब प्रो. साहब से मिलने उनके निवास पर गया तो बाबा नागार्जुन की चारपाई पर बैठे हुए एक सज्जन बाबा से अन्तरंग बाते कर रहे थे।
मैंने वाचस्पति जी से इनके बारे में पूछा तो पता लगा कि ये मशहूर चित्रकार और पत्र-पत्रिकाओं कवर डिजाइनर हरिपाल त्यागी हैं! अब मैं त्यागी जी से मुखातिब हुआ तो पता लगा कि यह मेरे मूलनिवास नजीबाबाद के पास के ही महुआ ग्राम के निवासी हैं। मैंने त्यागी जी से कहा कि महुआ के तो मेरे नामराशि रूपचन्द त्यागी मूर्ति देवी सरस्वती इण्टर कालेज में अंग्रेजी के प्रवक्ता थे। जिन्होंने मुझे इण्टर में अंग्रेजी पढ़ाई है और उनका भतीजा अशोक कुमार त्यागी मेरा क्लास-फैलो था। इस पर त्यागी जी ने बताया कि वो उनके भतीजे हैं और अशोक मेरा पोता है।
हरिपाल त्यागी खटीमा में लगभग एक सप्ताह रहे। मेरे साथ बाबा, त्यागी जी और प्रो.वाचस्पति का परिवार नेपाल के शहर महेन्दनगर भी घूमने गये। एक बार मेरे निवास/विद्यालय में कविगोष्ठी हुई। जिसमें बाबा के साथ त्यागी जी, बल्लीसिंह चीमा, गम्भीर सिंह पालनी, जवाहर लाल, दिवाकर भट्ट, जसराम सिंह रजनीश, ठा.गिरिराज सिंह और स्थानीय कवियों ने काव्य पाठ किया।
वह बात तो रह ही गई जिसके लिए यह संस्मरण लिखा है। मैं एक दिन प्रो. वाचस्पति के यहाँ बातें कर रहा था तभी त्यागी जी ने मुझे घूर कर देखा। मैंने सोचा कि त्यागी जी को मेरी को बात बुरी लग गई होगी इसलिए आज वो मेरी बातों में रुचि नहीं ले रहे है।
लगभग दो मिनट बाद त्यागी जी ने मुझे एक स्कैच देते हुए कहा कि यह आप ही हैं। (संयोग से वह चित्र मुझे इस समय मिल नहीं रहा है) काले स्कैच पैन से बना यह चित्र तो कमाल का था। मैंने घर आकर जब इसे दिखाया तो मेरे छोटे पुत्र विनीत की भी कला में रुचि जाग्रत हुई।
अगले दिन जब त्यागी जी मेरे कार्यालय में आये तो विनीत ने (जो कि उस समय कक्षा 5 का छात्र था) त्यागी जी का एक कार्टूननुमा चित्र बना कर उन्हें भेंट किया। इस पर त्यागी जी बहुत जोर से हँसे। विनीत को बहुत प्यार किया और कहा कि पहले सोते हुए कुत्ते बिल्ली का चित्र बनाया करो!

Saturday, 12 June 2010

“माँ पूर्णागिरि की यात्रा” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

“माता ने अचानक बुलाया!”

कानपुर से मेरे बड़े समधी अचानक खटीमा  पहुँचे!
बिना किसी पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के 
टनकपुर से 17 किमी पूर्णागिरि की पहाड़ी पर स्थित 
माता पूर्णागिरि के दर्शनों का कार्यक्रम बन गया!
और चल पड़े माता जी के दर्शनों के लिए!
रास्ते में सबसे पहले खटीमा से 7 किमी दूर चकरपुर के जंगलों में स्थित 
राष्ट्रीय राजमार्ग-125 के किनारे बने वनखण्डी महादेव के दर्शन किये!  02112009068_1IMG_1336
IMG_1337मन्दिर के मुख्य-महन्त ने इससे जुड़ी कहानी सुनाते हुए कहा-
“प्रणवीर महाराणा प्रताप के वीरगति को प्राप्त होने के उपरान्त कुछ राजपूत महिलाएँ तो सती हो गईं थी, लेकिन कुछ राजकुमारियों ने अपने सेवकों के साथ मेवाड़ से पलायन कर खटीमा के समीप नेपाल की तराई के जंगलों में अपना ठिकाना बना लिया था। यह कबीला “थारू” जनजाति के नाम से जाना जाता है।
उसी समय की बात है कि एक थारू की गाय घर में बिल्कुल दूध नही देती थी। लोगों ने जब इसका कारण खोजा तो पता लगा कि यह गाय प्रतिदिन जंगल में जाकर एक पत्थर के पास जाती है और अपने थनों से दूध गिरा कर आ जाती है।”
थारू समाज के लोगों ने यहाँ एक साधारण सा शिवालय बना दिया।
मन्दिर में कलश के नीचे वही पत्थर है जिस पर गाय अपने थनों से दूध गिरा कर इसको प्रतिदिन स्नान कराती थी।

IMG_1332 प्रत्येक वर्ष यहाँ शिवरात्रि को एक विशाल मेला लगता है। जो सात दिनों तक चलता है।
कभी आपका भी इधर आना हो तो “वनखण्डी-महादेव” के इस प्राचीन शिव-मन्दिर का दर्शन करना न भूलें!
इसके बाद टनकपुर से 10 किमी की दूरी पर 
पूर्णागिरि मार्ग पर 
श्री आद्या महाकामेश्वरी माता के भी दर्शनों का लाभ मिल गया!
IMG_1400 IMG_1399 इसके बाद माता पूर्णागिरि का पर्वत आ गया! 
जिसके कुछ चित्र निम्नवत् हैं!
IMG_1392मेरे समधी साहब मुन्ना लाल जी तो 
सीढ़ियोंनुमा दुर्गम राह पर चलते-चलते 
सीना पकड़कर ही बैठ गये!
IMG_1339 उन्होंने यहाँ थोड़ा आराम किया और आगे बढ़ चले!
IMG_1345अब हम टुन्यास में पहुँच गये थे! 
यहाँ से एक किमी आगे गये तो 
माता पूर्णागिरि का मन्दिर हमारे सामने था!
IMG_1360  यहाँ दर्शनार्थी भक्तों की लम्बी कतार लगी थी!IMG_1361IMG_1365यहाँ पर मैंने मन्दिर के पीछे का भी एक फोटो ले लिया! 
IMG_1362लगभग एक घण्टे की प्रतीक्षा के बाद माता के दर्शनों का सौभाग्य मिला!
IMG_1366माता जी के मन्दिर में विराजमान सिंहासन पर बैठी माँ पूर्णागिरि जी! IMG_1368मन्दिर की चोटी से लिया गया पर्वतों का सुन्दर चित्र!  IMG_1367माता पूर्णागिरि के पग पखारती शारदा नदी! IMG_1359 अब माँ काली के नीचे बनी मथुरादत्त पाण्डेय जी की दुकान नं.-6 में भोजन किया!
IMG_1371वापिस लौटकर आये तो टुन्यास में रखे 
झूठे के द्वारा लाये गये मन्दिर के भी दर्शन किये!
IMG_1348झूठे मन्दिर की कथा-
प्राचीन समय में एक सेठ जी ने माता के दरबार में आकर पुत्र की कामना की और प्रण किया कि मेरे घर मे पुत्र का जन्म होगा तो माता को सोने का मन्दिर भेंट करूँगा!
मता की कृपा से उसके घर एक पुत्र ने जन्म लिया और वह ताम्बे का मन्दिर बनवाकर उसपर सोने का पानी चढ़वा कर माता के दरबार में चढ़ाने के लिए आया!
टुन्नास में इस स्थान पर सेवकों ने जब मन्दिर रखकर कुछ विश्राम किया तो यह मन्दिर यहाँ से उठा ही नही!
IMG_1347आज भी झूठे का चढ़ाया हुआ यह प्राचीन ताम्बे का मन्दिर यहाँ मूलरूप में रखा हुआ है!
IMG_1397 इसके बाद बचे हुए शुद्ध और ताजा भोजन को 
हमने एक महात्मा जी को खिलाया और उनके आशीष प्राप्त किये!

इस प्रकार हमारी माता पूर्णागिरि की यात्रा सम्पन्न हुई 
और अचानक ही माता के दर्शनों का सौभाग्य मिल गया!
माता पूर्णागिरि का मन्दिर 
दिल्ली से 350 किमी, बरेली से 150 किमी 
और मुरादाबाद से 200 किमी दूर है!

Friday, 24 July 2009

‘‘प्राचीन नन्दीश्वर महादेव’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


(चित्र में मेरे मित्र गुरूसहाय भटनागर और मेरे पौत्र-पौत्री)

उत्तराखण्ड के ऊधमसिंहनगर जिले की तहसील खटीमा और सितारगंज थारू जनजाति के आदिवासी क्षेत्र कहलाते हैं।
जब मैं इस क्षेत्र में आया था तो आदिवासी लोगों के मुँह से एक कहानी सुनी थी। आज आपको भी वह कथा सुनाता हूँ।
नानकमत्ता से 6 किमी दूर एक गाँव बिल्कुल जंगल के बीच में बसा हुआ है। पुराने समय में कुछ लोगों ने खेत में एक गाय का बच्चा देखा। यह बहुत सुन्दर था और इसका रंग बिल्कुल सफेद था। जैसे ही लोग इसके पास गये तो यह पत्थर का हो गया। लोगों ने इसे उठाने का बड़ा प्रयास किया लेकिन यह टस से मस भी नही हुआ। थक हार कर लोगों ने इसे वहीं पर छोड़ दिया।
अगले दिन यह बछड़ा फिर किसी दूसरे खेत में दिखाई दिया। लोग जैसे ही इसके पास गये। यह फिर पत्थर का बन गया। लोगो ने इसे फिर उठाने की कोशिश की परन्तु यह कई लोगों के जोर लगाने पर भी नही उठा। तभी एक बालिका ने शिव आराधना की और इसे उठाया तो यह उसके हाथों से ऐसे उठ गया जैसे कि कोई प्लास्टिक का खिलौना हो।
अन्ततः इस बालिका ने इसे एक पीपल के पेड़ के नीचे स्थापित कर दिया। इस स्थान को नन्दीश्वर महादेव का नाम दिया गया। कालान्तर में यहाँ प्राचीन नन्दीश्वर महादेव का मन्दिर बना दिया गया।
कई वर्षों तक तो मुझे इस कहानी पर यकीन ही नही हुआ। लेकिन मन में यह इच्छा बनी रही कि इस स्थान को देखना अवश्य चाहिए।
अतः इस वर्ष महा शिवरात्रि के अवसर पर हम लोग इसके दर्शन करने के लिए गये।
अब यहाँ जाने लिए पक्की सड़क बना दी गयी है। इसके इर्द-गिर्द एक गाँव भी बस गया है।
प्रतिवर्ष शिवरात्रि के अवसर पर यहाँ मेला लगता है जिसमें काफी श्रद्धालू यहाँ पूजा-अर्चना करने के लिए आते हैं।
यहाँ शुद्ध दूध और शुद्ध घी चढ़ाया जाता है। प्रसाद के रूप में प्रतिदिन इस दूध की खीर बनाई जाती है तथा भक्तों को खिलाई जाती है।
यहाँ जो घी चढ़ाया जात है उससे नानकमत्ता गुरूद्वारा में कड़ाह-प्रसाद बनाया जाता है।
इस स्थान पर जाने पर मुझे इस कहानी पर विश्वास हो चला है।