| विभुक्षिता किं न करोति पापम्, क्षीणाः जनाः निष्करुणा भवन्ति। त्वं गच्छ भद्रे प्रियदर्शनाय, न गंगदत्तः पुनरेति कूपम्।। उपरोक्त श्लोक का अर्थ लिखने से पूर्व एक छोटी सी कथा के माध्यम से ही इसे समझाने का प्रयत्न करता हूँ। एक कुएँ में प्रियदर्शन नाम का साँप, भद्रा नाम की गोह तथा मेढकों का राजा गंगदत्त अपनी प्रजा के साथ रहते थे । तीनों परस्पर मित्रवत् व्यवहार करते थे। लेकिन जब प्रियदर्शन को भूख लगती थी तो वह एक मेंढक को खाकर अपनी क्षुधा शान्त कर लेता था। इस प्रकार गंगदत्त की प्रजा की संख्या दिन-प्रतिदिन घटती जा रही थी। एक दिन ऐसा भी आया कि गंगदत्त की प्रजा के सभी मेंढक समाप्त हो गये। अब केवल गंगदत्त शेष रह गया। प्रियदर्शन को भूख सता रही थी और वह भूख के कारण निर्बलता अनुभव कर रह था। अब उसने गंगदत्त से क्या कहा-यह संस्कृत के कवि ने साँप के मन की व्यथा को अपने श्लोक में लिखा- ‘‘विभुक्षिता किं न करोति पापम्,’’ कि हे मित्र गंगदत्त! मैं बहुत भूखा हूँ और भूख से मेरे प्राण निकले जा रहे हैं। अतः ‘‘विभुक्षिता किं न करोति पापम्,’’ भूखा क्या पाप नही करता। और ‘‘क्षीणाः जनाः निष्करुणा भवन्ति।’’ भूख से कमजोर व्यक्ति के मन में करुणा (दया) समाप्त हो जाती है। इसलिए मित्रवर गंगदत्त मैं अपनी भूख मिटाने के लिए तुम्हें खाना चाहता हूँ। अब तो गंगदत्त के सामने प्रियदर्शनरूपी मौत साक्षात् सामने दिखाई दे रही थी। गंगदत्त ने जब प्रियदर्शन की बात सुनी तो उसके तो पाँव के नीचे सेजमीन ही खिसक गयी। किन्तु गंगदत्त मेंढकों का राजा था और बड़ा बुद्धिमान था। उसने प्रियदर्शन से कहा कि - ‘‘आप मेरे मित्र होकर मुझे खाना चाहते हैं तो खा लीजिए और अपनी क्षुधा शान्त कर लीजिए। परन्तु कल आप क्या खायेंगे? प्रियदर्शन बोला- ‘‘मित्र! इसका तुम ही कोई उपाय बताओ जिससे कि कल को भी मेरे खाने का प्रबन्ध हो जाये।’’ अब गंगदत्त ने नीति से काम लिया और कहा-‘‘ मित्र तुम जानते हो कि मैं मेंढकों का राजा हूँ। पास के तालाब से मैं फिर अपनी प्रजा को ले आता हूँ । उनमें से तुम रोज एक मेंढक खा लिया करना और अपनी भूख मिटा लिया करना। परन्तु मैं इस कुएँ से बाहर कैसे निकल पाऊँगा।’’ प्रियदर्शन तो भूख से पागल था और अविवेकी भी हो गया था। इसलिए उसने अपनी मित्र भद्रा को पास बुला कर कहा कि -‘‘हे बहन भद्रा! तुम अपनी पीठ पर बैठा कर गंगदत्त को कुएँ से बाहर तालाब तक ले जाओ। अतः भद्रा ने गंगदत्त को अपनी पीठ पर बैठाया और कुएँ से बाहर ले आयी।जैसे ही वह समीप के तालाब के पास पहुँची। उसकी पीठ पर बैठे गंगदत्त ने जोर की छलांग लगाई और तालाब में पहुँच कर बीच तालाब में से बोला- ‘‘त्वं गच्छ भद्रे प्रियदर्शनाय, न गंगदत्तः पुनरेति कूपम्।’’ हे भद्रा तुम अब प्रिय दर्शन के पास चली जाओ।गंगदत्त अब पुनः उस कुएँ में जाने वाला नही है। अर्थात विपत्ति के समय धैर्य और बुद्धि-विवेक से काम लेना चाहिए। |
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Wednesday, 2 June 2010
“धैर्य और बुद्धि से काम लेना चाहिए” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
Sunday, 18 April 2010
“उद्यमेन् हि सिद्धयन्ति” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
| एक गाँव में एक धनवान व्यक्ति रहता था! लेकिन वह बहुत कंजूस था। रात-दिन वह इन्ही ख्यालों में लगा रहता था कि किस प्रकार उसके धन में बढ़ोत्तरी हो! परन्तु वह इसके लिए कोई उद्यम भी नही करना चाहता था। एक दिन वह सन्त रैदास जी के पास गया और बोला- “महाराज आप तो महाज्ञानी है। कृपया मुझे धन-सम्पत्ति बढ़ाने का उपाय बताइए।” सन्त रैदास ने उसे ध्यान से देख और एक बीज देकर कहा- “देखो यह बीज बहुत ही चमत्कारी है। तुम इसे अपने घर के आँगन में बो देना। तुम्हारे धन में वृद्धि होने लगेगी।” धनवान व्यक्ति सन्त की बात मान कर ने ऐसा ही किया। दो-तीन माह में उस वीज ने एक बेल का रूप ले लिया और उस पर बहुत सारी सेम दिखाई देने लगीं। लेकिन उसकी सम्पत्ति मे बढ़ोत्तरि नही हुई। वह इससे परेशान हो गया और पुनः सन्त रैदास के पास गया। उसने सन्त जी से कहा- “महाराज आपने जो बीज दिया था वह मैंने वो दिया था। अब तो उस पर बहुत सारी फलियाँ भी लगीं हैं परन्तु मेरी सम्पत्ति में तो एक पैसे की भी वृद्धि नही हुई है।” रैदाल बोले- “भाई! तुम नासमझी कर रहे हो। अगर मैं कहता कि इसे भूनकर खा लो, तुम्हारा पेट भर जायेगा, तो यह तो असम्भव ही होता ना। तुमने उस बाज का सही उपयोग किया। अब वही बीज इतने फल दे रहा है कि तुम ही नहीं अन्य लोग भी उसकी सब्जी खा सकते हो। ठीक इसी प्रकार ही तुम्हारे पास जो सम्पत्ति है उसे किसी उद्यम में लगाओ। उसमें वृद्धि होने लगेगी और तुम्हारे साथ बहुत से अन्य लोगों को भी रोजगार मिल जायेगा।” ”बिना उद्यम के सम्पत्ति में वृद्धि का कल्पना करना मूर्खता है। धन का उपयोग सें के बीज की तरह करो! अन्यथा संचित धन धीरे-धीरे नष्ट हो जायेगा!” |
Thursday, 15 October 2009
"बुद्धि में ही बल है।" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
!! बुद्धिर्यस्य बलम् तस्य !!
पहाड़ की तलहटी में एक भेड़पालक का घर था। घर के साथ ही उसने भेड़ का भी बाड़ बनाया हुआ था। रात मे भेड़पालक उसमें भेड़ों के बन्द करके फाटक लगा देता था और सुबह होते ही खोल देता था।
दिन में भेड़ें जंगल में चरने के लिए चली जातीं थीं।
इस बाड़े में एक भेड़ अपने छोटे बच्चे के साथ भी रहती थी।
बच्चा बहुत छोटा था इसलिए वो उसे अपने साथ जंगल में नही ले जाती थी।
एक दिन भेड़ जब जंगल जाने लगा तो उसका बच्चा भी जंगल में जाने की जिद करने लगा। परन्तु वह उसे अपने साथ नही ले गई।
जैसे ही भेड़ बाड़े से ओझल हुई तो भेड़ का बच्चा भी बाड़े से निकल कर जंगल की ओर जाने लगा।
तभी उसे एक भेड़िया दिखाई दिया। जो काफी दिनों सो उसकी ताक में था।
भेड़िये को देख कर तो बच्चे की जैसे जान ही निकल गई। वह डर से थर-थर काँपने लगा।
धीर-धीरे भेड़िया बच्चे की ओर बढ़ने लगा। बच्चा बहुत डर गया था इसलिए वो कुछ बोल भी नही सका।
भेड़िया बच्चे के पास आकर बोला- "प्यारे बच्चे डरो नही। आज मैं तुम्हें खाकर अपनी भूख मिटाऊँगा।"
बच्चे ने डरते हुए कहा- "मामा! मैं अभी बहुत छोटा हूँ, मुझे खाकर त आपका पेट भी नही भरेगा।"
भेड़िया बोला- "मुझे तुम्हारे जैसे कोमल बच्चे बहुत अच्छे लगते हैं।"
बच्चा कुछ देर चुप रहा और फिर साहस करके बोला- "मामा! पहले मुझे एक गाना सुना दो। फिर जो इच्छा हो करना।"
भेड़िया खुश होकर बोला- "पर मुझे तो गाना नही आता।"
बच्चे ने फिर कहा- "पर मेरी माँ तो आपके गाने की बहुत तारीफ करती है।"
अब तो भेड़िया फूला नही समाया और ऊँची आवाज मे गाने लगा।
कुछ दूरी पर शिकारी कुत्ते जा रहे थे। उन्होंने जब भेड़िए की आवाज सुनी तो वे उसकी ओर झपट पड़े।
जब भेड़िया आँखें बन्द किए मस्ती से गा रहा था तो भेड़ का बच्चा चुपके से उसके पास से खिसक लिया और अपने बाड़े में आ गया।
जैसे ही भेड़िए ने गाना खत्म करके अपनी आँखे खोली तो शिकारी कुत्ते उसके सामने थे।
भेड़िया भाग भी नही पाया और शिकारी कुत्तों ने उसका काम तमाम कर दिया।
इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि-
इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि-
"हमें अपने माता-पिता का कहना मानना चाहिए।"
यदि कभी मुसीबत में घिर जायें तो-
"धैर्य रखकर बुद्धि से काम लेना चाहिए।"
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