होली के समाप्त होते ही माँ पूर्णागिरि का मेला प्रारम्भ हो जाता है और भक्तों की जय-जयकार सुनाई देने लगती है!

मेरा घर हाई-वे के किनारे ही है। अतः साईकिलों पर सवार दर्शनार्थी और बसों से आने वाले श्रद्धालू अक्सर यहीं पर विश्राम कर लेते हैं।

यदि आपका कभी माँ पूर्णागिरि के दर्शन करने का मन हो तो सबसे पहले आप खटीमा से 7 किमी दूर पूर्णागिरि मार्ग पर चकरपुर में बनखण्डी महादेव के प्राचीन मन्दिर भोलेबाबा के दर्शन अवश्य करें।
मान्यता है कि शिवरात्रि पर रात में भोले बाबा के साधारण से दिखने वाले पत्थर का रंग सात बार बदलता है।


इसके बाद आप रास्ते में पढ़ने वाले बनबसा कस्बे में पहुँचें तो भारत-नेपाल की सीमा भी देख लें।

यहाँ शारदा न नदी पर बना एक विशाल बैराज है। जिसके पार करने पर आप नेपाल की सीमा में प्रविष्ट हो जाएँगे।
पुल के चौंतीस पिलर्स (गेट) हैं उनको पार करने के उपरान्त आपको भारत की आब्रजन और सीमा चौकी पर भी बताना होगा कि हम नेपाल घूमने के लिए जा रहे हैं।
और अगर समय हो तो नेपाल के शहर महेन्द्रनगर की विदेश यात्रा भी कर लें।
बनबसा के आगे पूर्णागिरि जाने के लिए आपको अन्तिम मैदानी शहर टनकपुर आना होगा।
रास्ते में आपको दिव्य आद्या शक्तिपीठ का भव्य मन्दिर भी दिखाई देगा। आप यहाँ पर भी अपनी वन्दना प्रार्थना करना न भूलें।
यहाँ से 4 किमी दूर जाकर पहाड़ी रास्ते की यात्रा आपको पैदल ही करनी होगी मगर आजकल जीप भी चलने लगीं है इस मार्ग पर। जो आपको भैरव मन्दिर पर छेड़ देंगी। भैरव मन्दिर के बाद तो कोई सवारी मिलने का सवाल ही नहीं उठता हैा। अपना भार स्वयं उठाते हुए यहाँ से आप माता के दरबार तक 3 किमी तक पैदल चलेंगे।
1500 मीटर चलने के बाद आपको टुन्यास नामक आखरी पड़ाव मिलेगा।
यहाँ पर आप अपने बाल-गोपाल का मुण्डन संस्कार भी करा सकते हैं।
उसके बाद आपको नागाबाड़ी में पहाड़ी रास्ते के दोनों ओर बहुत से नागा साधुओं के दर्शन होंगे।

थोडी दूर और चलने के बाद माता का पक्का पहाड़ आ जाएगा और सीढ़ियों से चलकर आपको दरबार तक जाना पड़ेगा।
और यह है माता के मन्दिर का पिछला भाग।
इसके साथ ही सीढ़ियाँ माता के मन्दिर की ओर मुड़ती हैं और माता का दरबार आपको दिखाई दे जाएगा।
यदि भीड़ कम हुई तो शीघ्र ही माता के दर्शनों का लाभ भी मिल जाएगा।
यही वो छोटा सा मन्दिर है जिसके दर्शनों के लिए आप इतना कष्ट उठा कर यहाँ तक आयेंगे। मगर इसकी मान्यताएँ बहुत बड़ी हैं।
नीचे है माता के दरबार से लिया गया पर्वतों का मनोहारी चित्र।
जिसमें नीचे शारदा नदी दिखाई दे रही है।

आप जिस रास्ते से माता के दर्शन करने के लिए आये थे अब उस रास्ते से वापिस नहीं जा पाएँगे क्योंकि मन्दिर से नीचे उतरने के लिए अलग से सीढ़िया बनाई गईं हैं।
वापस लौटते हुए आप झूठे के चढ़ाए हुए मन्दिर के भी दर्शन कर लें।
यहाँ आपको यह भोला-भाला नन्दी और कुष्ट रोगियों के परिवार खाना पकाते खाते हुए भी नजर आयेंगे।
आपकी श्रद्धा हो तो आप दान-पुण्य भी कर सकते हैं।
माता पूर्णागिरि आपकी मनोकामनाएँ पूर्ण करें।
holi ka maja aap k juban m vah maja aa gaya
ReplyDeleteपिथोरागढ़ ४ साल रहे फिर भी माँ पूर्णागिरी के दर्शन नहीं कर पाए कभी.
ReplyDeleteआपने दर्शन करा दिए बहुत बहुत आभार.
मयंक जी एक बार तो मै भी गया था लगभग ३२ साल पहले बड़ा ही सुन्दर स्थान है
ReplyDeleteचलिए, इस बहाने दर्शन हुए..बहुत सुन्दर..आभार.
ReplyDeleteसुंदर चित्रमयी प्रस्तुति
ReplyDeleteपिछले वर्ष टनकपुर से श्यामलाताल और मायावती जाना हुआ था तब वहां के स्थानीय लोगो ने हमसे कहा था इतनी दूर आये है और माँ के दर्शन नही किये किन्तु समयाभाव के कारण जाना नहीं हुआ |
ReplyDeleteआपके द्वारा विस्तृत वर्णन से माँ के दर्शन हो गये |
आभार
शास्त्री जी,
ReplyDeleteइस सचित्र पोस्ट के लिये आपका आभार। बरेली छूटने के बाद पूर्णागिरि माँ के दर्शन फिर से करने की तमन्ना मन में ही रह गयी।
माँ पूर्णागिरी के दर्शन करवाने के लिए बहुत बहुत आभार।
ReplyDeleteमाँ पूर्णागिरी के दर्शन करा दिए बहुत बहुत आभार|
ReplyDeletebahut sundar chitr aur jankari di aapne....ati sundar
ReplyDeletebahut sundar post..jai mata di
ReplyDeleteतस्वीरों के माध्यम से हमारी भी माँ पूर्णागिरी की परिक्रमा पूर्ण हुई ...
ReplyDeleteआभार !
thanks for this virtual journey to Poornagiri !!
ReplyDeleteशानदार ब्लॉगिंग।
ReplyDeleteजय माँ पूर्णागिरी . दर्शन करवाने के लिए आभार.
ReplyDeleteबढ़िया और वृतांत वर्णन...कभी संभव हुआ तो ज़रूर घूमेंगे....धन्यवाद शास्त्री जी
ReplyDeleteहिन्दू नवसंवत्सर २०६८ की हार्दिक शुभकामनाएँ
ReplyDeletehttp://blogkikhabren.blogspot.com/2011/04/hindi-twitter.html
माँ पूर्णागिरी के दर्शन करा दिए बहुत बहुत आभार|
ReplyDeleteविवेक जैन
vivj2000.blogspot.com