समर्थक

Tuesday, 2 June 2015

"सन्तकबीर और बाबा नागार्जुन के जन्मदिन पर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

     आज ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा है। आज के ही दिन दो महान विभूतियों का जन्म हमारे भारत वर्ष में हुआ था। जिनमें एक सन्त कबीर थे और दूसरे जनकवि बाबा नागार्जुन थे। सन्त कबीर एक समाज सुधारक थे और उनके नाम पर आज कई मठ बने हैं और उनमें मठाधीशों आधिपत्य है। जबकि बाबा नागार्जुन के नाम के जुड़ा न कोई मठ है और न कोई मन्दिर है। उनकी यही विशेषता उनको दूसरों से अलग करती है।

मैं उन सौभाग्यशाली व्यक्तियों में से हूँ जिसे बाबा की सेवा और सान्निध्य मिला था।
बाबा नागार्जुन को शॉल भेंट करते हुए डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’
सनातन धर्मशाला, खटीमा में 9 जुलाई,1989 को सम्पन्न 
कवि गोष्ठी के चित्र में-गम्भीर सिंह पालनी, जवाहरलाल वर्मा, 
दिनेश भट्ट, बल्लीसिंह चीमा, वाचस्पति, कविता पाठ करते हुए
ठा.गिरिराज सिंह, बाबा नागार्जुन तथा ‘डा. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
सन् 1989 का जून जुलाई का महीना मेरे जीवन के लिए
आज भी अविस्मरणीय  है!
बाबा नागार्जुन को स्कूटर पर बैठाकर सैर कराना! 
बाबा के साथ घंटों बतियाना!
कुछ अपनी कहना और कुछ उनकी सुनना!
बाबा के पास लोगों के मिलने का ताँता लगा रहता था!
सारा परिवार बाबा के साथ बहुत खुश रहता था!
मेरे पिता जी श्री घासीराम आर्य 
और दोनों पुत्रों के साथ बाबा घूम भी लेते थे!
बच्चों से तो बाबा बहुत घुल-मिल जाते थे!
इस दौरान कई कवि गोष्ठिया भी 
बाबा के् सम्मान में आयोजित की गईं!
बाबा को शॉल और मालाओं से 
सम्मानित भी तो किया गया था!
मुझे आज भी याद है कि खटीमा बस स्टेशन पर
मैं ही बाबा को दिल्ली की बस में बैठाने आया था!
यह है बाबा का पत्र मेरे नाम
जो उन्होंने दिल्ली से मुझे लिखा था!
 आर्य समाज के बारे में बाबा का क्या मत था!
यह आलेख मैंने "उत्तर-उजाला" में लिखा था!
जनकवि और साहित्यकार
बाबा नागार्जुन को मैं 
उनके जन्मदिन पर
कोटि-कोटि नमन करता हूँ!

जीवन परिचय

   बाबा के नाम से प्रसिद्ध कवि नागार्जुन का जन्म ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा (30 जून 1911) को अपने ननिहाल सतलखा, जिला दरभंगा, बिहार में हुआ था। आपका मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। नागार्जुन तरौनी गाँव, जिला मधुबनी, बिहार के निवासी रहे। आपकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय संस्कृत पाठशाला में हुई। बाद में  वाराणसी और कोलकाता में अध्ययन किया। 1936 में आप श्रीलंका चले गए और वहीं बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण की।  कुछ समय श्रीलंका में ही रहे फिर 1938 में  भारत लौट आए। अपनी कलम से आधुनिक हिंदी काव्य को और समृद्ध करने वाले नागार्जुन का 5 नवम्बर सन् 1998 को ख्वाजा सराय, दरभंगा, बिहार में निधन हो गया।
नागार्जुन का साहित्य सृजन
फक्कड़पन और घुमक्कड़ी प्रवृति  नागार्जुन के जीवन की प्रमुख विशेषता रही कि उन्होंने अपनी रचनाएँ हमेशा घूम-घूमकर ही लिखीं हैं और उस स्थान विशेष का जीवन्त चित्रण अपने काव्य में किया है। कैलाश मानसरोवर में बाबा गये और वहाँ के परिवेश का जो वर्णन उन्होंने किया वह अद्भुत है बाबा को नमन करते हुए उनकी कालजयी रचना को प्रस्तुत कर रहा हूँ-
"अमल धवल गिरि के शिखरों पर
बादल को घिरते देखा है।


छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहिन कणों को
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है
बादल को घिरते देखा है।


तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी-बड़ी कई झीलें हैं
उनके श्यामल-नील सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की ऊमस से आकुल
तिक्त-मधुर बिस-तंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है
बादल को घिरते देखा है।


ऋतु वसंत का सुप्रभात था
मंद-मंद था अनिल बह रहा
बालारुण की मृदु किरणें थीं
अगल-बगल स्वर्णाभ शिखर थे
एक-दूसरे से विरहित हो
अलग-अलग रहकर ही जिनको
सारी रात बितानी होती
निशाकाल से चिर-अभिशापित
बेबस उस चकवा-चकवी का
बंद हुआ क्रंदनफिर उनमें
उस महान सरवर के तीरे
शैवालों की हरी दरी पर
प्रणय-कलह छिड़ते देखा है
बादल को घिरते देखा है।


दुर्गम बर्फ़ानी घाटी में
शत्-सहस्र फुट ऊँचाई पर
अलख नाभि से उठने वाले
निज के ही उन्मादक परिमल
-के पीछे धावित हो-होकर
तरल तरुण कस्तूरी मृग को
अपने पर चिढ़ते देखा है


बादल को घिरते देखा है"  
         1935 में दीपक (मासिक) तथा 1942-43 में  विश्वबंधु  (साप्ताहिक) पत्रिका का संपादन किया। अपनी मातृभाषा मैथिली में वे यात्री नाम से रचना करते थे। मैथिली में नवीन भावबोध की रचनाओं का प्रारंभ उनके महत्त्वपूर्ण कविता-संग्रह, 'चित्रसे माना जाता है। नागार्जुन ने संस्कृत तथा बांग्ला में भी काव्य-रचना की है।
    लोकजीवनप्रकृति और समकालीन राजनीति उनकी रचनाओं के मुख्य विषय रहे हैं। विषय की विविधता और प्रस्तुति की सहजता नागार्जुन के रचना संसार को नया आयाम देती है। छायावादोत्तर काल के वे अकेले कवि हैं जिनकी रचनाएँ ग्रामीण चौपाल से लेकर विद्वानों की बैठक तक में समान रूप से आदर पाती हैं। जटिल से जटिल विषय पर लिखी गईं उनकी कविताएँ इतनी सहजसंप्रेषणीय और प्रभावशाली होती हैं कि पाठकों के मानस लोक में तत्काल बस जाती हैं। नागार्जुन की कविता में धारदार व्यंग्य मिलता है। जनहित के लिए प्रतिबद्धता उनकी कविता की मुख्य विशेषता है।
    नागार्जुन ने छन्दबद्ध और छन्दमुक्त दोनों प्रकार की कविताएँ रचीं। उनकी काव्य-भाषा में एक ओर संस्कृत काव्य परम्परा की प्रतिध्वनि है तो दूसरी ओर बोल-चाल की भाषा की रवानी और जीवन्तता भी। पत्रहीन नग्न गाछ (मैथिली कविता संग्रह) पर उन्हें  साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। उन्हें उत्तर प्रदेश के  भारत-भारती पुरस्कार, मध्य प्रदेश के  मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार और बिहार सरकार के राजेंद्र प्रसाद पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें दिल्ली की ̄हदी अकादमी का  शिखर सम्मान भी मिला।
उनकी प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं -
युगधारा, प्यासी पथराई आँखें, सतरंगे पंखों वाली, तालाब की मछलियाँ, हजार-हजार बाहों वाली, पुरानी जूतियों का कोरस, तुमने कहा थाआखिर ऐसा क्या कह दिया मैंनेमैं मिलटरी का बूढ़ा घोड़ा, रत्नगर्भा, ऐसे भी हम क्या: ऐसे भी तुम क्या, पका है कटहलभस्मांकुर ।
बलचनमा, रतिनाथ की चाची, कुंभी पाक, उग्रतारा, जमनिया का बाबा, वरुण के बेटे जैसे उपन्यास भी विशेष महत्त्व के हैं।
आपकी समस्त रचनाएँ नागार्जुन रचनावली (सात खंड) में संकलित हैं।
साभार-भारतदर्शन साहित्यिक पत्रिका (रोहित कुमार हैप्पी)

Thursday, 1 January 2015

"काव्य की आत्मा? ...." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

♥ रस काव्य की आत्मा है ♥
सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि रस क्या होता है?
कविता पढ़ने या नाटक देखने पर पाठक या दर्शक को जो आनन्द मिलता है उसे रस कहते हैं।
आचार्यों ने रस को काव्य की आत्मा की संज्ञा दी है।
रस के चार अंग होते हैं। 
1- स्थायी भाव,
2- विभाव,
3- अनुभाव और
4- संचारी भाव
सहृदय व्यक्ति के हृदय में जो भाव स्थायी रूप से विद्यमान रहते हैं, उन्हें स्थायी भाव कहा जाता है। यही भाव रस का बोध पाठक को कराते हैं।
काव्य के प्राचीन आचार्यों ने स्थायी भाव की संख्या नौ निर्धारित की थी, जिसके आधार पर रसों की संख्या भी नौ ही मानी गई थी।
स्थायी भाव                    रस
रति                                           शृंगार
हास                                           हास्य
शोक                                          करुण
क्रोध                                          रौद्र
उत्साह                                      वीर
भय                                           भयानक
जुगुप्सा (घृणा)                         वीभत्स
विस्मय                                    अद्भुत
निर्वेद                                       शान्त
लेकिन अर्वाचीन विद्वानों ने वात्सल्य के नाम से दसवाँ रस भी स्वीकार कर लिया। किन्तु इसका भी स्थायी भाव रति ही है। अन्तर इतना है कि जब रति बालक के प्रति उत्पन्न होती है तो उससे वात्सल्य की और जब ईश्वर के प्रति होती है तो उससे भक्ति रस की निष्पत्ति होती है।
विभाव
जिसके कारण सहृदय व्यक्ति को रस प्राप्त होता है , वह विभाव कहलाता है। अतः स्थायी भाव का कारण विभाव है। यह दो प्रकार का होता है-
क- आलम्बन विभाव
ख- उद्दीपन विभाव
(I) आलम्बन विभाव
वह कारण जिस पर भान अवलम्बित रहता है- अर्थात् जिस व्यक्ति या वस्तु के प्रति मन में रति आदि स्थायी भाव उत्पन्न होते हैं, उसे आलम्बन कहते हैं तता जिस व्यक्ति के मन में स्थायी भाव  उत्पन्न होते हैं उसे आश्रय कहते हैं। उदाहरण के लिए पुत्र की मृत्यु पर विलाप करती हुई माता। इसमें माता आश्रय है और पुत्र आलम्बन है। अतः यहाँ स्थायी भाव शोक है जिससे करुणरस की उत्पत्ति होती है। 
(II) उद्दीपन विभाव
जो आलम्बन द्वारा उत्पन्न भावों को उद्दीप्त करते हैं, वे उद्दीपन विभाव कहलाते हैं। जैसे- जंगल में  सिंह का गर्जन। इससे भय का स्थायी भाव उद्दीप्त होता है और सिंह का खुला मुख जंगल की भयानकता आदि का उद्दीपन विभाव है। इससे भयानक रस की उत्पत्ति होती है।
अनुभाव
स्थायी भाव के जाग्रत होने पर आश्रय की वाह्य चेष्टाओं को अवुबाव कहा जाता है। जैसे- भय उत्पन्न होने पर हक्का-बक्का हो जाना, रोंगटे खड़े हो जाना, काँपना, पसीने से तर हो जाना आदि।
यदि बिना किसी भावोद्रेक के मात्र भौतिक परिस्थिति के कारण अगर ये चेष्टाएँ दिखाई पड़ती हैं तो उन्हें अनुभाव नहीं कहा जाएगा। जैसे - जाड़े के कारण काँपना या गर्मी के कारण पसीना निकलना आदि।
संचारी भाव
आश्रय के मन में उठने वाले अस्थिर मनोविकारों को संचारी भाव कहते हैं। ये मनोविकार पानी के बुलबुले की भाँति बनते और मिटते रहते हैं, जबकि स्थायी भाव अन्त तक बने रहते हैं।
यहाँ यह भी उल्लेख करना आवश्यक है कि प्रत्येक रस का स्थायी भाव  तो निश्चित है परन्तु एक ही संचारी अनेक रसों में हो सकता है। जैसे - शंका शृंगार रस में भी हो सकती है और भयानक रस में भी। यहाँ यह भी विचारणय है कि स्थायी भाव भी दूसरे रस में संचारी भाव हो जाते हैं। जैसे - हास्य रस का स्थायी भाव "हास" शृंगार रस में संचारी भाव बन जाता है। संचारी भाव को व्यभिचारी भाव के नाम से भी जाना जाता है।
रसों के बारे में विस्तार से अपनी अगली किसी पोस्ट में प्रकाश डालूँगा।

Monday, 17 November 2014

"सिमटते स्वप्न की समीक्षा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

श्रीमती आशा लता सक्सेना का 
छठवाँ काव्य संकलन
"सिमटते स्वप्न"
         लगभग एक सप्ताह पूर्व श्रीमती आशा लता सक्सेना का षष्टम् काव्य संकलन मुझे प्राप्त हुआ। लेकिन आज समय मिला है अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का।
        पठनीय रचनाओं से सुसज्जित 186 पृष्ठों की इस पुस्तक को कवयित्री ने स्वयं प्रकाशित किया गया है। जिसका मूल्य मात्र रु.200/- रखा गया है। काव्य संग्रह "सिमटते स्वप्न" में कवयित्री ने 186 पृष्ठों में अपनी 155 रचनाओं को सिमेटकर अपनी मितव्यता का परिचय दिया है।
          श्रीमती आशा लता सक्सेना ने स्वगत कथन में लिखा है कि उनका लेखन स्वान्तःसुखाय है। इस काव्यसंग्रह की शीर्षक रचना में वे लिखतीं हैं-
“व्यस्त हो जाती हूँ
घर के काम-काज में
खाली कहा रहता है
मस्तिष्क मेरा छोटा सा
स्वप्न सिमट जाते हैं
व्यस्त दिनचर्या में”
         अपनी एक अन्य रचना “विचारों की श्रृंखला” में वह लिखती हैं-
“हूँ विचारों की पक्षधर
पर हाथ बँधें हैं
आजादी का अर्थ जानती हूँ
पर जीवन की हर साँस
किसी न किसी
परिपाटी में उलझी है
और संस्कारों के बोझ तले
दबी सहमी है”
        लेकिन भावनाओं का सैलाब कभी थमता नहीं है। जिसका उल्लेख कवयित्री ने बहत सहजता से अपनी रचना में किया भी है-
“भावनाओं का सैलाब
कहाँ ले जायेगा
भेद अपने-पराये में
कर न पायेगा”
         मँहगाई पर कलम चलाते हुए कवयित्री  लिखतीं है-
“मैं हूँ मँहगाई
अनन्त है विस्तार मेरा
एक ओर नियन्त्रण हो तो
दूसरी ओर विस्तार होता
मनुष्य आकंठ डूबा मुझ में
गहन वेदना सहता
फिर भी बच न पाता
मेरे पैने दंश से”
       अमूर्त स्वप्न कैसे होते हैं देखिए उनका रचना का यह अंश-
“सपनों में जीना
उनमें ही खोए रहना
आनन्द है ऐसा
गूँगे के गुड़ जैसा”
      बसन्त का स्वागत करते हुए कवयित्री ने लिखा है-
“पीले-लाल, रंग-बिरंगे
पुष्प सजे वृक्षों पर
रंग बसन्ती छाया
धरती की चूनर पर”
         चिराग की व्यथा को व्यक्त करते हुए अपने एक रचना में कवयित्री ने कुछ इस तरह व्यक्त किया है-
“रात भर चिराग जला
एक पल भी न सोया
फिर भी तरसा
एक प्यार भरी निगाह को”
         पराजय की पीड़ा को कवयित्री की लेखनी से देखिए-
“वह क्या जाने पीर हार की
जो कभी हारा ही नहीं
आहत मन ही जानता है
महत्व चोट के अहसास का”
         जिन्दगी की परिभाषा बताते हुए कवयित्री ने लिखा है-
“बोझ क्यों समझा है इसे
है नाम ज़िन्दग़ी इसका
सोचो-समझो विचार करो
फिर जीने की कोशिश करो”
       अपनी “फक्कड़” नामक रचना में बचपन को परिभाषीत करते हुए कवयित्री लिखती है-
“बहुत रोया जब जन्म लिया
माँ की गोद में सोया
सबको बाहों में झूला
लगा खुशियों का मेला
बचपन कब बीता याद नहीं
पर इतना अवश्य याद रहा
वो जीवन सीधा-सादा था
चिन्ताओं से था बहुत दूर”
        काव्य लोक में विचरण करने का अपना अलग ही सुख है। जिसको व्यक्त करते हुए कवयित्री लिखती है-
“विचरण कविता लोक में
स्वप्न लोक से कम नहीं
हर शब्द प्रभावित करता
निहित भावों की सुगन्ध से”
       लब्ध प्रतिष्ठित कवयित्री श्रीमती ज्ञानवती सक्सेना की  कोख से विदिशा मध्यप्रदेश में जन्मी 2 मई, 1943 को आशा लता सक्सेना ने अर्थशास्त्र और अंग्रेजी में स्नातकोत्तर करने के उपरान्त जीवनपर्यन्त अध्यापन किया। यूँ तो आपने अंग्रेजी में भी कविता लेखन किया लेकिन देवनागरी के प्रेमपाश में बँधकर हिन्दी में अपनी कविता की सरिता को आज भी आगे बढ़ा रहीं है। जब भी अपने आस-पास या समाज में कुछ ऐसा घटित होता देखती है, जिसे देखकर उनका मन संवेदनशील हो उठता है तो वही उनको लिखने के लिए प्रेरित करता है।  सामाजिक परिवेश की घटनाओं, परिदृश्यों और मानव मन में उठने वाली सहज भावनाओं व विचारों को सरल शब्दावली में व्यक्त करना इनकी भाषा-शैली का एक प्रमुख अंग है।
       इस कविता संग्रह को आत्मसात् करते हुए मैंने महसूस किया है कि कवयित्री ने इसमें जीवन से जुड़े लगभग प्रत्येक विषय जैसे- मतदाता, मँहगाई, बाल दिवस, झूँठनामा, प्रत्याशी, तितलीरानी, बैलगाड़ी, पारखी नज़र, चिराग, गुलाब, फागुन, फुलवारी, गौरैया, बन्दर, पीड़ा, बिछोह पर अपनी लेखनी कुशलता से चलायी है। चाहे इनकी कलम से रचना निकले या मुँह से बात निकले वह अपने आप में कविता से कम नहीं होती है।
        अन्त में इतना ही कहूँगा कि इस पुस्तक के सृजनकर्त्री श्रीमती आशा लता सक्सेना महिला होते हुए भी बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। कुल मिलाकर यही कहूँगा कि “सिमटते स्वप्न” एक पठनीय और संग्रहणीय काव्यसंकलन है।
        मेरा विश्वास है कि “सिमटते स्वप्न” काव्यसंग्रह सभी वर्ग के पाठकों में चेतना जगाने में सक्षम सिद्ध होगा। इसके साथ ही मुझे आशा है कि यह काव्य संग्रह समीक्षकों की दृष्टि से भी उपादेय सिद्ध होगा।
        यह काव्य संकलन श्रीमती आशा लता सक्सेनाके पते सी-47, एल.आई.जी. ऋषि नगर, उज्जैन (मध्यप्रदेश) से प्राप्त किया जा सकता है।
        इनके सम्पर्क नम्बर - (0734) 2521377 पर फोन करके आप विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
शुभकामनाओं के साथ!
समीक्षक
 (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
कवि एवं साहित्यकार 
टनकपुर-रोडखटीमा
जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262 308
E-Mail .  roopchandrashastri@gmail.com
फोन-(05943) 250129 मोबाइल-09997996437


Tuesday, 23 September 2014

"रपट-खटीमा में रामलीला मंचन शुरू" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज दिनांक 22-09-2-14 को
मेरे खटीमा नगर में
श्री रामलीला पात्र परिषद् द्वारा
रामलीला का मंचन प्रारम्भ हो गया।
जिसके मुख्य अतिथि खटीमा फाइबर्स के अध्यक्ष
आर.सी.रस्तोगी ने पूजन के बाद फीता काटकर उद्घाटन किया।
इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में
मा. पुष्कर सिंह धामी, विधायक खटीमा ,
डॉ-जी.सी.पाण्डेय (तपन अस्पताल)
संरक्षक मा. दान सिंह रावत, श्री राजीव अग्रवाल,
पूर्व नगमर पालिका द्यक्ष मराज बत्तरा, 
पूर्व सदस्य पिछड़ा वर्ग आयोग (उत्तराखण्ड सरकार) 
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री, दद्दा भाई रामचन्द्र प्रेमी, 
ईस्वर चन्द्र भगत जी, वरुण अग्रवाल, 
व्यापार मण्डल के संरक्षक अरुण सक्सेना जी 
तथा नगर के गण्यमान्य लोग उपस्थित थे।
इस उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता 
नगर पालिका अध्यक्षा श्रीमता सुरैया बेगम 
तथा उनके पति मेंहदी हसन ने की।














Saturday, 13 September 2014

"खटीमा में हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर कवि सम्मेलन" (रपट)

खटीमा (उत्तराखण्ड)
           आज हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर संस्कार भारती के तत्वावधान में हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में स्थानीय राणाप्रताप इण्डर कालेज में एक कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता गीताराम बंसल ने की तथा संचालन राजकीय इण्टक कालेज के हिन्दी प्राध्यापक और प्रख्यात कवि डॉ.महेन्द्र प्रताप पाण्डेय "नन्द" ने किया। सम्मेलन के मुख्यअतिथि डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" थे।
      कविसम्मेलन की विशेषता यह रही कि जाने-माने कवियों देवदत्तप्रसून, शिव भगवान मिश्र, एम.इलियास सिद्दीकी, अमीर अहमद अमीर, डॉ.राजकिशोर सक्सेना "राज", गेन्दा लाल शर्मा निर्जन, गुरूसहाय भटनागर बदनाम, रामचन्द्र प्रेमी, उदीयमान कवि विनीत मिश्रा, अमन मारवाड़ी, श्री भगवान मिश्रा, डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,  डॉ.महेन्द्र प्रताप पाण्डेय "नन्द", रावेन्द्र कुमार रवि, सितारगंज तथा नानक मत्ता साहिब के दो-दो कविवृन्द आदि के साथ कुल मिला कर 72 कवि-कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। जिसमें विभिन्न विद्यालयों के बालकवि भी शामिल थे।
         कवि सम्मेलन अपराह्न 3 से बजे से रात्रि 8 बजे तक चला। इस अवसर पर संस्कार भारती की ओर से कवियों और कवयित्रियों को सम्मानपत्र देकर अलंकृत किया गया।
देखिए इस कवि सम्मेलन की झलकियाँ