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Tuesday, 2 June 2015
Thursday, 1 January 2015
"काव्य की आत्मा? ...." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
♥ रस काव्य की आत्मा है ♥
सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि रस क्या होता है?कविता पढ़ने या नाटक देखने पर पाठक या दर्शक को जो आनन्द मिलता है उसे रस कहते हैं।
आचार्यों ने रस को काव्य की आत्मा की संज्ञा दी है।
रस के चार अंग होते हैं।
1- स्थायी भाव,
2- विभाव,
3- अनुभाव और
4- संचारी भाव
सहृदय व्यक्ति के हृदय में जो भाव स्थायी रूप से विद्यमान रहते हैं, उन्हें स्थायी भाव कहा जाता है। यही भाव रस का बोध पाठक को कराते हैं।
काव्य के प्राचीन आचार्यों ने स्थायी भाव की संख्या नौ निर्धारित की थी, जिसके आधार पर रसों की संख्या भी नौ ही मानी गई थी।
स्थायी भाव रस
रति शृंगार
हास हास्य
शोक करुण
क्रोध रौद्र
उत्साह वीर
भय भयानक
जुगुप्सा (घृणा) वीभत्स
विस्मय अद्भुत
निर्वेद शान्त
लेकिन अर्वाचीन विद्वानों ने वात्सल्य के नाम से दसवाँ रस भी स्वीकार कर लिया। किन्तु इसका भी स्थायी भाव रति ही है। अन्तर इतना है कि जब रति बालक के प्रति उत्पन्न होती है तो उससे वात्सल्य की और जब ईश्वर के प्रति होती है तो उससे भक्ति रस की निष्पत्ति होती है।
विभाव
जिसके कारण सहृदय व्यक्ति को रस प्राप्त होता है , वह विभाव कहलाता है। अतः स्थायी भाव का कारण विभाव है। यह दो प्रकार का होता है-
क- आलम्बन विभाव
ख- उद्दीपन विभाव
(I) आलम्बन विभाव
वह कारण जिस पर भान अवलम्बित रहता है- अर्थात् जिस व्यक्ति या वस्तु के प्रति मन में रति आदि स्थायी भाव उत्पन्न होते हैं, उसे आलम्बन कहते हैं तता जिस व्यक्ति के मन में स्थायी भाव उत्पन्न होते हैं उसे आश्रय कहते हैं। उदाहरण के लिए पुत्र की मृत्यु पर विलाप करती हुई माता। इसमें माता आश्रय है और पुत्र आलम्बन है। अतः यहाँ स्थायी भाव शोक है जिससे करुणरस की उत्पत्ति होती है।
(II) उद्दीपन विभाव
जो आलम्बन द्वारा उत्पन्न भावों को उद्दीप्त करते हैं, वे उद्दीपन विभाव कहलाते हैं। जैसे- जंगल में सिंह का गर्जन। इससे भय का स्थायी भाव उद्दीप्त होता है और सिंह का खुला मुख जंगल की भयानकता आदि का उद्दीपन विभाव है। इससे भयानक रस की उत्पत्ति होती है।
अनुभाव
स्थायी भाव के जाग्रत होने पर आश्रय की वाह्य चेष्टाओं को अवुबाव कहा जाता है। जैसे- भय उत्पन्न होने पर हक्का-बक्का हो जाना, रोंगटे खड़े हो जाना, काँपना, पसीने से तर हो जाना आदि।
यदि बिना किसी भावोद्रेक के मात्र भौतिक परिस्थिति के कारण अगर ये चेष्टाएँ दिखाई पड़ती हैं तो उन्हें अनुभाव नहीं कहा जाएगा। जैसे - जाड़े के कारण काँपना या गर्मी के कारण पसीना निकलना आदि।
संचारी भाव
आश्रय के मन में उठने वाले अस्थिर मनोविकारों को संचारी भाव कहते हैं। ये मनोविकार पानी के बुलबुले की भाँति बनते और मिटते रहते हैं, जबकि स्थायी भाव अन्त तक बने रहते हैं।
यहाँ यह भी उल्लेख करना आवश्यक है कि प्रत्येक रस का स्थायी भाव तो निश्चित है परन्तु एक ही संचारी अनेक रसों में हो सकता है। जैसे - शंका शृंगार रस में भी हो सकती है और भयानक रस में भी। यहाँ यह भी विचारणय है कि स्थायी भाव भी दूसरे रस में संचारी भाव हो जाते हैं। जैसे - हास्य रस का स्थायी भाव "हास" शृंगार रस में संचारी भाव बन जाता है। संचारी भाव को व्यभिचारी भाव के नाम से भी जाना जाता है।
रसों के बारे में विस्तार से अपनी अगली किसी पोस्ट में प्रकाश डालूँगा।
Monday, 17 November 2014
"सिमटते स्वप्न की समीक्षा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
श्रीमती आशा लता सक्सेना का
छठवाँ काव्य संकलन
"सिमटते स्वप्न"
पठनीय
रचनाओं से सुसज्जित 186 पृष्ठों की इस पुस्तक को कवयित्री ने स्वयं प्रकाशित किया
गया है। जिसका मूल्य मात्र रु.200/- रखा गया है। काव्य
संग्रह "सिमटते स्वप्न" में कवयित्री ने 186 पृष्ठों में अपनी
155 रचनाओं को सिमेटकर अपनी मितव्यता का परिचय दिया है।
श्रीमती आशा लता सक्सेना ने स्वगत कथन में लिखा है कि उनका लेखन
स्वान्तःसुखाय है। इस काव्यसंग्रह की शीर्षक रचना में वे लिखतीं हैं-
“व्यस्त हो जाती हूँ
घर के काम-काज में
खाली कहा रहता है
मस्तिष्क मेरा छोटा सा
स्वप्न सिमट जाते हैं
व्यस्त दिनचर्या में”
अपनी एक अन्य रचना “विचारों की श्रृंखला” में
वह लिखती हैं-
“हूँ विचारों की पक्षधर
पर हाथ बँधें हैं
आजादी का अर्थ जानती हूँ
पर जीवन की हर साँस
किसी न किसी
परिपाटी में उलझी है
और संस्कारों के बोझ तले
दबी सहमी है”
लेकिन भावनाओं का सैलाब कभी थमता नहीं है।
जिसका उल्लेख कवयित्री ने बहत सहजता से अपनी रचना में किया भी है-
“भावनाओं का सैलाब
कहाँ ले जायेगा
भेद अपने-पराये में
कर न पायेगा”
मँहगाई पर कलम चलाते हुए कवयित्री लिखतीं है-
“मैं हूँ मँहगाई
अनन्त है विस्तार मेरा
एक ओर नियन्त्रण हो तो
दूसरी ओर विस्तार होता
मनुष्य आकंठ डूबा मुझ में
गहन वेदना सहता
फिर भी बच न पाता
मेरे पैने दंश से”
अमूर्त स्वप्न कैसे होते हैं देखिए उनका रचना
का यह अंश-
“सपनों में जीना
उनमें ही खोए रहना
आनन्द है ऐसा
गूँगे के गुड़ जैसा”
बसन्त का स्वागत करते हुए कवयित्री ने लिखा है-
“पीले-लाल, रंग-बिरंगे
पुष्प सजे वृक्षों पर
रंग बसन्ती छाया
धरती की चूनर पर”
चिराग की व्यथा को व्यक्त करते हुए अपने एक
रचना में कवयित्री ने कुछ इस तरह व्यक्त किया है-
“रात भर चिराग जला
एक पल भी न सोया
फिर भी तरसा
एक प्यार भरी निगाह को”
पराजय की पीड़ा को कवयित्री
की लेखनी से देखिए-
“वह क्या जाने पीर हार की
जो कभी हारा ही नहीं
आहत मन ही जानता है
महत्व चोट के अहसास का”
जिन्दगी की परिभाषा बताते हुए कवयित्री ने लिखा
है-
“बोझ क्यों समझा है इसे
है नाम ज़िन्दग़ी इसका
सोचो-समझो विचार करो
फिर जीने की कोशिश करो”
अपनी “फक्कड़” नामक रचना में बचपन को परिभाषीत करते
हुए कवयित्री लिखती है-
“बहुत रोया जब जन्म लिया
माँ की गोद में सोया
सबको बाहों में झूला
लगा खुशियों का मेला
बचपन कब बीता याद नहीं
पर इतना अवश्य याद रहा
वो जीवन सीधा-सादा था
चिन्ताओं से था बहुत दूर”
काव्य लोक में विचरण करने का अपना अलग ही सुख
है। जिसको व्यक्त करते हुए कवयित्री लिखती है-
“विचरण कविता लोक में
स्वप्न लोक से कम नहीं
हर शब्द प्रभावित करता
निहित भावों की सुगन्ध से”
लब्ध प्रतिष्ठित कवयित्री श्रीमती ज्ञानवती
सक्सेना की कोख से विदिशा मध्यप्रदेश में
जन्मी 2 मई, 1943 को आशा लता सक्सेना ने अर्थशास्त्र और अंग्रेजी में स्नातकोत्तर
करने के उपरान्त जीवनपर्यन्त अध्यापन किया। यूँ तो आपने अंग्रेजी में भी कविता
लेखन किया लेकिन देवनागरी के प्रेमपाश में बँधकर हिन्दी में अपनी कविता की सरिता को
आज भी आगे बढ़ा रहीं है। जब भी अपने आस-पास या समाज में कुछ ऐसा घटित होता देखती है, जिसे देखकर उनका मन संवेदनशील हो उठता है तो वही उनको लिखने के लिए प्रेरित करता है। सामाजिक परिवेश की घटनाओं, परिदृश्यों और मानव मन में उठने वाली सहज भावनाओं व विचारों को सरल शब्दावली में व्यक्त करना इनकी भाषा-शैली का एक प्रमुख अंग है।
इस कविता संग्रह को आत्मसात् करते हुए मैंने महसूस किया है कि कवयित्री ने
इसमें जीवन से जुड़े लगभग प्रत्येक विषय जैसे- मतदाता, मँहगाई, बाल दिवस,
झूँठनामा, प्रत्याशी, तितलीरानी, बैलगाड़ी, पारखी नज़र, चिराग, गुलाब, फागुन,
फुलवारी, गौरैया, बन्दर, पीड़ा, बिछोह पर अपनी लेखनी कुशलता से चलायी है। चाहे इनकी कलम से
रचना निकले या मुँह से बात निकले वह अपने आप में कविता से कम नहीं होती है।
अन्त में इतना ही कहूँगा कि इस पुस्तक के सृजनकर्त्री श्रीमती आशा लता सक्सेना महिला होते हुए भी
बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। कुल मिलाकर यही कहूँगा कि “सिमटते स्वप्न” एक पठनीय और संग्रहणीय काव्यसंकलन है।
मेरा विश्वास है कि “सिमटते स्वप्न” काव्यसंग्रह सभी
वर्ग के पाठकों में चेतना जगाने में सक्षम सिद्ध होगा। इसके साथ ही मुझे आशा है कि
यह काव्य संग्रह समीक्षकों की दृष्टि से भी उपादेय सिद्ध होगा।
यह काव्य संकलन श्रीमती आशा लता सक्सेनाके पते सी-47,
एल.आई.जी. ऋषि नगर, उज्जैन (मध्यप्रदेश) से प्राप्त किया जा सकता है।
इनके सम्पर्क नम्बर -
(0734) 2521377 पर फोन करके आप विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
शुभकामनाओं के साथ!
समीक्षक
(डॉ. रूपचन्द्र
शास्त्री ‘मयंक’)
कवि एवं साहित्यकार
टनकपुर-रोड, खटीमा
जिला-ऊधमसिंहनगर
(उत्तराखण्ड) 262 308
E-Mail .
roopchandrashastri@gmail.com
Website. http://uchcharan.blogspot.com/
फोन-(05943) 250129 मोबाइल-09997996437
Tuesday, 23 September 2014
"रपट-खटीमा में रामलीला मंचन शुरू" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
आज दिनांक 22-09-2-14 को
मेरे खटीमा नगर में
श्री रामलीला पात्र परिषद् द्वारा
रामलीला का मंचन प्रारम्भ हो गया।
जिसके मुख्य अतिथि खटीमा फाइबर्स के अध्यक्ष
आर.सी.रस्तोगी ने पूजन के बाद फीता काटकर उद्घाटन किया।
इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में
मा. पुष्कर सिंह धामी, विधायक खटीमा ,
डॉ-जी.सी.पाण्डेय (तपन अस्पताल)
संरक्षक मा. दान सिंह रावत, श्री राजीव अग्रवाल,
पूर्व नगमर पालिका द्यक्ष मराज बत्तरा,
पूर्व सदस्य पिछड़ा वर्ग आयोग (उत्तराखण्ड सरकार)
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री, दद्दा भाई रामचन्द्र प्रेमी,
ईस्वर चन्द्र भगत जी, वरुण अग्रवाल,
व्यापार मण्डल के संरक्षक अरुण सक्सेना जी
तथा नगर के गण्यमान्य लोग उपस्थित थे।
इस उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता
नगर पालिका अध्यक्षा श्रीमता सुरैया बेगम
तथा उनके पति मेंहदी हसन ने की।
Saturday, 13 September 2014
"खटीमा में हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर कवि सम्मेलन" (रपट)
खटीमा (उत्तराखण्ड)
आज हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर संस्कार भारती के तत्वावधान में हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में स्थानीय राणाप्रताप इण्डर कालेज में एक कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता गीताराम बंसल ने की तथा संचालन राजकीय इण्टक कालेज के हिन्दी प्राध्यापक और प्रख्यात कवि डॉ.महेन्द्र प्रताप पाण्डेय "नन्द" ने किया। सम्मेलन के मुख्यअतिथि डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" थे।
कविसम्मेलन की विशेषता यह रही कि जाने-माने कवियों देवदत्तप्रसून, शिव भगवान मिश्र, एम.इलियास सिद्दीकी, अमीर अहमद अमीर, डॉ.राजकिशोर सक्सेना "राज", गेन्दा लाल शर्मा निर्जन, गुरूसहाय भटनागर बदनाम, रामचन्द्र प्रेमी, उदीयमान कवि विनीत मिश्रा, अमन मारवाड़ी, श्री भगवान मिश्रा, डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक, डॉ.महेन्द्र प्रताप पाण्डेय "नन्द", रावेन्द्र कुमार रवि, सितारगंज तथा नानक मत्ता साहिब के दो-दो कविवृन्द आदि के साथ कुल मिला कर 72 कवि-कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। जिसमें विभिन्न विद्यालयों के बालकवि भी शामिल थे।
कवि सम्मेलन अपराह्न 3 से बजे से रात्रि 8 बजे तक चला। इस अवसर पर संस्कार भारती की ओर से कवियों और कवयित्रियों को सम्मानपत्र देकर अलंकृत किया गया।
देखिए इस कवि सम्मेलन की झलकियाँ
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