आज 29 जुलाई को उड़नतश्तरी वाले समीर लाल जी का जन्म दिन है। इस अवसर पर मैं उनको हार्दिक शुभकामनाएँ और बधाइयाँ प्रेषित करता हूँ! लगभग 2 वर्ष पूर्व उन्होंने मेरी बालकृति “नन्हे सुमन” की भूमिका लिखी थी! एक अद्भुत संसार - ’नन्हें सुमन’ आज की इस भागती दौड़ती दुनिया में जब हर व्यक्ति अपने आप में मशगूल है। वह स्पर्धा के इस दौर में मात्र वही करना चाहता है जो उसे मुख्य धारा में आगे ले जाये, ऐसे वक्त में दुनिया भर के बच्चों के लिए मुख्य धारा से इतर कुछ स्रजन करना श्री रुपचन्द्र शास्त्री’मयंक’ जैसे सहृदय कवियों को एक अलग पहचान देता है। ‘मयंक’ जी ने बच्चों के लिए रचित बाल रचनाओं के माध्यम से न सिर्फ उनके ज्ञानवर्धन एवं मनोरंजन का बीड़ा उठाया है बल्कि उन्हें एक बेहतर एवं सफल जीवन के रहस्य और संदेश देकर एक जागरूक नागरिक बनाने का भी बखूबी प्रयास किया है। पुस्तक ‘नन्हें सुमन’ अपने शीर्षक में ही सब कुछ कह जाती है कि यह नन्हें-मुन्नों के लिए रचित काव्य है। परन्तु जब इसकी रचनायें पढ़ी तो मैंने स्वयं भी उनका भरपूर आनन्द उठाया। बच्चों के लिए लिखी कविता के माध्यम से उन्होंने बड़ों को भी सीख दी है! ‘डस्टर’ बहुत कष्ट देता है’’ कविता का यह अंश बच्चों की कोमल पीड़ा को स्पष्ट परिलक्षित करता है- ‘‘कोई तो उनसे यह पूछे, क्या डस्टर का काम यही है? कोमल हाथों पर चटकाना, क्या इसका अपमान नही है?’’ ‘नन्हें सुमन’ में छपी हर रचना अपने आप में सम्पूर्ण है और उनसे गुजरना एक सुखद अनुभव है। उनमें एक जागरूकता है, ज्ञान है, संदेश है और साथ ही साथ एक अनुभवी कवि की सकारात्मक सोच है। आराध्य माँ वीणापाणि की आराधना करते हुए कवि लिखता है- ‘‘तार वीणा के सुनाओ कर रहे हम कामना। माँ करो स्वीकार नन्हे सुमन की आराधना।। इस धरा पर ज्ञान की गंगा बहाओ, तम मिटाकर सत्य के पथ को दिखाओ, लक्ष्य में बाधक बना अज्ञान का जंगल घना। माँ करो स्वीकार नन्हे सुमन की आराधना।।’’ मेरे दृष्टिकोण से तो यह एक संपूर्ण पुस्तक है जो बाल साहित्य के क्षेत्र में एक नया प्रतिमान स्थापित करेगी। मुझे लगता है कि इसे न सिर्फ बच्चों को बल्कि बड़ों को भी पढ़ना चाहिये। मेरा दावा है कि आप एक अद्भुत संसार सिमटा पायेंगे ’नन्हें सुमन’ में, बच्चों के लिए और उनके पालकों के लिए भी! कवि ‘‘मयंक’’ को इस श्रेष्ठ कार्य के लिए मेरा साधुवाद, नमन एवं शुभकामनाएँ! -समीर लाल ’समीर’ http://udantashtari.blogspot.com/ 36, Greenhalf Drive Ajax, ON Canada |
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Sunday, 29 July 2012
“नन्हे सुमन” की भूमिका" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
Thursday, 31 May 2012
"रपट-रविकर जी के सम्मान में गोष्ठी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
"रविकर" जी के सम्मान में कविगोष्ठी!
!!खटीमा (उत्तराखण्ड) 31 मई, 2012!! साहित्य शारदा मंच, खटीमा की ओर से धनबाद से पधारे रविकर फैजाबादी के सम्मान में एक गोष्ठी का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर साहित्य शारदा मंच खटीमा के अध्यक्ष डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने इन्हें अपनी 4 पुस्तकें भेट की और मंच के सर्वोच्च सम्मान "साहित्यश्री" से अलंकृत किया।
ब्लॉगिस्तान में इनकी सक्रियता को देखते हुए "ब्लॉगश्री" के सम्मान से भी सम्मानित किया गया।
गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ नागरिक समिति के अध्यक्ष
सतपाल बत्तरा ने की तथा गोष्ठी का सफल संचालन पीलीभीत से पधारे लब्धप्रतिष्ठित कवि देवदत्त "प्रसून" ने किया।
इस अवसर पर माँ सरस्वती की वन्दना डॉ. मयंक ने प्रस्तुत करते हुए गोष्ठी का शुभारम्भ किया।
इसके बाद वयोवृद्ध रूमानी शायर गुरुसहाय भटनागर ने अपनी ग़ज़ल प्रस्तुत की-
"प्यार से मिलके रह लें गाँव-शहर में-
देश में हमको ऐसा अमन चाहिए।"
स्थानीय थारू राजकीय इण्टर कॉलेज में हिन्दी के प्रवक्ता डॉ.गंगाधर राय ने अपनी एक सशक्त रचना का पाठ किया-
"हे राम अब आओ
पंथ दिखलाओ!
राक्षसी वृत्तियाँ बढ़ रहीं हैं।
मर्यादाएँ टूट रही हैं...."
गोष्ठी के संचालक देवदत्त प्रसून ने इस अवसर पर काव्य पाठ करते हुए कहा-
"आपस के व्यवहार टूटते देखें हैं।
नाते-रिश्तेदार टूटते देखें हैं।।
हाँ पैसों के लोभ के निठुर दबाओं से-
कसमें खाकर यार टूटते देखें हैं।।"
हेमवतीनन्दन राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, खटीमा के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. सिद्धेश्वर सिंह ने इस अवसर पर गंगादशहरा पर अपनी कविता का पाठ किया-
स्कूटर पर सवार होकर
घर आई मिठास
बेरंग - बदरंग समय में
आँखों को भाया
भुला दिया गया सुर्ख रंग
यह तरबूज है सचमुच
या कि घर में
आज के दिन हुआ है गंगावतरण।"
हास्य-व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर गेंदालाल शर्मा "निर्जन" ने अपने काव्य पाठ से गोष्ठी में समा बाँध दिया।
गोष्ठी के मुख्यअतिथि दिनेश चन्द्र गुप्त "रविकर" ने अपने काव्य पाठ में कहा-
"तिलचट्टों ने तेलकुओं पर,
अपनी कुत्सित नजर गड़ाई।
रक्तकोष की पहरेदारी,
नरपिशाच के जिम्मे आई।"
इस अवसर पर "रविकर" जी ने अपने वक्तव्य में कहा-
"मेरा किसी गोष्ठी में भाग लेने का यह पहला अवसर है और पहली बार ही मुझे सम्मान मिला है। इसके लिए मैं साहित्य शारदा मंच के अध्यक्ष डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।"
Friday, 18 May 2012
समीक्षा-“मिटने वाली रात नहीं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
लगभग दो माह पूर्व मुझे आनन्द विश्वास जी ने अपना काव्य संग्रह भेजा। लेकिन अपनी दिनचर्चा में बहुत ज्यादा व्यस्त होने के कारण मैं इस कृति के बारे में अपने विचार प्रकट न कर सका। अब मैंने इस काव्य संकलन को आद्योपान्त पढ़ लिया है और इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि कवि आनन्द विश्वास द्वारा रचित काव्य संकलन “मिटने वाली रात नहीं” उनकी रचनाओं का एक नायाब गुलदस्ता है। जिसे डायमण्ड पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया है। जिसमें 112 पृष्ठों में इक्यावन कविताएँ है और इस पेपरबैक संस्करण का मूल्य मात्र 100 रु. है। कवि ने इस कृति के शीर्षक को अपने शब्दों में बाँधते हुए लिखा है- “दीपक की है क्या बिसात, सूरज के वश की बात नहीं। चलते-चलते थके सूर्य, पर मिटने वाली रात नहीं।“ यों तो संग्रह में बहुत सी रचनाएं हैं और सब एक से बढ़कर एक हैं लेकिन एक स्थान पर अपने लक्ष्य की इच्छाओं के बारे में कवि लिखता है- “तमन्ना-ए-मंजिल कहाँ तक चलूँ, उम्र भर तो चला और कितना चलूँ। डगमगाते कदम कब्र तक तो चलो, एक पल को जहाँ मैं ठहर तो चलूँ।” कवि की कल्पना की उड़ान कहाँ तक जा सकती है इसकी बानगी आप उन्हीं के अन्दाज़ में देखिए- “गोबर, तुम केवल गोबर हो, या सारे जग की, सकल धरोहर हो। तुमसे हो निर्मित, जन-जन का जीवन, तुमसे ही निर्मित, अन्न फसल का हर कन।“ बहुधा पाया जाता है कि जो यायावर प्रकृति का न हो वो कवि ही कहाँ है, आनन्द विश्वास जी की यह झलक उनकी इस रचना में देखने को मिलती है- “चलो कहीं घूमा जाए थोड़ा मन हल्का हो जाए” जीवन में यदि प्रेम न हो तो जीवन का अस्तित्व ही क्या है। कवि ने भी इस पर अपनी कलम चलाते हुए लिखा है- “दीप लौ उबार लो, शीत की बयार से। जीवन सँवार लो प्रीत की फुहार से।।“ इसी भाव को दृष्टिगत रखते हुए कवि आगे लिखता है- “सूरज उगे या शाम ढले, मेरे पाँव सजनवा के गाँव चले।“ ग्रामीण जीवन में सर्दी के मौसम का चित्रांकन करते हुए कवि कहता है- “चलो बैठ जाएँ अपनी रजइया में, आग थोड़ी धर लो कढ़इया में।“ प्रस्तुत काव्य संग्रह में कवि ने विविध विषयों की रचनाएँ समाहित की हैं। उनकी जन-जागरण करती हुई इस रचना को ही लीजिए- “जागो भइया अभी समय है वर्ना तुम भी जी न सकोगे। गंगा का पानी दूषित है गंगाजल तुम पी न सकोगे।“ त्यौहार जीवन में नया उत्साह और नया विश्वास जगाते हैं- “जलाओ दीप जी भरकर, दिवाली आज आई है। नया उत्साह लाई है, नया विश्वास लाई है।“ हर एक व्यक्ति का सपना होता है कि उसका अपना एक घर हो! जिसकी छत के नीचे वह चैन और सुकून महसूस कर सके। कवि ने इसी पर प्रकाश डालते हुए कहा है- “अपना घर अपना होता है, ये जीवन का सपना होता है।“ कवि का दृष्टिकोण सन्देश और सीख के बिना अधूरा सा प्रतीत होता है लेकिन मुझे इस काव्य संग्रह में इसका अभाव किसी भी रचना में नहीं खला है- “अगर सीखना चाहो तो, हर चीज तुम्हें शिक्षा देगी। शर्त यही है कुछ पाने की, जब तुममें इच्छा होगी।” कुल मिला कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि इस काव्य संग्रह के रचयिता ने “मिटने वाली रात नहीं“ में अपने कविधर्म को बाखूबी निभाया है। नयनाभिराम मुखपृष्ठ, स्तरीय सामग्री तथा निर्दोष मुद्रण सभी दृष्टियों से यह स्वागत योग्य है। मुझे विश्वास है कि आनन्द विश्वास जी इसी प्रकार अधिकाधिक एवं उत्तमोत्तम ग्रंथों की रचना कर हिंदी की सेवा में अग्रणी बनेंगे। सुंदर सजीव चित्रात्मक भाषा वाली ये रचनाएँ संवेदनशीलता के मर्म में डुबोकर लिखी गई हैं। आशा है कहीं न कहीं ये हर पाठक को गहराई से छुएँगी। इस सुंदर संग्रह के लिये आनन्द विश्वास जी को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ। |
Friday, 30 March 2012
"कर्मनाशा-मर्मस्पर्शी रचनाओं का संकलन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मर्मस्पर्शी रचनाओं का संकलन है
“कर्मनाशा”
लगभग दो माह पूर्व डॉ. सिद्धेश्वर सिंह द्वारा रचित मुझे एक कविता संग्रह मिला जिसका नाम था “कर्मनाशा”। साठ रचनाओं से सुसज्जित 128 पृष्ठों की इस पुस्तक को अन्तिका प्रकाशन, गाजियाबाद द्वारा प्रकाशित किया गया है। जिसका मूल्य रु.225/- रखा गया है। जनसाधारण की सोच से परे इसका आवरण चित्र रवीन्द्र व्यास ने तैयार किया है।
इस कविता संग्रह को आत्मसात् करते हुए मैंने महसूस किया है कि इसके रचयिता डॉ. सिद्धेश्वर सिंह स्वयं में एक कविताकोष हैं। चाहे उनकी लेखनी से रचना निकले या मुँह से बात निकले वह अपने आप में कविता से कम नहीं होती है।
रचनाधर्मी ने निज़ार कब्बानी की कविता के अनुवाद के रूप में अपनी इच्छा प्रकट करते हुए लिखा है-
“तुम्हारी आँखों में
मैं जगमग करूँगा आने वाले वक्त को
स्थिर कर दूँगा समय की आवाजाही
और काल के असमाप्य चित्रपट से
पोंछ दूँगा उस लकीर को
जिससे विलय होता है यह क्षण”
और निकाल ही लिया उस पगदण्डी को जिसे बीच का रास्ता कहा जाता है-
“नहीं थी
कहीं थी ही नहीं बीच की राह
खोजता रहा
होता रहा तबाह.....”
आज जमाना इण्टरनेट का है और उसमें एक साइट है फेसबुक! जिसके बारे में कवि ने प्रकाश डाला है कुछ इस प्रकार से-
“की-बोर्ड की काया पर
अनवरत-अहर्निश
टिक-टिक टुक-टुक
खुलती सी है इक दुनिया
कुछ दौड़-भाग
कुछ थम-थम रुक-रुक....”
हर वर्ष नया साल आता है लोग नये साल में बहुत सी कामनाएँ करते हैं मगर रचनाधर्मी ने इसे बेसुरा संगीत का नाम देते हुए लिखा है-
“देखो तो
शुरू हो गया और एक नया साल
नये-नये तरीके और औजार हैं
सहज उपलब्ध
जिन पर सवार होकर
यात्रा कर रहीं हैं शुभकामनाएँ
और उड़े जा रहे हैं संदेश.....
...... ...... .......
ग़ज़ब नक्काशी उभर आयी है हर ओर
...... ...... .......
और रात्रि की नीरवता में
भरता जा रहा है
एक बेसुरा संगीत”
“कर्मनाशा” के बारे में भी कवि ने पाठकों को जानकारी दी है कि आखिर कर्मनाशा क्या है?....
“फूली हुई सरसों के
खेतों के ठीक बीच से
सकुचाकर निकलती है एक पतली धारा।
...... ...... .......
भला बताओ
फूली हुई सरसों
और नहाती हुई स्त्रियों के सानिध्य में
कोई भी नदी
आखिर कैसे हो सकती है अपवित्र“
पुस्तक के रचयिता ने अपने इस संग्रह में पर्यायवाची, कस्बे में कविगोष्ठी, अंकुरण, वेलेण्टाइन-डे, बालदिवस, लैपट़ाप, तलाश, सितारे, प्रतीक्षा, घृणा, तिलिस्म, हथेलियाँ, टोपियाँ आदि विविध विषयों पर भी अपनी सहज बात कविता में कही है।
अन्त में इतना ही कहूँगा कि इस पुस्तक के रचयिता डॉ. सिद्धेश्वर सिंह बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं और खटीमा के राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक हैं। लेकिन वे अंग्रेजी पर भी हिन्दी के समान ही अधिकार रखते हैं। इसीलिए उनको अनुवाद में खासी दिलचस्पी है। कुल मिलाकर यही कहूँगा कि उनकी “कर्मनाशा” एक पठनीय और संग्रहणीय काव्य पुस्तिका है।
Saturday, 10 March 2012
"समीक्षा-टूटते सितारों की उड़ान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
टूटते सितारों की उड़ान
सत्यम् शिवम् ब्लॉगिस्तान की दुनिया में एक ऐसा युवा चेहरा है जिसने अपनी लेखनी के बल पर हिन्दी ब्लॉगिंग में अपनी एक पहचान बनाई है। ये पेशे से अभियन्ता हैं लेकिन शब्दों को भी इन्होंने अपने अभियन्त्रण से नियन्त्रित किया है।
स्वार्थी दुनिया में लोग अपनी कृतियों को ही प्रकाशित करा कर सुख का अनुभव करते हैं लेकिन इन्होंने निःस्वार्थभाव से हिन्दी ब्लॉगिंग के जाने माने बीस रचनाधर्मियों की रचनाओं को एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराया है। इस काव्य संकलन को इन्होंने नाम दिया है “टूटते सितारों की उड़ान”।
जब इन्होंने मुझसे इस विषय में चर्चा की तो मैं चौंका कि 20 कवियों की काव्य माधुरियों के संकलन का नाम “टूटते सितारों की उड़ान” क्यों रखा गया है। लेकिन मंथन करने के बाद समझ में आया कि इसका शीर्षक बिल्कुल सही रखा गया है। क्योंकि सितारों की किस्मत ही टूटना रही है। और हो भी क्यों नहीं। अन्तर्जाल पर झिलमिलाते सितारों की उडान कब थम जाए कोई नहीं जानता है। मैंने अपने तीन वर्षों के अनुभवों से यही तो सीखा है!
दो सौ आठ पृष्ठों के इस काव्य संग्रह को उत्कर्ष प्रकाशन, मेरठ ने प्रकाशित किया है। जिसका ISBN 978-81-921666-4-3 है और इसका सम्पादन इं. सत्यम् शिवम् द्वारा किया गया है। यह पेपर बैक संस्करण हैं जिसका मूल्य मात्र 251रुपये रखा गया है।
सम्पादक ने अपनी बात में कहा भी है –
"जीवन संघर्ष का दूसरा नाम है और काव्य सृजन संघर्षरत मन की व्यथा के उदगार....।"
"आज के परिवेश में लोग ऐसा सोचने लगे हैं, जितना ज्यादा दिखावा उतना ज्यादा फायदा। पर इस सन्दर्भ में मेरा सोचना अलग है। मैं ऐसा सोचता हूँ कि जो वाकई सुन्दर है, उत्कृष्ट है उसकी सुन्दरता तो शाश्वत है।.......क्योंकि सफलता कुछ और नहीं बस आत्म संतुष्टि है।"
सम्पादक आगे कहता है कि-
"मैं तुम्हारे रंग में अब रंग गया हूँ,
संग तेरे ही तुझी में ढल गया हूँ।
कौन सी पहचान मेरी कौन हूँ मैं?
तुम हो मेरे या मैं तेरा हो गया हूँ।।".....
"जिसके कारण मैं आज “टूटते सितारों की उड़ान” काव्य का संपादन कर रहा हूँ। बड़ी ही मशक्कत और तल्लीनता के साथ मैंने 20 भावप्रधान कवियों को इस काव्य संग्रह के लिए चुना है। जिनकी भावनाएँ दिल पर गहरा असर करती हैं...।"
"टूटते सितारों की उड़ान" में जिन बीस कवियों की काव्य माधुरियों को स्थान दिया गया है वे हैं-
1- राज शिवम्
2- संगीता स्वरूप
3- रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
4- दर्शन कौर धनोए
5- वन्दना गुप्ता
6- अशोक शुक्ला
7- गौरव 'सुमन'
8- बब्बन पाण्डेय
9- माहेश्वरी कानेरी
10- नीरज द्विवेदी
11- लक्ष्मी नारायण लहरे 'साहिल'
12- साधना वैद
13- दिव्येन्द्र कुमार 'रसिक'
14- विभोर गुप्ता
15- नील कमल वैष्णव 'अनिश'
16- सुषमा 'आहुति'
17- उदयवीर सिंह
18- प्रदीप कुमार साहनी (दीपक)
19- सत्यम् शिवम्
अन्त में मैं इस संकलन के बारे में इतना ही कहूँगा कि यह एक पठनीय और संग्रहणीय काव्य संग्रह है।
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
टनकपुर-रोड, खटीमा
जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड)
ई-मेल- roopchandrashastri@gmail.com
वेब साइट- http://uchcharan.blogspot.in/
फोन/फैक्स- 05943-250207, 05943-250129
Mobiles:
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Friday, 6 January 2012
"विनीत संग पल्लवी-सत्यकथा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
उसके मन में बहुत कुंठाए थीं, जिसके कारण मेरा छोटा पुत्र लगभग मानसिक रोगी हो गया था। कभी दिल में दर्द तो कभी उसके सिर में भयंकर दर्द हो जाता था। वह बहुत दिनों से मन में दबाए हुए बैठा था कि कैसे वह अपना राज़ परिवार वालों के साथ साझा करे।
लेकिन एक दिन मैंने प्यार से उससे पूछ ही लिया कि बेटा क्या बात है जो तुम युवावस्था में इतने परेशान रहते हो।
उसने कहा- “पापा पहले यह बताओ कि मेरी बात सुनकर आप मुझे घर से तो निकाल नहीं दोगे।“
बेटे ने उत्तर दिया- “पापा मैंने दो साल पहले 2 फरवरी, 2010 को आर्य समाज, पीलीभीत में शादी कर ली है और उसके बाद हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत सितारगंज फैमिली कोर्ट से अपने विवाह को पंजीकृत भी करा लिया है।“
मैंने सहजभाव से पुत्र विनीत के निर्णय को स्वीकार कर लिया और उसे बधाई दी। अब मैंने पूछा कि हमारी बहू कौन है और क्या करती है. कहाँ की रहने वाली है?
विनीत ने बताया कि पापा! वह इंजीनियर है। उसका नाम पल्लवी है, रुड़की की रहने वाली है और देहरादून में मैनेजमेंट के किसी इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाती है।
इस पर मैंने विनीत से कहा कि बेटा! पल्लवी को शीघ्र ही यहाँ बुला लो। मेरी बात मानकर उसने पल्लवी को घर पर बुला लिया है।
विनीत की मम्मी जी ने थोड़ा सा विरोध तो अवश्य किया लेकिन अब उन्होंने भी पल्लवी को अपनी बहू के रूप में स्वीकार कर लिया है। हमारे घर में तो खुशियाँ अनायास ही खुद-ब-खुद चल कर आ गईं हैं।
सोच रहा हूँ कि इनकी वैवाहिक वर्षगाँठ पर पूरे शहरभर का प्रीतिभोज करके दोनों के विवाह को सामाजिक मान्यता भी दिला दूँ!
बेटी के रूप में मिली पुत्रवधु "पल्लवी"
पुत्रवधु को आशीर्वाद देते हुए हम पति-पत्नी
विनीत ने परिवार की मौजूदगी में पल्लवी को अँगूठी पहनाई।
पल्लवी की सासू माँ
विनीत से अपनी बहू की माँग भरवाती हुई।
सुहाग का प्रतीक विछुए पहनाई हुई श्रीमती अमर भारती
अब पैरों में पायल भी तो पहनानी थी।
श्रीमती अमर भारती अपने गोत्र "गरुड़िया" का नाम लेकर
दोनों का सिरजोड़ा करके अपने गोत्र में मिलाती हुई
अपनी दादी सासू के साथ श्रीमती पल्लवी
हम दोनों ने वस्त्र और आभूषण देकर
पल्लवी को अपनी पुत्रवधु के रूप में स्वीकार कर लिया!
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