दैनिक अमर उजाला
दिनांक 04-10-2013
पृष्ठ-6, कॉलम 7-8
नैनीताल-ऊधमसिंह संस्करण
♥ समाचार ♥
‘... दे देंगे
जान वतन पर कश्मीर नहीं देंगे।’
खटीमा।
संस्कार भारती के तत्वावधान में गांधी जयंती के अवसर पर आयोजित काव्य मंच में
कवियों और साहित्यकारों ने अपने कविता पाठ से उपस्थित जनों को मंत्रमुग्ध कर
दिया।राणा प्रताप इंटर कालेज में डा. रुप चंद्र शास्त्री 'मयंक' की अध्यक्षता में आयोजित काव्य मंच का शुभारंभ अनिल कुमार कपिल ने मां सरस्वती के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्जवलित कर किया। शहजादा अवसार सिद्दीकी ने कहा ‘अहसास किसी दर्द का होने नहीं देता, बेवजह मां को मैं रोने नहीं देता। बेटी को न ले जाये अंधेरों के लुटेरे, ये खौफ किसी बाप को सोने नहीं देता’। गेंदालाल शर्मा निर्जन ने अपने कविता पाठ में ‘...सतत परिश्रम करें तो भारत विश्व गुरु बन जाए।’ डा. तारकेश्वर ने कहा ‘सत्य अहिंसा का पुजारी आज भी यह कह रहा, अपना लो मुझे आज ऐसा ही कुछ कह रहा।’ दयाशंकर शर्मा ने कहा ‘सत्य अहिंसा भातृभाव के जीवन भर आदी थे, गीता के पालक राष्ट्रपिता वह हमारे गांधी थे।’ जीएस भटनागर ने कश्मीर के मुद्दे पर कहा ‘नापाक इरादों को हम पलने नहीं देंगे, दे देंगे जां वतन पर कश्मीर नहीं देंगे’। देवदत्त प्रसून ने नेताओं पर कटाक्ष करते हुए कहा ‘कुकुरमुत्तों से उगे नेता आज अनेक, गांधी जैसा कौन अब चले लकुटिया टेक’। डा. रूप चंद्र शास्त्री ने कहा ‘सत्य अहिंसा का पथ जिसने दुनिया को दिखलाया, सारे जग से न्यारा गांधी अपना वापू कहलाया’ विभूति ने महंगाई पर कहा ‘महंगाई इतना बढ़ी नहीं ठिकाना आज करती क्या सरकार है लिए है अपना साज’। इस अवसर पर डा. एम इलियास सिद्दीकी, रामचंद्र प्रेमी, एसबी मिश्रा, गीताराम बंसल, डा. सिद्धेश्वर सिंह, खेम सिंह सामंत, हरीश जोशी, हरीश गंगवार, साकेत शाही, संतोष अग्रवाल, हामिद हुसैन हामिद, कृष्णा नंद भट्ट आदि मौजूद थे। ब्यूरो |
समर्थक
Wednesday, 9 October 2013
♥ समाचार ♥ ‘... दे देंगे जान वतन पर कश्मीर नहीं देंगे।’ (दैनिक अमर उजाला)
Friday, 30 August 2013
"पुस्तक समीक्षा प्रारब्ध" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
अभिव्यक्तियों का
उपवन है "प्रारब्ध"
-0-0-0-
कुछ समय पूर्व मुझे श्रीमती आशा लता सक्सेना के काव्यसंकलन “प्रारब्ध” की प्रति डाक से मिली थी। आज
इसको बाँचने का समय मिला तो “प्रारब्ध” काव्यसंग्रह के बारे में कुछ
शब्द लिखने का प्रयास मैंने किया है।
श्रीमती आशा लता सक्सेना जी से कभी मेरा साक्षात्कार तो नहीं हुआ लेकिन
पुस्तकों के माध्यम से उनकी हिन्दी साहित्य के प्रति गहरी लगन देख कर मेरा मन गदगद
हो उठा। आज साहित्य जगत में कम ही लोग ऐसे हैं जिन्होंने अपनी लेखनी को पुस्तक
का रूप दिया है।
इस कृति के बारे में शासकीय संस्कृत महाविद्यालय की हिन्दी विभागाध्यक्ष
डॉ. रंजना सक्सेना लिखती हैं -
“श्रीमती आशा सक्सेना का काव्य संकलन ‘प्रारब्ध’ सुखात्मक और दुखात्मक
अनुभूति से उत्पन्न काव्य है। पहले ‘अनकहा सच’ फिर ‘अन्तःप्रवाह’ और अब ‘प्रारब्ध’... ऐसा प्रतीत होता है मानो कवयित्री ने उस सब सच को कह डाला, जो चाह कर भी पहले कभी कह न पायी हों और अब
कहने लगी तो वह प्रवाह अन्तःकरण से निरन्तर बह निकला। फिर अपने भाग्य पर कुछ
क्षण के लिए ठिठक कर रह गयी और अब...लेखनी को एक हिम्मत-एक आत्मविश्वास के साथ
अपना लक्ष्य मिल गया है जो निरन्तर ह्रदय से अद्भुत विचारों और भावनाओं को गति
देता रहेगा।"
डॉ.शशि
प्रभा ब्यौहार, प्राचार्य-शासकीय संस्कृत महाविद्यालय, इन्दौर ने अपने शुभाशीष
देते हुए पुस्तक के बारे में लिखा है-
"मैं हूँ एक चित्रकार रंगों से चित्र सजाता हूँ।
हर दिन कुछ नया करता हूँ
आयाम सृजन का बढ़ता है।
आशा लता सक्सेना का लेखकीय सरोकार सृजन रंगों से सराबोर जीवन यथार्थ की इसी
पहचान से जुड़ा है..."प्रारब्ध"
काव्य संग्रह की रचनाएँ केवल गृह, एकान्त, स्त्रीजीवन के ब्योरे मात्र नहीं हैं
वरन् वे सच्चाइयाँ हैं जिन्हें बार-बार नकारा जाता है।... संग्रह का मूल स्वर
आस्था, जिजीविषा है जीवन के पक्षधर इन रचनाओं में प्रत्येक से जुड़ने का सार्थक
भाव है।...”
श्रीमती आशा लता सक्सेना ने अपने निवेदन में भी यह स्पष्ट किया है-
“मैं एक संवेदवशील भावुक महिला हूँ। आस-पास की छोटी-छोटी घटनाएं भी मुझे
प्रभावित करती हैं। मन में उमड़ते विचारों और अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने के
लिए कविता लेखन को माध्यम बनाया है।
अब तक लगभग 630
कविताएँ लिखी हैं। सरल और बोधगम्य भाषा में अपने विचार लिपिबद्ध किये हैं।
....मुझेघर से जो सहयोग और प्रोत्साहन मिला है वह अतुल्य है। उनके सहयोग के कारण
ही मैं कुछ कर पायी हूँ। ...."
"प्रारब्ध"
में अपनी वेदना का स्वर मुखरित करते हुए कवयित्री कहती है-
“मैं नहीं जानती
क्यों तुम्हें
समझ नहीं पाती
तुम क्या हो क्या
सोचते हो
क्या प्रतिक्रिया
करते हो..."
कवयित्री आगे कहती है-
“महकता गुलाब और गुलाबी रंग
सबको अच्छा लगता
है
और सुगन्ध
उसकी साँसों में
भरती जाती है
ऐ गुलाब तुम
कमल से ना हो
जाना
जो कीचड़ में
खिलता है
पर उससे लिप्त
नहीं होता..."
कवयित्री के इस काव्य में कुछ कालजयी कविताओं का भी समावेश है जो किसी
भी परिवेश और काल में सटीक प्रतीत होते हैं-
“उड़ चला पंछी
कटी पतंग सा,
समस्त बन्धनों से
हो मुक्त
उस अनन्त आकाश
में
छोड़ा सब कुछ
यहीं
यूँ ही इस लोक
में
बन्द मुट्ठी लेकर
आया था..."
कवयित्री अपनी एक
और कविता में कहती हैं-
“दीपक ने पूछा पतंगे से
मुझमें ऐसा क्या
देखा तुमने
जो मुझ पर मरते
मिटते हो
जाने कहाँ छिपे
रहते हो
पर पाकर
सान्निध्य मेरा
तुम आत्म हत्या
क्यों करते हो..."
श्रीमती आशा लता सक्सेना ने इस
काव्य संकलन में कुछ क्षणिकाओं को भी समाहित किया है-
“ज़ज़्बा प्रेम का
जुनून उसे पाने
का
कह जाता बहुत कुछ
उसके होने का..."
विश्वास
के प्रति अपनी वेदना प्रकट करते हुए कवयित्री कहती है-
“ऐ विश्वास जरा ठहरो
मुझसे मत नाता
तोड़ो
जीवन तुम पर टिका
है
केवल तुम्हीं से
जुड़ा है
यदि तुम ही मुझे
छोड़ जाओगे
अधर में मुझको
लटका पाओगे..."
“प्रारब्ध” की शीर्षक रचना के बारे में कवयित्री आशा लता सक्सेना लिखतीं
है-
“जगत एक मैदान
खेल का
हार जीत होती
रहती
जीतते-जीतते कभी
पराजय का मुँह
देखते
विपरीत स्थिति में
कभी होते
विजय का जश्न मनाते
राजा को रंक होते
देखा
रंक कभी राजा
होता...!"
समीक्षा की दृष्टि से मैं कृति के बारे में इतना जरूर कहना चाहूँगा कि
इस काव्य संकलन में मानवता, प्रेम, सम्वेदना जिज्ञासा
मणिकांचन संगम है। कृति पठनीय ही नही अपितु संग्रहणीय भी है और कृति में अतुकान्त काव्य का नैसर्गिक सौन्दर्य निहित है। जो पाठकों के हृदय पर
सीधा असर करता है।
श्रीमती आशा लता सक्सेना द्वारा रचित इस की प्रकाशक स्वयं श्रीमती आशा
लता सक्सेना ही है। हार्डबाइंडिंग वाली इस कृति में 192 पृष्ठ हैं और इसका मूल्य
मात्र 200/- रुपये है। सहजपठनीय फॉंण्ट के साथ रचनाएँ पाठकों के मन पर सीधा असर करती
हैं।
मुझे पूरा विश्वास है कि “प्रारब्ध” काव्यसंग्रह सभी वर्ग के पाठकों में चेतना जगाने में सक्षम है। इसके साथ ही मुझे आशा
है कि “प्रारब्ध” काव्य संग्रह समीक्षकों की दृष्टि से भी उपादेय सिद्ध होगा।
“प्रारब्ध” श्रीमती आशा लता सक्सेना के पते सी-47, एल.आई.जी,
ऋषिनगर, उज्जैन-456 010 से प्राप्त की जा सकती है। कवयित्री से दूरभाष-(0734)2521377
से भी सीधा सम्पर्क किया जा सकता है।
शुभकामनाओं के
साथ!
समीक्षक
(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
कवि एवं
साहित्यकार
टनकपुर-रोड, खटीमा
जिला-ऊधमसिंहनगर
(उत्तराखण्ड) 262 308
E-Mail .
roopchandrashastri@gmail.com
Website. http://uchcharan.blogspot.com/
फोन-(05943)
250129
मोबाइल-09368499921
|
Thursday, 1 August 2013
"पुरुषोत्तम पाण्डेय का एक संस्मरण" (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
हिलक्रेस्ट ओर्चार्ड, जॉर्जिया, USA

मेरा बचपन उत्तरांचल के आँचल में ही बीता. मैंने बसंत ऋतु के आगमन पर आड़ू और सेव को बौराते हुए देखा था. शिशिर/हेमंत की ठण्ड की मार के बाद पेड़ों में एक भी पत्ता नहीं रह जाता है, और थोड़ी सी गर्माहट मिलते ही, पहले बैगनी आभा वाले श्वेत पुष्प निकलने के बाद ही नव कोपल पत्तों के रूप में प्रस्फुटित होते हैं. एक मदमाती गन्ध फूलों से आती है, मधुमक्खियाँ परागण तो करती ही हैं, स्वयं भी मधु लेकर जाती हैं. हमारे घर गाँव में इक्के-दुक्के पेड़ दूर-दूर लगे रहते थे और वहां के लोगों के लिए ये नजारा विशेष कौतुक या आकर्षण का नहीं होता था. क्योंकि ये उनके जीवन का नित्यक्रम जैसा रहता था.
मैं सन २००८ की सर्दियों में अपने परिवार के साथ हिमांचल के मनाली में हिमपात का आनंद लेने गया तो रास्ते में कुल्लू की मुख्य सड़क के दोनों ओर असंख्य सेव के नंगे पेड़ देखे. इतने सेव के पेड़ एक साथ मैंने पहली बार देखे. मैं उन पेड़ों के एक साथ पुष्पित होने की छटा की कल्पना करके अपने कवि मन को आह्लादित पा रहा था.
इस साल यानि २०११ में, अपने अमेरिका प्रवास के दौरान, मेरी बेटी-दामाद ने मुझे और मेरी श्रीमती को अनेक दर्शनीय स्थलों तक ले जाकर नए-नए अनुभव करने के अवसर दिये. उनमें से एक है, हिलक्रेस्ट ओर्चार्ड, GA,या नि जॉर्जिया राज्य का सेव का बगीचा. अगर आप इन्टरनेट पर तलाश करेंगे तो आपको अमेरिका के अनेकों हिलक्रेस्ट ओर्चार्ड की लिस्ट मिल जायेगी. पर जब आप GA यानि जॉर्जिया लिखेंगे तो उपरोक्त बगीचा मिल जाएगा.
जॉर्जिया एक बहुत बड़ा राज्य है जो संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिणी हिस्से में है. वैसे तो पूरा देश एक समृद्ध व विकसित राष्ट्र है, पर मुझे जॉर्जिया का हर इलाका, हर संस्थान व हर दर्शनीय स्थल कई मायनों में उत्तम लगे. जॉर्जिया के उत्तर में टेनेसी प्रांत के जोड़ पर हरे भरे पर्वत मालाओं का घेरा है, इसी के आँचल में है ये सेव का बगीचा. अटलांटा से करीब डेढ़ घन्टे की सड़क यात्रा के बाद जो दृश्य मैंने देखा उसकी कल्पना भी नहीं की थी.
अक्टूबर माह, शनिवार का दिन, सार्वजनिक रूप से अवकास का दिन, जब हमारी कार हिलक्रेस्ट के गेट पर पहुँची तो १००० गाड़ियों की पार्किंग फुल मिली. थोड़ी देर बाद जब कुछ गाड़ियों की निकासी हुई तब जाकर ऐंट्री हो सकी. ओर्चार्ड के अन्दर जाने का टिकट तीन डालर था. खुद सेव तोड़ कर घर ले जाने के लिए एक जालीदार थैला ६ डालर में उपलब्ध था. जाली में ढाई तीन किलो तक सेव रखने की गुंजाइश थी.
बिक्री के लिए सेवों का ढेर वहाँ पड़ा था पर जब हम बागीचे के अन्दर घुसे तो वहा का विहंगम दृश्य देख कर स्वप्न-लोक का सा नजारा लग रहा था. हजारों पेड़ लाल-हरे रंगों के फलों से लदे हुए थे. नीचे जमीन पर गिरे हुए सेव भी असंख्य थे. ऐसा लग रहा था जैसे सेवों के समुद्र में उतर आये हों.
हम ५ भारतीय परिवार साथ गए थे. कुछ के छोटे बच्चे भी साथ में थे. सबने खूब आनंद लिया. अपने घरों से खाना बना कर ले गए थे साथ बैठ कर पिकनिक का सा मजा ले रहे थे. भोजन स्थल पर एक स्टेज था जिस पर आर्केस्ट्रा के धुनों पर कलाकार गाना गा रहे थे. घोड़ा-बग्घी व ट्रेक्टर गाड़ी में इस कई एकड़ में फैले हुए बाग को देखने का इन्तजाम था. दो शताब्दी पुरानी अमरीकी पारिवारिक व्यवस्था का एक मजेदार म्यूज़ियम भी अन्दर देखने को मिला. बच्चों के मनोरंजन के लिए कई खेल तथा झूले थे. अद्भुत मेले जैसा नजारा था.
इसी बाग के दक्षिणी छोर पर बच्चों के लिए विशेष ऐनीमल पार्क बना रखा था, जहां बकरी, खरगोश, मुर्गी, बत्तख, गाय आदि घरेलू जानवर बंधे हुए थे. वहाँ के जानवरों के साथ स्पर्श-सुख (animal petting) लेने का टिकट अलग से ३ डालर था. वहां पर दूध देने वाली गाय भी थी. बच्चे एक-दो धार खींच कर आगे बढ़ जाते थे.
पर्यटकों के लिए रेस्टोरेंट + रेस्टरूम (अमेरिका में बाथरूम को रेस्टरूम कहा जाता है) की सुविधा बहुत थी. वेबसाईट पर लिखा है कि ये मेला सिर्फ सेवों के तैयार होने पर अक्टूबर माह में निश्चित अवधि तक ही चलता है. यहाँ के लोगों को इस अवसर का हर साल इन्तजार रहता है.
Monday, 8 April 2013
"एक शाम-हरि शर्मा के नाम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
|
मित्रों!
आज देर शाम मुझको एक फोन आया- “मैं हरि शर्मा बोल रहा हूँ। आपने पहचाना
कि नहीं।“
मैंने उत्तर दिया- “नहीं”
फिर कहा “मैं ब्लॉग लिखता हूँ आपने मेरी कई पोस्टों पर कमेंट भी दिये
हैं।“
मैंने उत्तर दिया कि मुझे कुछ याद आ रहा है। कहीं आप नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे वाले हरि शर्मा तो नहीं हैं। तह वो बोले कि हाँ सर! मैंने आपका
नम्बर दिल्ली वाली श्रीमती वन्दना गुप्ता जी से लिया है। आजकल मैं सालभर से अल्मौड़ा
जिले की सोमेश्वर शाखा में भारतीय स्टेट बैंक में शाखाप्रबन्धक हूँ। किसी काम से टनकपुर जा रहा हूँ तो सोचा कि रास्ते में खटीमा
पड़ेगा। तभी याद आया कि खटीमा में तो एक जाने-माने ब्लॉगर डॉ. रूपचन्द्र
शास्त्री ‘मयंक’ जी रहते हैं।
इसके बाद हरि शर्मा जी बोले कि सर ये मेरे
लिए सौभाग्य की बात होगी कि मेरी मुलाकात आज ब्लॉगिंग के पुरोधा से होगी।
मैंने शर्मा जी को अपने घर का पता बताया
कि मेरा घर बरेली-टनकपुर हाइ-वे पर ही है। आप सौरभ अस्पताल के पास आ जाइए उससे
मिलता हुआ ही मेरा निवास है।
उनके साथ सोमेश्वर के ही एक जानी-मानी शख्शियत मंगल सिंह भी थे। लगे हाथ
उनसे भी भेंट हो गयी। शर्मा जी उन्हीं के साथ उनकी नयी ऑल्टो-800 में आये थे।
चाय का दौर शुरू हुआ तो ब्लॉगजगत की
बहुत सारी बातें भी हो गई। आधे घंटे की इस मुलाकात में कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि
मैं किसी अपरिचित व्यक्ति से मिल रहा हूँ बल्कि यह आभास हुआ कि मैं अपने वर्षों
पुराने किसी अभिन्न मित्र से मिल रहा हूँ।
चलते-चलते शर्मा जी ने मुझे सोमेश्वर (अल्मौड़ा) आने का न्यौता भी दिया।
हरि शर्मा जी का संक्षिप्त परिचय
नाम हरि प्रसाद शर्मा
उम्र : ४७
लिंग: पुरुष
खगोलीय राशि: मीन
उद्योग: बैंक अधिकारी भा.स्टेट बैंक
व्यवसाय: प्रबन्धक
स्थान: सोमेश्वर,जिला अल्मौड़ा (उत्तराखण्ड) भारत |
Tuesday, 8 January 2013
"पुस्तक समीक्षा-वसुन्धरा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
मुक्तकों का उपवन है "वसुन्धरा"
-0-0-0-
इस सप्ताह में मुझे “वसुन्धरा” काव्यसंग्रह
की प्रति डाक से मिली थी। आज इसको बाँचने का समय मिला तो “वसुन्धरा” काव्यसंग्रह
के बारे में कुछ शब्द लिखने का प्रयासभर ही मैंने किया है।
इस
कृति के बारे में आदरणीय महेन्द्र प्रताप पाण्डेय नन्द लिखते हैं-
“साहित्यानन्द ब्रह्मानन्द का सरोवर है। यह उक्ति कामेश्वर प्रसाद डिमरी जी की रचनाकृति वसुन्धरा के अवलोकन तथा पठन के बाद समीचीन प्रतीत
होता है। हिन्दी साहित्याकाश में नक्षत्ररूपी कवियों की अधिकता से सभी परिचित हैं।
हिन्दी की सरलता ही बहुत लोगों को सर्जक बनाने का सत्कार्य करती है।
.....डिमरी जी के साहित्य में पुष्ट तार्किकता, ऐतिहासिकता,
सामाजिक विद्रूपता, समाज की विषमता, फैसन की उड़ान, पर्यावरणीय असंतुलन, मानव
सत्रांश का अगर जिक्र किया गया है तो तो वहीं उन समस्त समस्याओं का सरल सुझाव भी
कृति प्रदान करती है...।“
वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार सग़ीर अश़रफ़ ने अपने शुभाशीष
देते हुए पुस्तक के बारे में लिखा है-
“....इस बाजारवाद की भीड़ से पृथक पं. कामेश्वर प्रसाद डिमरी का
चतुर्थ काव्य संग्रह “वसुन्धरा” पूर्वरचित काव्यों की भाँति एक विषयान्तर्गत पर्यावरण व
प्रकृति को काव्य का आधार मान वर्तमान से आगत के शुभाशुभ से जन-मन को सचेत करने का
एक सफल प्रयास है...”
कवि कामेश्वर प्रसाद डिमरी ने अपने निवेदन में भी यह स्पष्ट किया है-
“वसुन्धरा काव्य वर्तमान के रूप-स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन
है। इस पर मात्र चिन्ता नहीं चिन्तन की महती आवश्यकता है।.....ओजोन कवच दरक रहा है,
हम मात्र एक-दूसरे को चेता भर रहे हैं, चेत नहीं रहे हैं। आज इस चेतना को व्यवहार
में लाने की कोशिश करें तो शुभप्रभात की सुखद कल्पना साकार हो सकती है....।“
वसुन्धरा में छन्दों के माध्यम से कवि अपनी वेदना का स्वर
मुखरित करते हुए कहता हैं-
“सद्यजात ये शिशु अबोध,
है खेल रहा निज पोरों से,
काम-क्रोध अरु राग-द्वेष से,
दूर अभी तक औरों से।“
अपनी वसुन्धरा के बारे में कवि आगे कहता है-
“सकल तत्व की छाया-माया,
विधि-विरंची ये वसुधा है,
प्राची ने प्राण दिये जग को,
निशा में शीतल-शान्त सुधा है।“
रचनाकार के इस काव्य में कुछ
कालजयी मुक्तकों का भी समावेश है जो किसी भी परिवेश और काल में सटीक प्रतीत होते
हैं-
“निर्वसन नहीं कर पाये रिपु,
वह एक अकेली थी नारी,
निज कर ही हाँ हार रही,
आज द्रोपदी निज सारी।“
कवि देश के आचार्यों को आह्वान करते हुए कहता है-
“दहक रही पावन धरती,
रे! पाञ्चजन्य में प्राण भरो,
खींचे वल्गा श्रीसमर में-
ऐसा अर्जुन तैयार करो।“
पर्यावरण के प्रति अपनी चिन्ता
प्रकट करते हुए कवि कहता है-
“भाग्य धरा का किसने लूटा,
लुटा प्रकृति का भी यौवन,
सब नीड़-बसेरे मौन हुए,
निर्वसन हुए वन-उपवन।“
भारत के किरीट हिमालय के प्रति अपनी
वेदना प्रकट करते हुए कवि आगे लिखता है-
“भू-भारत का प्रथम प्रहरी-
यह भारत का उच्च भाल,
रजत मुकुट से महिमामंडित,
अरू हृदय था परम विशाल।“
...
“हार रहा है वहाँ हिमालय,
यहाँ तप-तापी थे तापस,
विकास पुरुष के सिंहनाद से,
है छाया कैसा यह आतस।“
परमात्मा से प्रार्थना करते हुए कवि
ने लिखा है-
“द्वार तुम्हारे हूँ आया,
अति व्याकुल हूँ स्वामी,
मैं बालक अति अज्ञानी,
करें क्षमा, सझ नादानी।“
और अन्तिम छन्द में कवि निवेदन करते
हुए कहता है-
“मात्र निवेदन बस इतना,
डम-डम का नाद न हो,
आस तुम्हीं, विश्वास तुम्हीं,
हो न हो, विवाद न हो।“
समीक्षा की दृष्टि से मैं कृति के बारे में इतना जरूर कहना चाहूँगा कि इस काव्य
संकलन में रोचकता, ओज और जिज्ञासा मणिकांचन संगम है। कृति पठनीय ही नही अपितु
संग्रहणीय भी है और कृति में सीधा काव्य का नैसर्गिक सौन्दर्य निहित है। जो पाठकों के हृदय पर सीधा असर करता है।
कामेश्वर प्रसाद डिमरी द्वारा रचित इस कृति को ग्लैक्सी
प्रिंटर्स विकासनगर (देहरादून) द्वारा मुद्रित किया गया है जिसका सर्वाधिकार स्वयं
कवि का ही है। हार्डबाइंडिंग वाली
इस कृति में 58 पृष्ठ हैं और इसका मूल्य मात्र 100/- रुपये है। सहजपठनीय मोटे फॉंट के साथ प्रति पृष्ठ पर तीन-तीन
मुक्तकों को छापा गया है और अनावश्यकरूप से खाली स्थान छोड़कर कृति में कहीं भी
कागज की बर्बादी नही की गई है।
अन्त में इतना ही कहना चाहूँगा कि मुझे पूरा विश्वास है कि “वसुन्धरा” काव्यसंग्रह सभी वर्ग के पाठकों में चेतना जगाने में सक्षम है। इसके
साथ ही मुझे आशा है कि वसुन्धरा काव्य संग्रह समीक्षकों की दृष्टि से भी उपादेय
सिद्ध होगा।
यह पुस्तक कामेश्वर प्रसाद डिमरी के पते विद्यापीठ मार्ग,
विकासनगर, जिला-देहरादून (उत्तराखण्ड) से प्राप्त की जा सकती है। रचनाकार से दूरभाष-(01360)251433
या मोबाइल नम्बर-9411721533 से भी सीधा सम्पर्क किया जा सकता है।
अपने सभी पाठकों को नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ!
समीक्षक
(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
कवि एवं साहित्यकार
टनकपुर-रोड, खटीमा
जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262 308
E-Mail .
roopchandrashastri@gmail.com
Website. http://uchcharan.blogspot.com/
फोन-(05943) 250129
मोबाइल-09368499921
Thursday, 13 December 2012
"उत्तराखंड के प्रथम मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी का निधन"
उत्तराखंड के प्रथम मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी का बुधवार को देहरादून में निधन हो गया. वे 85 वर्ष के थे.
भारतीय जनता पार्टी की उत्तराखंड इकाई के प्रमुख बिशन सिंह चुफाल ने बताया कि स्वामी का सुबह यहां एक सीएमआई अस्पताल में निधन हुआ. वे लंबे समय से बीमार थे.
स्वामी के निधन की खबर से पूरे राज्य में शोक का माहौल है. उन्होंने बताया कि स्वामी ने अलग राज्य उत्तरांचल के गठन के लिए हुए आंदोलन की अगुवाई की थी.
स्वामी के निधन पर चुफाल के अलावा भाजपा नेता प्रकाश पंत, हरबंस कपूर और पूर्व मुख्यमंत्रियों रमेश पोखरियाल निशंक, मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) बीसी खंडूरी और बीएस कोशियारी समेत कई नेताओं ने शोक जताते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की है.
विधानसभा की कार्यवाही स्थगित
उत्तराखंड के पहले मुख्यमंत्री नित्यानन्द स्वामी के निधन के बाद राज्य विधानसभा की कार्यवाही बुधवार को दिनभर के लिए स्थगित की गई.दिवंगत नेता के सम्मान में राजकीय शोक की घोषणा की गई है.
स्थगित किए जाने से पहले राज्य विधानसभा में पूर्व मुख्यमंत्री को श्रद्धांजलि दी गई और उनकी आत्मा की शांति की कामना करते हुए पीडित परिवार को जुदा हुए सदस्य के कारण मिले सदमें को सहन करने की भगवान से प्रार्थना की गई.
मैं अपनी ओर से और चर्चा मंच परिवार की ओर से दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि समर्पित करता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वे दिवंगत आत्मा को सदगति प्रदान करें।
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