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Monday, 8 April 2013

"एक शाम-हरि शर्मा के नाम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


एक मुलाकात ब्लॉगर हरि शर्मा से

मित्रों!
    आज देर शाम मुझको एक फोन आया- “मैं हरि शर्मा बोल रहा हूँ। आपने पहचाना कि नहीं।“
मैंने उत्तर दिया- “नहीं”
    फिर कहा “मैं ब्लॉग लिखता हूँ आपने मेरी कई पोस्टों पर कमेंट भी दिये हैं।“
    मैंने उत्तर दिया कि मुझे कुछ याद आ रहा है। कहीं आप नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे वाले हरि शर्मा तो नहीं हैं। तह वो बोले कि हाँ सर! मैंने आपका नम्बर दिल्ली वाली श्रीमती वन्दना गुप्ता जी से लिया है। आजकल मैं सालभर से अल्मौड़ा जिले की सोमेश्वर शाखा में भारतीय स्टेट बैंक में शाखाप्रबन्धक हूँ किसी काम से टनकपुर जा रहा हूँ तो सोचा कि रास्ते में खटीमा पड़ेगा। तभी याद आया कि खटीमा में तो एक जाने-माने ब्लॉगर डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी रहते हैं।
     इसके बाद हरि शर्मा जी बोले कि सर ये मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी कि मेरी मुलाकात आज ब्लॉगिंग के पुरोधा से होगी।
     मैंने शर्मा जी को अपने घर का पता बताया कि मेरा घर बरेली-टनकपुर हाइ-वे पर ही है। आप सौरभ अस्पताल के पास आ जाइए उससे मिलता हुआ ही मेरा निवास है।
     लगभग आधे घंटे के बाद हरि शर्मा जी मेर निवास पर पहुँचे और मैं धन्य हो गया।
    उनके साथ सोमेश्वर के ही एक जानी-मानी शख्शियत मंगल सिंह भी थे। लगे हाथ उनसे भी भेंट हो गयी। शर्मा जी उन्हीं के साथ उनकी नयी ऑल्टो-800 में आये थे।
चाय का दौर शुरू हुआ तो ब्लॉगजगत की बहुत सारी बातें भी हो गई। आधे घंटे की इस मुलाकात में कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि मैं किसी अपरिचित व्यक्ति से मिल रहा हूँ बल्कि यह आभास हुआ कि मैं अपने वर्षों पुराने किसी अभिन्न मित्र से मिल रहा हूँ।
    चलते-चलते शर्मा जी ने मुझे सोमेश्वर (अल्मौड़ा) आने का न्यौता भी दिया।

      हरि शर्मा जी का संक्षिप्त परिचय
नाम                       हरि प्रसाद शर्मा
उम्र :                             ४७ 
लिंग:                            पुरुष
खगोलीय राशि:                    मीन
उद्योग:                बैंक अधिकारी भा.स्टेट बैंक
व्यवसाय:                       प्रबन्धक
स्थान:         सोमेश्वर,जिला अल्मौड़ा (उत्तराखण्ड) भारत

Tuesday, 8 January 2013

"पुस्तक समीक्षा-वसुन्धरा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मुक्तकों का उपवन है "वसुन्धरा"
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     इस सप्ताह में मुझे वसुन्धरा काव्यसंग्रह की प्रति डाक से मिली थी। आज इसको बाँचने का समय मिला तो वसुन्धरा काव्यसंग्रह के बारे में कुछ शब्द लिखने का प्रयासभर ही मैंने किया है।
      रचनाकार कामेश्वर प्रसाद डिमरी जी से कभी मेरा साक्षात्कार तो नहीं हुआ लेकिन पुस्तक के माध्यम से उनकी हिन्दी साहित्य के प्रति गहरी लगन देख कर मेरा मन गदगद हो उठा। आज साहित्य जगत में कम ही लोग ऐसे हैं जिन्होंने वसुन्धरा के बारे में अपनी लेखनी चलाई है।     
     इस कृति के बारे में आदरणीय महेन्द्र प्रताप पाण्डेय नन्द लिखते हैं-
साहित्यानन्द ब्रह्मानन्द का सरोवर है। यह उक्ति कामेश्वर प्रसाद डिमरी जी की रचनाकृति वसुन्धरा के अवलोकन तथा पठन के बाद समीचीन प्रतीत होता है। हिन्दी साहित्याकाश में नक्षत्ररूपी कवियों की अधिकता से सभी परिचित हैं। हिन्दी की सरलता ही बहुत लोगों को सर्जक बनाने का सत्कार्य करती है।
.....डिमरी जी के साहित्य में पुष्ट तार्किकता, ऐतिहासिकता, सामाजिक विद्रूपता, समाज की विषमता, फैसन की उड़ान, पर्यावरणीय असंतुलन, मानव सत्रांश का अगर जिक्र किया गया है तो तो वहीं उन समस्त समस्याओं का सरल सुझाव भी कृति प्रदान करती है...।
    वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार सग़ीर अश़रफ़ ने अपने शुभाशीष देते हुए पुस्तक के बारे में लिखा है- 
“....इस बाजारवाद की भीड़ से पृथक पं. कामेश्वर प्रसाद डिमरी का चतुर्थ काव्य संग्रह वसुन्धरा पूर्वरचित काव्यों की भाँति एक विषयान्तर्गत पर्यावरण व प्रकृति को काव्य का आधार मान वर्तमान से आगत के शुभाशुभ से जन-मन को सचेत करने का एक सफल प्रयास है...
     कवि कामेश्वर प्रसाद डिमरी ने अपने निवेदन में भी यह स्पष्ट किया है- 
वसुन्धरा काव्य वर्तमान के रूप-स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन है। इस पर मात्र चिन्ता नहीं चिन्तन की महती आवश्यकता है।.....ओजोन कवच दरक रहा है, हम मात्र एक-दूसरे को चेता भर रहे हैं, चेत नहीं रहे हैं। आज इस चेतना को व्यवहार में लाने की कोशिश करें तो शुभप्रभात की सुखद कल्पना साकार हो सकती है....।
    वसुन्धरा में छन्दों के माध्यम से कवि अपनी वेदना का   स्वर मुखरित करते हुए कहता हैं-
सद्यजात ये शिशु अबोध,
है खेल रहा निज पोरों से,
काम-क्रोध अरु राग-द्वेष से,
दूर अभी तक औरों से।
    अपनी वसुन्धरा के बारे में कवि आगे कहता है-
सकल तत्व की छाया-माया,
विधि-विरंची ये वसुधा है,
प्राची ने प्राण दिये जग को,
निशा में शीतल-शान्त सुधा है।
     रचनाकार के इस काव्य में कुछ कालजयी मुक्तकों का भी समावेश है जो किसी भी परिवेश और काल में सटीक प्रतीत होते हैं-
निर्वसन नहीं कर पाये रिपु,
वह एक अकेली थी नारी,
निज कर ही हाँ हार रही,
आज द्रोपदी निज सारी।
      कवि देश के आचार्यों को आह्वान करते हुए कहता है-
दहक रही पावन धरती,
रे! पाञ्चजन्य में प्राण भरो,
खींचे वल्गा श्रीसमर में-
ऐसा अर्जुन तैयार करो।
     पर्यावरण के प्रति अपनी चिन्ता प्रकट करते हुए कवि कहता है-
भाग्य धरा का किसने लूटा,
लुटा प्रकृति का भी यौवन,
सब नीड़-बसेरे मौन हुए,
निर्वसन हुए वन-उपवन।
    भारत के किरीट हिमालय के प्रति अपनी वेदना प्रकट करते हुए कवि आगे लिखता है-
भू-भारत का प्रथम प्रहरी-
यह भारत का उच्च भाल,
रजत मुकुट से महिमामंडित,
अरू हृदय था परम विशाल।
...
हार रहा है वहाँ हिमालय,
यहाँ तप-तापी थे तापस,
विकास पुरुष के सिंहनाद से,
है छाया कैसा यह आतस।
      परमात्मा से प्रार्थना करते हुए कवि ने लिखा है-
द्वार तुम्हारे हूँ आया,
अति व्याकुल हूँ स्वामी,
मैं बालक अति अज्ञानी,
करें क्षमा, सझ नादानी।
     और अन्तिम छन्द में कवि निवेदन करते हुए कहता है-
मात्र निवेदन बस इतना,
डम-डम का नाद न हो,
आस तुम्हीं, विश्वास तुम्हीं,
हो न हो, विवाद न हो।
      समीक्षा की दृष्टि से मैं कृति के बारे में इतना जरूर कहना चाहूँगा कि इस काव्य संकलन में रोचकता, ओज और जिज्ञासा मणिकांचन संगम है। कृति पठनीय ही नही अपितु संग्रहणीय भी है और कृति में सीधा काव्य का नैसर्गिक सौन्दर्य निहित है। जो पाठकों के हृदय पर सीधा असर करता है।
      कामेश्वर प्रसाद डिमरी द्वारा रचित इस कृति को ग्लैक्सी प्रिंटर्स विकासनगर (देहरादून) द्वारा मुद्रित किया गया है जिसका सर्वाधिकार स्वयं कवि का ही है। हार्डबाइंडिंग वाली इस कृति में 58 पृष्ठ हैं और इसका मूल्य मात्र 100/- रुपये है। सहजपठनीय मोटे फॉंट के साथ प्रति पृष्ठ पर तीन-तीन मुक्तकों को छापा गया है और अनावश्यकरूप से खाली स्थान छोड़कर कृति में कहीं भी कागज की बर्बादी नही की गई है।
      अन्त में इतना ही कहना चाहूँगा कि मुझे पूरा विश्वास है कि वसुन्धराकाव्यसंग्रह सभी वर्ग के पाठकों में चेतना जगाने में सक्षम है। इसके साथ ही मुझे आशा है कि वसुन्धरा काव्य संग्रह समीक्षकों की दृष्टि से भी उपादेय सिद्ध होगा।
      यह पुस्तक कामेश्वर प्रसाद डिमरी के पते विद्यापीठ मार्ग, विकासनगर, जिला-देहरादून (उत्तराखण्ड) से प्राप्त की जा सकती है। रचनाकार से दूरभाष-(01360)251433 या मोबाइल नम्बर-9411721533 से भी सीधा सम्पर्क किया जा सकता है।
अपने सभी पाठकों को नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ!
समीक्षक
 (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक’)
कवि एवं साहित्यकार 
टनकपुर-रोड, खटीमा
जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262 308
E-Mail .  roopchandrashastri@gmail.com
फोन-(05943) 250129
मोबाइल-09368499921

Thursday, 13 December 2012

"उत्तराखंड के प्रथम मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी का निधन"


उत्तराखंड के प्रथम मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी का बुधवार को देहरादून में निधन हो गया. वे 85 वर्ष के थे.
भारतीय जनता पार्टी की उत्तराखंड इकाई के प्रमुख बिशन सिंह चुफाल ने बताया कि स्वामी का सुबह यहां एक सीएमआई अस्पताल में निधन हुआ. वे लंबे समय से बीमार थे. 

स्वामी के निधन की खबर से पूरे राज्य में शोक का माहौल है. उन्होंने बताया कि स्वामी ने अलग राज्य उत्तरांचल के गठन के लिए हुए आंदोलन की अगुवाई की थी.

स्वामी के निधन पर चुफाल के अलावा भाजपा नेता प्रकाश पंत, हरबंस कपूर और पूर्व मुख्यमंत्रियों रमेश पोखरियाल निशंक, मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) बीसी खंडूरी और बीएस कोशियारी समेत कई नेताओं ने शोक जताते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की है.

विधानसभा की कार्यवाही स्थगित
उत्तराखंड के पहले मुख्यमंत्री नित्यानन्द स्वामी के निधन के बाद राज्य विधानसभा की कार्यवाही बुधवार को दिनभर के लिए स्थगित की गई.दिवंगत नेता के सम्मान में राजकीय शोक की घोषणा की गई है.
स्थगित किए जाने से पहले राज्य विधानसभा में पूर्व मुख्यमंत्री को श्रद्धांजलि दी गई और उनकी आत्मा की शांति की कामना करते हुए पीडित परिवार को जुदा हुए सदस्य के कारण मिले सदमें को सहन करने की भगवान से प्रार्थना की गई.
मैं अपनी ओर से और चर्चा मंच परिवार की ओर से दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि समर्पित करता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वे दिवंगत आत्मा को सदगति प्रदान करें। 

Thursday, 15 November 2012

"के. सी. पन्त नहीं रहे" श्रद्धांजलि!

माननीय के. सी. पन्त 
अब हमारे बीच नहीं रहे!
बहुत ही दुख के साथ सूचित कर रहा हूँ कि 
महान स्वतन्त्रता सेनानी, संयुक्त प्रान्त (उ.प्र.) के प्रथम प्रधानमन्त्री औ
र भारत के पूर्व गृह मन्त्री पं.गोबिन्द बल्लभ पन्त के पुत्र 
कृष्ण चन्द्र पन्त का का 80 वर्ष की आयु में आज देहावसान हो गया है। 
ये काँग्रेस सरकार में रक्षामन्त्री, वित्तमन्त्री आदि बहुत से पदों पर सुशोभित रहे। 
बाद में ये भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गये औ
र योजना आयोग के उपाध्यक्ष भी रहे।
मैं अपनी ओर से दिवंगत आत्मा को 
भावभीनी श्रद्धांजलि समर्पित करता हूँ।

Saturday, 20 October 2012

"अन्तःप्रवाह की समीक्षा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


मन के प्रवाह का संकलन है अन्तःप्रवाह
   कुछ दिनों पूर्व ख्यातिप्राप्त कवयित्री स्व. ज्ञानवती सक्सेना की पुत्री श्रीमती आशालता सक्सेना के काव्य संकलन अन्तःप्रवाह की प्रति की मुझे डाक से मिली थी। जिसको आद्योपान्त पढ़ने के उपरान्त मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि अन्तःप्रवाहउनके मन के प्रवाहों का संकलन है। 
  इस संकलन की भूमिका विक्रम विश्वविद्यालय, उजैन के प्राचार्य डॉ. बालकृष्ण शर्मा ने लिखी है। यह श्रीमती आशालता सक्सेना का द्वितीय रचना संकलन है और इसमें अपनी 84 कविताओं को उन्होंने स्थान दिया है। कवयित्री ने कीर्ति प्रिंटिंग प्रैस, उज्जैन से इसको छपवाया है जिसकी प्रकाशिका वो स्वयं ही हैं। एक सौ दस पृषठों के इस संकलन का मूल्य उन्होंने 200/- मात्र रखा है। इससे पूर्व इनका एक काव्य संकलन अनकहा सच भी प्रकाशित हो चुका है।
    कवयित्री ने इस काव्यसंग्रह के अपनी ममतामयी माता सुप्रसिद्ध कवयित्री स्व. डॉ. (श्रीमती) ज्ञानवती सक्सेना किरण को समर्पित किया है। अपनी शुभकामनाएँ देते हुए शासकीय स्नातकोत्तर शिक्षा महाविद्यालय, भोपाल से अवकाशप्राप्त प्राचार्या सुश्री इन्दु हेबालकर ने लिखा है-
कवयित्री ने काव्य को सरल साहित्यिक शब्दों में अभिव्यक्त कर पुस्तक अन्तःप्रवाह को प्रभावशाली बनाया है। आपको हार्दिक आशीर्वाद। इसी प्रकार लिखती रहें और एक छोटी पतंग, रंबिरंगी न्यारी-न्यारी उड़ाती रहें।
     श्रीमती आशालता सक्सेना ने अपनी बात कहते हुए लिखा है-
मैं काफी समय से कम्प्यूटर से जुड़ी हुई हूँ अपने ब्लॉग आकांक्षा Akankshaपर अपनी रचनाएँ लगाती हूँ। अंग्रेजी भाषा में भी लेखनकार्य करती हूँ.... आस-पास की छोटी-छोटी घटनाएँ मुझे प्रभावित करती हैं। मैं एक संवेदनशील और भावुक महिला हूँ। मन में उमड़ते विचारों और अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने के लिए मैंने कविता लेखन को माध्यम बनाया है...।
कवयित्री ने अन्तःप्रवाह की शीर्षक रचना को पहली कविता के रूप मे स्थान दिया है, जिसमें उन्होंने लिखा है-
..नाव जगमगाई

उर्मियों की बाहों में
फिर भी तट तक पहुँच पाया
ना खया अन्तःप्रवाह में...
      अपनी कविताओं में श्रीमती आशालता सक्सेना जी ने बरसात के बारे में लिखा है-
हरी-भरी वादी में

लगी जोर की आग
मन ने सोचा
जाने क्या होगा हाल
फिर जोर से चली हवा
उमड-घुमड़ बादल बरसा
सरसा तब संसार...
    "अन्तःप्रवाह" में कवयित्री की बहुमुखी प्रतिभा की झलक दिखाई देती है। ज़िन्दगी के बारे में वे लिखतीं हैं-
यह ज़िन्दगी की शाम

अजीब सा सोच है
कभी है होश
कभी खामोश है...
    एक ओर जहाँ इन्होंने नफरत, प्रतीक्षा, अतीत, शब्द, नीड़, अजनबी, अवसाद, बन्धन, आतंक, भटकाव, अफवाहें, अहंकार आदि विषयों को   अपनी रचना का विषय बनाया है, तो दूसरी ओर बहार, बाँसुरी, मन का सुख, बेटी, पतंग, होली, दीपावली, सपनों आदि के विभिन्न रूपों को भी उनकी रचनाओं में विस्तार मिला है। वे अपने परिवेश की सामाजिक समस्याओं पर भी अपनी लेखनी चलाई है
    बेटी के बारे में वे लिखतीं हैं-
बेटी अजन्मी सोच रही

क्यूँ उदास माँ दिखती है
जब भी कुछ जानना चाहूँ
यूँ ही टाल देती है
रह न पाई
कुलबुलाई
समय देख प्रशन दागा
क्या तुम मुझे नहीं चाहती...
   सहनशीलता के बारे में कवयित्री लिखती है-
रल नहीं सहनशील होना

इच्छा शक्ति धरा सी होना
नहीं दूर अपने कर्तव्य से...
मृगतृष्णा पर प्रकाश डालते हुए कवयित्री कहती है-
जल देख आकृष्ट हुआ
घंटों बैठ अपलक निहारा
आसपास था जल ही जल
जगी प्यास बढ़ने लगी
खारा पानी इतना
कि बूँद-बूँद जल को तरसा
गला तर न कर पाया
प्यासा था प्यासा ही रहा...
मन की ऊहापोह के बारे में कवयित्री लिखती है-
मन चाहता है
कुछ नया लिखूँ
क्या लिखूँ
कैसे लिखूँ
किसपर लिखूँ
हैं प्रश्न अनेक
पर उत्तर एक
प्रयत्न करूँ
प्रयत्न करूँ.."
अंग्रेजी की प्राध्यापिका होने के बावजूद कवयित्री ने हिन्दी भाषा के प्रति अनुराग व्यक्त करते हुए लिखा है-
 “भाषा अपनी
भोजन अपना
रहने का अंदाज अपना
भिन्न धर्म और नियम उनके
फिर भी बँधे एक सूत्र से
.....
भारत में रहते हैं
हिन्दुस्तानी कहलाते हैं
फिर भाषा पर विवाद कैसा
....
सरल-सहज
और बोधगम्यता लिए
शब्दों का प्रचुर भण्डार
हिन्दी ही तो है...
नयनाभिराम मुखपृष्ठ, स्तरीय सामग्री से सुसज्जित यह काव्य संकलन स्वागत योग्य है। आम आदमी की भाषा में लिखी गयीं सभी रचनाएँ कवयित्री ने संवेदनशीलता के मर्म में डूबकर लिखी हैं। आशा है कि आशालता जी का अन्तःप्रवाह पाठकों के मन में गहराई से अपनी पैठ बनायेगा।
इस सुबोधगम्य और पठनीय काव्यसंग्रह के लिये श्रीमती आशालता सक्सेना को मैं अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
खटीमा (उत्तराखण्ड) पिन-262308
सम्पर्क-09368499921,
वेबसाइट-http://uchcharan.blogspot.in/

Monday, 3 September 2012

“लखनऊ सम्मान समारोह के कुछ अनछुए पहलू” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

   अपनी बात पर बहिन वन्दना अवस्थी दुबे ने सम्मान समारोह-एक नज़र इधर भी......शीर्षक से बहुत उम्दा आलेख प्रकाशित किया है। विचारणीय बात यह है कि यदि उनका आलेख ब्लॉग पर न आता तो मुझे तो पता ही नहीं लगता कि मेरी बहुत पुरानी मित्र भी इस समारोह में उपस्थित थीं।

    उन्होंने बहुत सारी बाते इस आलेख में लिखीं हैं। मैं उसी के आधार पर कहना चाहता हूँ कि पहला सत्र लम्बा खिंच गया तो दूसरा सत्र तो होना ही चाहिए था, कार्यक्रम चाहे भले ही 2 घण्टा विलम्ब से समाप्त होता। मगर आयोजक ने तो पहला सत्र शुरू होने के बाद ही मुझसे यह व्यक्तिगत रूप से कहा था कि हमारा कार्यक्रम सफल हो गया। यानि अपने मुँह खुद ही अपनी प्रशंसा। यही बात कोई अन्य कहता तो मुझे बहुत अच्छा लगता।

    अब श्रीमती दुबे जी के आलेख को पढ़कर में ही सवाल उठाता हूँ कि ब्लॉगिस्तान की आदरणीया सम्मानिता बहन रशिमप्रभा जी इसमें क्यों सम्मिलित नहीं हो पाईं?

     गत वर्ष हिन्दी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान आयोजित करने वाले मुख्य आयोजक आदरणीय गिरराज शरण अग्रवाल इस सम्मेलन में क्यों नहीं आ पाये?

     आदरणीय अविनाश वाचस्पति जो स्वयं ब्लॉगिंग के एक मजबूत पुरोधा हैं, उनके साथ दिल्ली की एक पूरी टीम है। लेकिन उस टीम में से 1-2 को छोड़कर अन्य लोग क्यों नहीं आ पाये?

     परिकल्पना द्वारा जो आयोजन किया गया उसकी तो मैं भूरि-भूरि प्रशंसा करता हूँ। क्योंकि जब से इल सम्मान समारोह की घोषणा हुई थी तभी से में अपनी टिप्पणियों में यह बात कहता चला आया हूँ कि कुछ न करने से कुछ करना तो बहुत बेहतर है।

    बहुत से लोगों ने यह आवाज भी उठाई थी कि वोटिंग प्रक्रिया को सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? उनकी बात सही भी थी। क्योंकि वोटिंग के बाद यह कार्यक्रम व्यकितगत कहाँ रहा? वह तो सार्वजनिक ही माना जाना चाहिए था।

    बहुत से लोगों ने तो इस सम्मेलन पर होने वाले व्यय पर प्रश्नचिह्न उठाये हैं कि इस सम्मेलन में व्यय करने के लिए पैसा किन श्रोतों से आया? लेकिन मैं इस बिन्दु को खारिज करता हूँ। मेरे विचार से यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि कार्यक्रम करना महत्व रखता था।

    इसके अलावा बहुत से ऐसे भी ब्लॉगर इस सम्मेलन में पधारे थे जो कि ब्लॉगिस्तान में बिल्कुल नये थे। उनके प्रोत्साहन के लिए क्या नये कदम इस सम्मेलन में उठाये गये?

    इस पर मैं अपनी बेबाक राय रखना चाहूँगा कि आ.अविनाश वाचस्पति ब्लॉग की उन्नति के लिए इस समय सबसे क्रियाशील हैं। नौ जनवरी 2011 को वे अपनी टीम के साथ खटीमा ब्लॉगर सम्मेलन में पधारे थे। उस समय मुझे उनकी लगन व क्रियाशीलता का परिचय मिला था कि उन्होंने अपनी टीम के साथ बहुत से लोगों के ब्लॉग बनवाये और उन्हें बलॉगिंग के गुर सिखाये थे।

    उसके बाद 30 अप्रैल 2011 को मुझे आदर्शनगर दिल्ली की एक ब्लॉगर मीट में जाने का सौभाग्य मिला। उसमें तो इन्होंने बाकायदा ब्लॉगिंग की कार्यशाला का आयोजन किया था और बहुत से लोगों को ब्लॉगिंग की ओर उन्मुख किया था। मगर इस प्रकार का कोई उपक्रम लखनऊ के इस सम्मेलन में मुझे देखने को नहीं मिला। जबकि इसमें श्री बी.एस.पाबला, आ.रवि रतलामी और यमुना नगर के ई-पण्डित जैसे ब्लॉग तकनीकी विशेषज्ञ भी पधारे थे।

     जहाँ तक मेरी अपनी बात है तो मैंने अपनी तीन-चार साल की ब्लॉगिंग में 50 से अधिक लोगों के ब्लॉग बनाये हैं और मेरे साथ इस सम्मेलन में तीन नये ब्लॉगर भी पधारे थे। जिनको यहाँ आकर निराशा ही हाथ लगी थी।

अब मैं कुछ बातें और लिखकर इस आलेख का समापन करना चाहूँगा।

सम्मानिता वन्दना जी!
    आपने जिन बातों का उल्लेख आपने आलेख में किया वो सब सही हैं। किन्तु 100 से अधिक ब्लॉगर क्या बढ़िया खाना खाने के लिए ही दूर-दराज से अपना धन और अमूल्य समय नष्ट करने के लिए आये थे?
    क्या कोई रिकार्ड आयोजकों के पास है कि कौन-कौन लोग इसमें आये थे? कम से कम एक रजिस्टर ही प्रेक्षाग्रह में कार्यक्रम स्थल पर रखना ही चाहिए था। जिससे पता लगता कि सम्मानित होने वाले कौन-कौन ब्लॉगर इसमें हाजिर हुए और कौन-कौन नहीं आ पाये तथा ऐसे कौन से आगन्तुक थे जो इस सम्मेलन में रुचि लेने के लिए पधारे थे?

    क्या ब्लॉग पर लगी सम्मानित होने वाले लोगों की सूचना के अतिरिक्त इनके पास कोई रिकार्ड है जिससे कि यह पता लग पाये कि सम्मानित होने वाले कौन-कौन ब्लॉगर इसमें हाजिर हुए और कौन नहीं ग़ैरहाजिर रहे?
    कुछ लोग तो 26 अगस्त की शाम को ही लखनऊ आ गये थे और वे अपने खर्चे पर 300 से 1000 रुपये व्यय करके विभिन्न स्थानों पर रुके थे। यदि आयोजक 200 या 300 रुपये तक का प्रतिनिधि शुल्क लेकर इनकी व्यवस्था किसी धर्मशाला में करा देते तो ये अपनी अनौपचारिक गोष्ठी ही कर लेते। मेरे विचार से सभी ब्लॉगर सहमत थे। मगर ऐसा नहीं हुआ और सम्मेलन वाकई में कम से कम मेरे लिए तो यादगार बन ही गया।
     अन्त में सबसे बड़ा बिन्दु तो यह है कि दूर-दराज से आने वाले ब्लॉगरों का परिचय तक सम्मेलन में नहीं कराया गया। जिससे कई ब्लॉगर तो उन लोगों का नाम तक नहीं जान पाये, जिनसे वो भेंट करना चाहते थे।