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Wednesday, 14 September 2011

"हिन्दी दिवस के साथ कार की भी वर्षगाँठ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

आज हिन्दी दिवस के साथ
मेरी कार की भी प्रथम वर्षगाँठ है!
प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को भारत के लोग हिन्दी दिवस मनाते हैं और हिन्दी के प्रति अपनी श्रद्धा को प्रकट कर देते हैं। उसके बाद पूरे साल वही गिटर-पिटर का टर-टर स्वर आलापते रहते हैं।
आज से 62 वर्ष पूर्व जब महात्मा गांधी जीवित थे 14 सितम्बर, 1949 को भारत की संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया था कि हिन्दी भारत की राजभाषा कहलाएगी।
इस निर्णय पर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर 1953 से पूरे भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस मनाया जाने लगा।
मेरी कार की प्रथम वर्षगाँठ


मित्रों! मैंने सन् 2010 में आज के ही दिन मारूति कम्पनी की ज़ेन स्टिलो कार भी खरीदी थी! देखते-देखते एक साल इतनी जल्दी व्यतीत हो गया और मेरी इस प्यारी सी कार की आयु भी एक वर्ष हो गई!
सिर्फ इतना ही नहीं मैंने इसमें स्वयं और परिवार के साथ 4,500 किमी की सुखद यात्रा भी की।


मेरी 6 वर्षीया पोती प्राची को तो यह बहुत पसन्द है। वह स्कूल से आकर इसमें एक बार तो रोज ही बैठ जाती है। कार में बैठकर जब हम लोग इसको साथ ले जाते हैं तो इसका सबसे पहला काम ए-सी चलाना होता है।

Tuesday, 6 September 2011

"अच्छी सेहत का राज़" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


     बहुधा देखा गया है कि लोग 60 साल की आयु में आते-आते बहुत चिड़चिड़े स्वभाव के हो जाते हैं। जिसके कारण उनका तन और मन भी सूखने लगता है। बहुत सी बीमारियाँ भी घेर लेती हैं और दुनिया से मोह भंग होने लगता है। इसके बहुत से परिस्थितिजन्य कारण हो सकते हैं।
कहा जाता है कि स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन वास करता है और इसके लिए कोई अधिक प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। बस जरूरत है आहार और विहार की। मैं इसको स्पष्ट करने के लिए अपने जीवन से जुड़ी हुई कुछ बातें आपके साथ साझा करना चाहता हूँ।
मेरा जन्म उत्तर-प्रदेश नजीबाबाद के रम्पुरा मुहल्ले में हुआ था। उस समय पिता जी पटवारी के पद पर कार्यरत थे। अतः गुज़ारा आराम से हो जाता था। बाद में चौधरी चरण सिंह मुख्यमऩ्त्री बने। उस समय पटवारियों की हड़ताल चल रही थी। हड़ताल ख़त्म करने के लिए 48 घण्टे का समय दिया गया। लेकिन पिता जी इस अवधि में काम पर नहीं लौटे तो नौकरी से टर्मिनेट कर दिया गया। अब हमारे गर्दिश के दिन शुरू हो गये थे।
माता जी पानी के हाथ की रोटी बनाती थी। कभी-कभी एक सब्जी और अचार तथा कभी अचार के साथ रोटी। यही हमारा खाना और नाश्ता था। फिर शाम को दाल-भात और रोटी। दिन में सब लोग अपने काम में लग जाते थे।
समय बीतता रहा और मैं डॉक्टर बन गया। ईश्वर की कृपा ऐसी रही कि मैं जिस रोगी को दवा देता उसको आराम हो जाता। हमारे अच्छे दिन फिर लौट आये थे। मगर खाना वही गरीबी वाला ही मन में बसा हुआ था। जबकि मेरे पुत्र जिन्होंने कि खाते-पीते परिवेश में आँखें खोली थी। वो आज भी रईसों की तरह ही सुबह 9 बजे नाश्ता लेते हैं, अपराह्न 3 बजे दोपहर का खाना और रात का खाना 9-10 बजे तक खाते हैं।
अरे! अपनी धुन में मग्न हो गया मैं तो और आलेख लम्बा हो गया। किन्तु जिस बात को बताने केलिए यह लेख लिखा वो तो भूल ही गया। अब उसी पर आता हूँ।
लोग पूछते हैं कि शास्त्री आपकी कितनी आयु है। मै सहज भाव से बता देता हूँ कि साठ साल। लोग आश्चर्य करते हैं कि इस उम्र में भी मेरी आँखे-दाँत. कान और शरीर स्वस्थ क्यों है?
चलिए आपको इसका राज़ बता देता हूँ!
मैं सुबह 5 बजे उठता हूँ। शौच आदि से निवृत्त होकर 15-20 मिनट हलका-फुलका सहज योग करता हूँ। स्नान के बाद इण्टरनेट का व्यसन भी कर पूरा लेता हूँ। तब तक श्रीमती जी पानी के हाथ की दो रोटी और चावल ले आती हैं। इसे आप चाहे मेरा नाश्ता कहें या खाना कहें, मैं खा लेता हूँ। वैसे मुझे काले चने मिले हुए पीले चावल बहुत अच्छे लगते हैं। दिन में एक-दो चाय मित्रों के साथ हो जाती हैं। डेढ़-दो बजे दोपहर तक रोगियों को भी देखता रहता हूँ और आभासी दुनिया में इंटरनेट के माध्यम से जुड़ा रहता हूँ। शाम को सात बजे से पहले ही भोजन कर लेता हूँ। किसी बात को मन में गाँठ बाँधकर नहीं बैठता हूँ। सोचता भी बहुत कम ही हूँ। अतः बड़ा से बड़ा नुकसान होने पर भी गर्दन झटक कर चिन्ता को हटा देता हूँ।
मित्रों यही मेरे अच्छे स्वास्थ्य का राज़ है।

Friday, 26 August 2011

"एस एम मासूम साहब के जन्मदिवस पर विशेष" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आज 26 अगस्त को सय्यद मासूम साहब को 

उनकी यौम-ए-पैदाइश की बहुत-बहुत मुबारकवाद।

एस एम मासूम साहब से कुछ सवाल – जवाब

अपने बारे में कुछ बताएं, मसलन बचपन, पढाई और किशोरावस्था के बारे में?
मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के जौनपुर शहर मैं    1960 को एक ज़मींदार परिवार मैं हुआ था. पिताजी रेलवे मैं इंजिनियर थे और लिखने पढने मैं बहुत रूचि  रखते थे. बचपन मज़े मैं बीता, पढना लिखना और समाज सेवा करना, इसी मैं  समय गुज़र जाता था. मैं ना तो कोई साहित्यकार हूँ और ना ही बनना चाहता हूँ. बस सामाजिक सरोकारों से जुड़ कर समाज के लिए कुछ करता रहता हूँ. यही कारण है कि इस ब्लोगिंग मैं भी शोहरत के सस्ते हथकंडों से दूर रहकर ज़मीनी स्तर पे काम करने मैं अधिक रूचि रखता हूँ.

आप ने अपनी शिक्षा कहाँ से प्राप्त की?
मैंने अपना पढ़ाई  का ज़माना लखनऊ और वाराणसी मैं गुज़ारा और विज्ञान से स्नातक की डिग्री लखनऊ विश्वविद्यालय से ली. कंप्यूटर, इन्टरनेट, वेबसाइट, हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर में स्वयं ज्ञान प्राप्त किया.

आपका व्यवसाय क्या है?
मैं बैंक मैं मेनेजर था, अब अवकाश ले लिया है और खुद का बिज़नस करता हूँ. पत्रकारिता से भी जुड़ा हूँ और बहुत से समाचार पत्रों के लिए काम करता हूँ.

बचपन का कोई ऐसा क़िस्सा जो आज भी आपने ज़ेहन में कौंधता रहता है?
जी हाँ एक दोस्त कि याद नहीं जाती दिल से. मैं उस समय लखनऊ के जुबली कॉलेज मैं कक्षा नौं का विद्यार्थी था और मेरा एक मित्र था पंकज रस्तोगी. हम दोनों फिल्म देखने गए रंगीला रतन. मध्यांतर मैं हम दोनों बाहर आये एक फ़कीर ने पैसा माँगा दुआ के साथ कि तुम्हारा भविष्य उज्जवल हो, पंकज ने कहा अरे जाओ भाई कल किसने देखा है. हम 3-6 शो  देख रहे थे.  शो ख़त्म होने के बाद हम अपने अपने घर आ गए.
रात मैं खबर आयी कि पंकज घर कि छत से गिर गया और अस्पताल मैं है. सुबह पंकज के घर वाले मेरे पास आये क्योंकि पंकज बेहोशी मैं मेरा नाम ले के पुकार रहा था, मैं 11 बजे उसके पास गया जैसे ही उसने मुझे देखा एक बार मुस्कराया और दम तोड़ दिया.यह बात मुझे कभी नहीं भूलती और यह भी कि फ़कीर को वापस ना लौटाओ और अगर कुछ ना दे सकों तो कम से कम कोई उलटी बात मत बोलो.

आप कई वर्षों से लिख रहे  हैं, लेखन से सम्बंधित कोई ऐसा संस्मरण जो भुलाये न भूलता हो?
जैसा मैंने पहले भी कहा कि मैं कोई साहित्यकार नहीं. अंग्रेजी ब्लोगिंग मैं 10 वर्षों से काम कर रहा हूँ वर्ष 2010 में हिंदी ब्लोगिंग मैं क़दम रखा है. अभी भी हिंदी ब्लॉगर्स की ज़हनियत को समझने की कोशिश कर रहा हूँ.

ब्लॉगर कैसे बने ? आप ब्लॉग-लेखन कब से कर रहे  हैं और क्यूँ कर कर रहे  हैं?
अंग्रेजी मैं ब्लोगिंग तो मैं पिछले 10-12 साल से कर रहा हूँ. हिंदी ब्लॉग जगत में मुझे इस्मत जैदी साहिबा 2010 में लाई और तभी से दोनों ब्लॉग जगत में काम कर रहा हूँ. मैं हमेशा ही इंसानियत और एकता के लिए काम करता हूँ. अभी मुझे अपने वतन का क़र्ज़ भी उतारना  है और अब उसी के लिए सक्रिय हूँ. जौनपुर ब्लॉगर एसोसिएशन बनाया और हिंदी  और  अंग्रेजी  मैं  www.jaunpurcity.in बनाई. ज़मीनी स्तर पे भी डॉ मनोज मिश्रा और दूसरे ब्लॉगर्स के साथ काम कर रहा हूँ.

वर्तमान हिन्दी ब्लॉग जगत में सामूहिक ब्लॉग की कितनी महत्ता है?
साझा ब्लॉग की महत्ता तो बहुत है लेकिन केवल उन्ही को जोड़ना चाहिए जो ब्लॉग मैं रूचि रखते हों और ब्लॉग को समय दे सकें.  साझा ब्लॉग हम वतनो को या एक विचार वालों को एक साथ जोड़ता है. इस से अधिक और क्या चाहिए.

किन्ही 5  ब्लॉगर्स का नाम बताईये जिनसे आप प्रभावित हुए बिना नहीं रहे ?
वैसे तो कई हैं इस ब्लॉगजगत मैं जिनसे मैं बहुत ही अधिक प्रभावित हूँ लेकिन आपने 5 नाम मांगे हैं तो मैं डॉ मनोज मिश्रा जी का नाम सबसे पहले लूँगा. एक सुलझा हुआ इंसान जिसने चुपचाप अपने वतन के लिए बहुत काम केवल अपने ब्लॉग से किये हैं. दूसरा नाम जनाब ज़ीशान ज़ैदी का है, यह भी विज्ञान के क्षेत्र में चुपचाप  अपना काम किया करते हैं और तीसरा नाम है हमारे कवि मित्र  कुंवर कुसुमेश जी का, जिनकी तारीफ शब्दों मैं बयान नहीं की जा सकती. चौथा नाम है डॉ  पवन मिश्रा जी का, गहराई में जाकर किसी भी विषय पर लिखते है और बेहतरीन लिखते हैं. पांचवां नाम है शिखा वार्ष्णेय, बेहतरीन लेखनी और उच्च विचार. यहाँ यह भी कहता चलूँ कि मेरी लिस्ट मैं 20-21 ब्लॉगर्स हैं और  2 तो ऐसे हैं जिनसे मेरे विचार भी नहीं मिलते लेकिन उनकी लेखनी कि धार का मैं कायल हूँ.

अपने व्यक्तिगत ब्लॉग में लेखन का मुख्य विषय / मुद्दा क्या है?
मेरे व्यक्तिगत ब्लॉग का मुख्य विषय सामाजिक मैं अमन और शांति है और मैं सामाजिक सरोकारों पे ही लिखता हूँ. भ्रष्ट समाज को बदलने कि कोशिश  करता हूँ बस.

आप कि नज़र मैं बड़ा ब्लॉगर कौन है?
बड़ा ब्लॉगर वही है जो शोहरत से, गन्दी राजनीती से दूर हट के समाज के लिए कुछ काम अपनी लेखनी का इस्तेमाल करते हुए  कर रहा है.

आज कल बड़े बड़े उत्सव, महोत्सव, ब्लॉगर मिलन हुआ करते हैं, इनाम बांटे जाते हैं. जहाँ इल्ज़ाम यह भी लगता है कि सब अपना-अपना देखते हैं. आप को कैसा लगता है?
हर इंसान को यह अधिकार है कि वो कहीं भी कोई भी मीटिंग करे, उत्सव या महोत्सव करे, खुद को ही इनाम दे डाले या अपने दोस्तों को ही इनाम दे. दूसरों के अधिकार छेत्र में जा के मैं कुछ कहना ठीक नहीं समझता.  ब्लॉगजगत को इससे बहुत फायदा होता नहीं दिखाई देता. हाँ कुछ ब्लॉगर्स के आपस के रिश्ते मज़बूत होते है, यह एक अच्छी बात है और आशा है इन रिश्तों का वो सही इस्तेमाल करेंगे.

धार्मिक-उपदेश और उनको अपने जीवन में उतारना, आज के युग में कहाँ तक सही है?
धार्मिक उपदेश कि महत्ता हर धर्म कि किताबों मैं है. आज हम ना तो ईमानदारी और सदाचारी होना पसंद करते हैं और ना ही धार्मिक उपदेशों को सुनना. यह कमी हमारी है ना कि किसी धर्म या धार्मिक उपदेशों की. धार्मिक उपदेश हमारे जीवन का आईना हैं, जिसे हमेशा देखते रहना चाहिए.

एक भारतीय महिला को कैसा होना चाहिए, कोई महिला ऐसी है जिसे आप आदर्श के रूप में प्रस्तुत कर सकें?
भारतीय महिला? शायद सही सवाल यह है कि एक महिला को कैसा होना चाहिए? आज  के  युग मैं जहाँ आधुनिक महिलाएँ कम वस्त्र धारण कर के गर्व महसूस करती हैं, इस विषय पे कुछ कहना ही  सही नहीं है. ब्लॉगजगत की तस्वीरों से देखा जाए तो रेखा श्रीवास्तव जी को देख कर ख़ुशी होती है. आदर्श महिलाएँ इस विश्व मैं बहुत सी गुज़री हैं, जिनमें से जनाब-ए मरियम और जनाब-ए फातिमा (स.ए) का नाम मैं अवश्य लूँगा.

Saturday, 6 August 2011

‘‘महाकवि तुलसीदास’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


‘‘महाकवि तुलसीदास’’ 

"सूर-सूर तुलसी शशि, उडुगन केशव दास।
अब के कवि खद्योत सम, जहँ-तहँ करत प्रकाश।।’’
ब्लागर मित्रों!
आज से 20 वर्ष पूर्व मेरा एक लेख
नैनीताल से प्रकाशित होने वाले
समाचारपत्र
"दैनिक उत्तर उजाला"
में प्रकाशित हुआ था।


इसे साफ-साफ पढ़ने के लिए-
कृपया समाचार की कटिंग पर
एक चटका लगा दें।
भगवान राम की गाथा को
रामचरित मानस के रूप में
जन-जन में प्रचारित करने वाले 
महाकवि तुलसीदास की स्मृति
उर में संजोए हुए यह लेख मूलरूप में 
आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।

Monday, 1 August 2011

“मेरी पन्तनगर यात्रा” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मेरी एक दिन की पन्तनगर यात्रा
बहुत दिन हो गये थे घर में पड़े-पड़े!
रोज़मर्रा का वही काम। सुबह ठना कम्प्यूटर खोलना, मेल चेक करना और ब्लॉगिंग करना। 
इस काम से अब खीझ होने लगी थी! इसलिए सोचा कि कहीं पर घूम आया जाए। 
तभी अपने शिष्य सुरेश राजपूत का फोन आ गया कि गुरू जी मेरे पास आ जाइए ! 
मेरा भी मन था कहीं घूमने जाने का। 
तब मैंने 30 जुलाई को अपराह 3 बजे कार निकाल ही ली 
और चल पड़ा पन्त नगर की यात्रा के लिए।
रास्ते में किच्छा का रेलवे क्रॉसिंग पड़ा वह बन्द था इस लिए मुझे रुकना पड़ा।
KICHCHHA
सोचा कि कैंमरे से कुछ फोटो ही खींच लिए जाएँ।
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तभी मीटर गेज की रेलगाड़ी किच्छा की ओर से आती हुई दिखाई पड़ी!
उसके बाद मैं पन्तनगर पहुँच गया!
सीधे सुरेश जी के घर पहुँचा और पेटभर कर चाय नाश्ता किया!
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यह है सुरेश राजपूत का घर। 
दोमंजिले पर रहते हैं वो अपनी माता जी के साथ।
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सुरेश जी के घर के बाहर अमरूद के पेड़ लगे हैं।
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जिन पर अमरूद के फल लगे थे!
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खाली जगह में भिण्डी के पौधे भी लगाए हुए हैं।
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इन पर भिण्डी के फूल और कलियाँ भी दिखाई दे रहीं थीं।
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घर के बाहर रोड के किनारे नीम का एक पेड़ भी मुझे दिखाई दिया।
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जिसके नीचे ही मैंने अपनी कार खड़ी की थी।
नीम के पेड़ पर निम्बौरियाँ लदी हुई थीं और वो पर कर नीचे टपक रहीं थी।
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इसके बाद हम लोग पन्तनगर के अन्तरराष्ट्रीय अतिथि गृह में गये। 
सुरेश जी ने मेरे रात्रि विश्राम का प्रबन्ध यहाँ ही किया था।
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गेस्ट हाउस के बाहर का नजारा बहुत मनमोहक था।
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चारों ओर हरियाली ही हरियाली पसरी थी
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मैदान में चीड़ का यह विशालकाय वृक्ष 
उत्तराखण्ड के पहाड़ी राज्य का आभास करा रहा था !
सुरेश जी ने अपनी फोटो भी इसी चीड़ के पेड़ के नीचे खिंचवाई।
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इसके बाद मेरी भी फोटो सुरेश जी ने खींच ही ली!
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सुरेश राजपूत जी ने अपने घर की सीढ़ियों के साथ 
दीवार में गणेश जी की बहुत सारी पेंटिग अपने हाथों से बनाईं हैं।
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यहाँ आने और जाने पर मैं गणेश जी को प्रणाम करना न भूला!
इस प्रकार से मेरी एक दिन की पन्तनगर विश्वविद्यालय की यात्रा सम्पन्न हुई!

Thursday, 21 July 2011

"खटीमा मॉर्निंग में साहित्यिक गोष्ठी की धूम!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

खटीमा मॉर्निंग में साहित्यिक गोष्ठी की धूम!
अब यह 1 मिनट का वीडिओ देखिए!
साहित्य शारदा मंच खटीमा के बैनर तले एक कविगोष्ठी का आयोजन किया गया!
साधना न्यूज चैनल द्वारा इसकी कवरेज दिखाई गयी!
आयोजक-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"

खटीमा (उत्तराखण्ड) में वर्षा ऋतु के स्वागत में
सावन के प्रथम दिन राष्ट्रीय वैदिक विद्यालय में
एक कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया!
गोष्ठी का शुभारम्भ और अतिथियों का स्वागत किया गया!
गोष्ठी की अध्यक्षता रामनगर नैनीताल के पधारे
शायर सगीर अशरफ ने की,
मुख्यअतिथि- कवि एवं साहित्यकार अशोक् कुमार भट्ट
(अ.पुलिस अधीक्षक-ऊधमसिंहनगर) तथा
विशिष्ट अतिथि- मा. पुष्कर सिंह धामी
(राज्यमन्त्री-उत्तराखण्ड सरकार) थे।
जिसका संचालन कवि देवदत्त प्रसून" किया!
इसके पश्चात अतिथियों के द्वारा
माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण
एवं दीप प्रज्वलन किया गया।
गोष्ठी का शुभारम्भ देवदत्त प्रसून की सरस्वती वन्दना से हुआ।
खटीमा राजकीय महाविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष
डॉ. सिद्धेश्वर सिंह ने अपना काव्य पाठ किया-
आइए इक ख़त लिखें हम जिन्दगी के नाम।
उम्र की ना-आशना आवारगी के नाम।।"
तत्पश्चात राजकीय इंटर कॉलेज में हिन्दी के प्राध्यापक
डॉ. गंगाधर राय ने राजनीतिक परिपेक्ष्य में चुटकी लेते हुए कहा-
सत्ता की कुर्सी पर बैठकर तुमने
लिया है मामा कंस का अवतार।
इसलिए प्रजातन्त्र को
कर दिया है तुमने तार-तार।।
राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत सरस पायस के सम्पादक
ने अपने काव्य पाठ में नवगीत का स्स्वर पाठ किया।
हास्य व्यंग्य के कवि गेंदालाल शर्मा निर्जन ने कहा-
सारे देश में घूम के देखो बेईमानों का ढेर है,
कर्णधार जो देश के वो चिकनी मिट्टी के शेर हैं।
प्रवीण सिंह प्रजापति ने ने भी हास्य का शमा बाँधते हुए कहा-
मैं दीवानी ढूँढता हूँ, मैं दीवाना हूँ,
मैं दीवानी ढूँढती हूँ, मैं दीवानी हूँ,...
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पीलीभीत से पधारे गजलकार राम किशोर शर्मा ने कहा-
आ स्वयं दिवाकर सन्धि करे,
कल का फिर प्रातनहीं होगा.....
पीलीभीत से ही पधारे ओज के कवि पुष्पेन्द्र शर्मा दीप ने कहा-
हर दफा ये कमाल होता है,
सबके दिल को मलाल होता है....
पीलीभीत के सिद्धकवि जीतेश राज ने
अपनी ग़ज़ल पेश करते हुए कहा-
जरा मुट्ठी में सारा जहान भरते हैं!
ये मन के पंछी भी कैसी उड़ान भरते है....
खटीमा के प्रख्यात चिकित्सक डॉ. चन्द्र शेखर जोशी ने कहा-
मेरे बगल के खेत में एक मकान उग आया है,
पड़ोसी का कबूतर फिर, नमकीन-बिस्कुट चुग आया है....
किच्छा से पधारे शायर नबी अहमद मंसूरी ने कहा-
नियामत है ये खुदा की
कहीं बारिश कही कहर है....
रूमानियत के शायर
गुरू सहाय भटनागर बदनाम ने कहा
देश पर फिदा जानो तन कर गये,
जान देकर भी रौशन यहाँ कर गये
सितारगंज से पधारे शायर यूनुस मलिक ने कहा-
तिफ्ल जो मुफलिसी में पलते हैं,
वो खिलौनों को कब मसलते हैं....
लालकुँआ नैनीताल से पधारीं
शैलसूत्र पत्रिका की सम्पादिका श्रीमती आशा शैली ने कहा-
बस परिन्दों की तरह नजर आते हैं लोग
जिन्दगी की राह मैं ऐसे भी मिल जाते हैं लोग...
युवा कवि कमलेश भट्ट ने कहा-
कल हम न होंगें तो क्या हमें याद करोंगे,
अगर याद करोगे ते हमें पास कहाँ पाओगे?....
संचालक देवदत्त प्रसून ने कहा-
बात हमारी तुमको अच्छी नहीं लगी
सच्ची थी लेकिन वो तुमको अच्छी नहीं लगी....
गोष्ठी के आयोजक डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा-
बड़ी हसरत दिलों में थी गगन में छा गये बादल!
हमारे गाँव में भी आज चलकर आ गये बादल!!
मुख्य अतिथि कवि एवं साहित्यकार अशोक् कुमार भट्ट ने कहा-
सफलताओं ने दिये मुझे सिर्फ ठहराव।
रही घाट में बँधी वह कैसी नाव…”
इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि मा. पुष्कर सिंह धामी
(राज्यमन्त्री-उत्तराखण्ड सरकार) ने अपने उद्बोधन में कहा
कि यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे आज
खटीमा और सुदूर स्थानों से पधारे कवियों की
रचनाओं का रसास्वादन करने का अवसर मिला।
इस अवसर पर उन्होंने अपने छात्र जीवन में लिखी
रचना का पाठ करते हुए कहा-
स्वतन्त्रता के प्रेमी की अम्बर के आगे सीमा है,
उसकी क्षमता के आगे तूफान बहुत ही धीमा है!
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे शायर सगीर अशरफ ने कहा-
जो बच्चे कूड़े में रोज़ी तलाश करते हैं,
मैं उनमें कोई सिकन्दर तलाश करता हूँ!
अन्त में-
मुख्यअतिथि कवि एवं साहित्यकार अशोक् कुमार भट्ट
(अ.पुलिस अधीक्षक-ऊधमसिंहनगर) को
साहित्य शारदा मंच के अध्यक्ष डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने
संस्था के सर्वोच्च सम्मान साहित्य श्री से अलंकृत किया,
जिसे विशिष्ट अतिथि मा. पुष्कर सिंह धामी
(राज्यमन्त्री-उत्तराखण्ड सरकार) के
कर कमलों से प्रदान किया गया!
आभार दर्शन करते हुए आयोजक डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने
सभी को हरेला और शब्बेबारात की शुभकामनाएँ भी प्रेषित कीं!