| एक वर्ष : 135 पोस्ट गत वर्ष आज ही के दिन “शब्दों का दंगल” शुरू किया था: इस रचना के साथ- Thursday, 30 April 2009"दंगल अब तैयार हो गया।"(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')यह कविता मेरे पुराने ब्लॉग‘‘उच्चारण" पर भी उपलब्ध है। शब्दों के हथियार संभालो, सपना अब साकार हो गया। ब्लॉगर मित्रों के लड़ने को, दंगल अब तैयार हो गया।। करो वन्दना सरस्वती की, रवि ने उजियारा फैलाया, नई-पुरानी रचना लाओ, रात गयी अब दिन है आया, गद्य-पद्य लेखनकारी में, शामिल यह परिवार हो गया। ब्लॉगर मित्रों के लड़ने को, दंगल अब तैयार हो गया।। देश-प्रान्त का भेद नही है, भाषा का तकरार नही है, ज्ञानी-ज्ञान, विचार मंच है, दुराचार-व्यभिचार नही है, स्वस्थ विचारों को रखने का, माध्यम ये दरबार हो गया। ब्लॉगर मित्रों के लड़ने को, दंगल अब तैयार हो गया।। सावधान हो कर के अपने, तरकश में से तर्क निकालो, मस्तक की मिक्सी में मथकर, सुधा-सरीखा अर्क निकालो, हार न मानो रार न ठानो, दंगल अब परिवार हो गया। ब्लॉगर मित्रों के लड़ने को, दंगल अब तैयार हो गया।। |
समर्थक
Friday, 30 April 2010
आज “शब्दों का दंगल” एक वर्ष का हो गया है!
Tuesday, 27 April 2010
“धर्म बदला जा सकता है, जाति नही!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
| मित्रों! आज मैं जातिवादी युग में एक अटपटा सा छोटा सा लेख प्रस्तुत कर रहा हूँ- आज जातिवाद की ज्वाला में हमारा देश झुलसा हुआ है! धर्म का मुद्दा तो आज काफी पीछे छूट गया है! लेकिन इतनी बात तो तय है कि जाति जन्म से होती है! वैदिक काल में पुरुष जाति और स्त्री जाति दो ही होती थी! यहाँ मैं नपुंसक जाति का जिक्र जानबूझकर नहीं कर रहा हूँ, क्योंकि उनमें भी महिला और पुरुष का भेद तो स्पष्ट झलकता ही है! यदि पशुओं की बात करें तो खिच्चर और खिच्चरा की संरचना तो आपने देखी ही होगी! वैदिक काल में वर्ण चार होते थे- ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य और शूद्र! लेकिन आज तो जातीयता के जाल में पूरा समाज जकड़ा हुआ है। जिसको प्रचारित और प्रसारित करने का महान कार्य इस आजाद भारत की सरकारों ने किया है! यदि साफ-साफ कहें तो हमारे उस संविधान ने यह जहर फैलाया है, जिसका निर्माण संसद में बैठकर हमारे राजनेताओं द्वारा किया जाता है! यदि पिछड़ी जाति की बात करें तो इसकी अनुसूची में उत्तराखण्ड में 84 जातियाँ पंजीकृत हैं! इसके अतिरिक्त अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन-जाति और सामान्य वर्ग में भी अनेक जातियों का उल्लेख है! आप यदि चाहें तो अपना धर्म परिवर्तन कर सकते हैं। जैसी की खबरें यदा-कदा सुनने को मिल जाती हैं! परन्तु जाति कभी नहीं बदलती। कारण यह है कि जिस जाति में व्यक्ति ने जन्म ले लिया वह जीवन पर्यन्त उसके साथ जुड़ जाती है और मत्यु तक रहती है! लेकिन विडम्बना देखिए- परिवर्तनशील निवास का प्रमाणपत्र तो जीवनभर के लिए बन जाता है लेकिन पिछड़ी-जाति का प्रमाणपत्र केवल छः माह के लिए ही वैध कहलाता है! बेकारी के इस युग में बेरोजगारों के लिए यह एक परेशानी भरा कार्य है! एक बार के प्रमाणपत्र बनवाने में 300 से 500 रुपये की भेंट तहसील में चढ़ानी ही पड़ती है! यानि बेरोजगारों पर दोहरी आर्थिक मार! मैं 2005 से 2008 तक उत्तराखण्ड-सरकार में अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग का सदस्य रहा! मैंने कितनी ही बार आयोग में यह प्रस्ताव पारित करवाकर सरकार को भिजवाया कि जाति प्रमाणपत्र के लिए कम से कम 3 से 5 वर्ष की वैधता होनी चाहिए। लेकिन सरकार की ओर से कोई उत्तर नही आया। थक-हार कर एक बार तो सचिव समाज कल्याण की पेशी ही लगा दी कि वो आयोग के सामने आकर स्थिति स्पष्ट करें! समाज कल्याण मन्त्रालय का अपर सचिव आयोग के समक्ष पेशी पर आया तो उसने लिखित रूप में बताया कि- क्रीमीलेयर के कारण इसकी वैधता सिर्फ 6 महीने की रखी गई है! जब उससे प्रश्न किये गये कि मात्र 6 महीने में किसी की क्रीमीलेयर कैसे बदल सकती है तो उससे जवाब देते हुए नहीं बना! अन्त में उसने यह कहकर अपना पीछा छुड़ा लिया कि उत्तर-प्रदेश से यह नियमावली हमें विरासत में मिली है! किन्तु दुर्भाग्य यह है कि-आज तक इस अधिनियम में संशोधन नही हो सका है! गरीबों और बेरोजगारों की मसीहा कहलाने का दावा करने वाली चाहे कोई भी सरकार आये उसकी कार्यशैली वही ढाक के तीन पात जैसी ही है! यदि यह लिख दूँ कि मन्त्रियों के पास सरकार चलाने की कोई योग्यता नहीं है तो इसमें कोई सन्देह की गुंजाइश नही होनी चाहिए! आज भी सरकार तो सचिव ही चलाते हैं और वे यह कभी नहीं चाहेंगे कि उनके विभाग के कर्मचारी/अधिकारी रिश्वत के लिए तरसते रहें! |
Friday, 23 April 2010
“लोग क्यों?:डॉ.राजकिशोर सक्सेना राज”
Sunday, 18 April 2010
“उद्यमेन् हि सिद्धयन्ति” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
| एक गाँव में एक धनवान व्यक्ति रहता था! लेकिन वह बहुत कंजूस था। रात-दिन वह इन्ही ख्यालों में लगा रहता था कि किस प्रकार उसके धन में बढ़ोत्तरी हो! परन्तु वह इसके लिए कोई उद्यम भी नही करना चाहता था। एक दिन वह सन्त रैदास जी के पास गया और बोला- “महाराज आप तो महाज्ञानी है। कृपया मुझे धन-सम्पत्ति बढ़ाने का उपाय बताइए।” सन्त रैदास ने उसे ध्यान से देख और एक बीज देकर कहा- “देखो यह बीज बहुत ही चमत्कारी है। तुम इसे अपने घर के आँगन में बो देना। तुम्हारे धन में वृद्धि होने लगेगी।” धनवान व्यक्ति सन्त की बात मान कर ने ऐसा ही किया। दो-तीन माह में उस वीज ने एक बेल का रूप ले लिया और उस पर बहुत सारी सेम दिखाई देने लगीं। लेकिन उसकी सम्पत्ति मे बढ़ोत्तरि नही हुई। वह इससे परेशान हो गया और पुनः सन्त रैदास के पास गया। उसने सन्त जी से कहा- “महाराज आपने जो बीज दिया था वह मैंने वो दिया था। अब तो उस पर बहुत सारी फलियाँ भी लगीं हैं परन्तु मेरी सम्पत्ति में तो एक पैसे की भी वृद्धि नही हुई है।” रैदाल बोले- “भाई! तुम नासमझी कर रहे हो। अगर मैं कहता कि इसे भूनकर खा लो, तुम्हारा पेट भर जायेगा, तो यह तो असम्भव ही होता ना। तुमने उस बाज का सही उपयोग किया। अब वही बीज इतने फल दे रहा है कि तुम ही नहीं अन्य लोग भी उसकी सब्जी खा सकते हो। ठीक इसी प्रकार ही तुम्हारे पास जो सम्पत्ति है उसे किसी उद्यम में लगाओ। उसमें वृद्धि होने लगेगी और तुम्हारे साथ बहुत से अन्य लोगों को भी रोजगार मिल जायेगा।” ”बिना उद्यम के सम्पत्ति में वृद्धि का कल्पना करना मूर्खता है। धन का उपयोग सें के बीज की तरह करो! अन्यथा संचित धन धीरे-धीरे नष्ट हो जायेगा!” |
Wednesday, 14 April 2010
“चमचों की तो यहाँ भी भरमार है”
"ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर। जरा-जरा सी बात पर, अपने बनते गैर।।" 32 वर्ष पहले की बात है। हमारे पड़ोस में उन दिनों अपने एक स्वजातीय की किराने की दूकान थी। उस समय उनकी दूकान में प्रतिदिन 15 से 20 हजार रुपये तक की बिक्री होती थी। समय बदला और धीरे-धीरे उनकी दुकानदारी कम होती गई। अब हालात यह थे कि लेनदारों के साथ उनकी तू-तू, मैं-मैं भी होने लगी थी। हमने उनकी बैंक लीमिट में गारण्टर के रूप में हस्ताक्षर किये हुए थे। यह देखकर हमारे कान खड़े होने लगे थे। एक दिन हमने उनसे पूछा- "भाई साहब क्या बात है? लोग आजकल आपसे अक्सर तू-तू, मैं-मैं क्यों करने लगे हैं?" बस इसी बात पर वो हमसे नाराज हो गये। हमने बैंक से उनकी गारण्टी वापिस ले ली। इसका असर यह हुआ कि उनसे बोल-चाल भी बन्द हो गई। एक दिन किसी मीटिंग में उनके पास ही बैठना पड़ा। सिर्फ हाँ-हूँ में बातें होने लगी। आखिर हमने कह ही दिया कि जितने दिन हमने आपकी गारण्टी रखी उतने दिन का तो उपकार मानिए। लकिन उपकार और इस युग में! यह तो ऐसा था जैसे कि सरदारों के मुहल्लों में नाई की दूकान! अब तो गुटबन्दी शुरू हो गई। उनका एक-आध चमचा देख लेने की धमकी भी दे गया। हमें तो कोई अन्तर नही पड़ा लेकिन कालान्तर में उनकी दुकानदारी चौपट हो गई! अगर आप भी इस चमचागिरि से ग्रस्त हैं तो समय की नजाकत को पहचानते हुए चमचों से दूर रहने की कोशिश कीजिए! यही सुखी रहने का रहस्य है! "कबिरा इस संसार में, चमचों की भरमार। चमचे ही मझधार में, गुम करते पतवार।।" |
Sunday, 4 April 2010
“पानी में रहकर मगर से बैर” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”
सानिया की क्या मज़ाल जो पाकिस्तान में जाकर और हम हिन्दुस्तानियों की मानसिकता का भी जवाब नही! हम भूल क्यों जाते हैं? |
Wednesday, 31 March 2010
"सिरफिरा कवि” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
“हमारी जूती और हमारी ही चाँद”
| सीमा सचदेव जी को उलाहना देते हुए मैंने उनके ब्लॉग नन्हा मन की एक पोस्ट पर निम्नांकित टिप्पणी की थी- |
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा… नन्हें सुमन को तो आपने कभी खोल कर भी नही देखा है। सिरफिरे तो हम ही हैं जो यदा-कदा नन्हा मन पर आ जाते हैं! ३० मार्च २०१० ८:०५ PM |
| इसके प्रत्युत्तर में सीमा जी ने यह कहा- |
नमस्कार शास्त्री जी , कैसे हैं आप ? बहुमूल्य टिप्पणी के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद । आपसे जानकारी मिल रही है कि हमारे ब्लाग की चर्चा चर्चा मंच पर होती है , मुझे इसकी जानकारी नहीं है , अब जाकर देखुंगी । आपकी नाराज़गी जायज़ है , मैं कहीं जा ही नहीं पाती हूं और कहां क्या हो रहा है मुझे पता ही नहीं चलता , इस बात का मुझे स्वयं को खेद है ( कोई सफ़ाई नहीं दूंगी ) नन्हा सुमन मैनें एक दो बार देखा है और बहुत प्यार से सजाया है आपने उसे , उसके लिए हार्दिक शुभ-कामनाएं , आपकी लेखनी का सफ़र यूंही जारी रहे , यही दुआ है । मैनें नन्हामन से आपको जोडा और आपने अपनी सहर्ष सहमति दी तो यह ब्लाग केवल मेरा नहीं आपका भी है ,अब हम तो किसी के ब्लाग पर नहीं जा पाते मजबूरीवश लेकिन आप अपनी ही ब्लाग पर यदा-कदा आते हैं वो कवि ही क्या , जो सिरफ़िरा न हो वो लेखन ही क्या , जो भावों से घिरा न हो सिरफ़िरे होने पर तो नाज़ है एक कलम में समाया पूरा समाज़ है अगर सिरफ़िरे न होते तो क्या कवि होते अगर कवि न होते तो कोटि-२ मील दूर रवि होते रवि को भी जिसने शब्दों मे वश मे कर डाला उस सिरफ़िरे को सलाम हे सिरफ़िरे कवि तेरी कलम को प्रणाम तेरी कलम को प्रणाम seema sachdev |
| सभी पढ़ने वालों को इस सिरफिरे की ओर से फर्स्ट अप्रैल की अग्रिम बधाई! |
Saturday, 27 March 2010
“उपयोगी शिक्षाएँ” (अनुवादकः शास्त्री “मयंक”)
| परोक्षे कार्यहन्तारं, प्रत्यक्षे प्रियवादिनम। वर्जयेत् तादृशं मित्रं, विषकुम्भं पयोमुखम्।। |
| अनुवाद:- जो पीठ पीछे कार्य में बाधा डाले और सम्मुख आने पर मीठी-मीठी बातें करे। उस मित्र को त्याग देना चाहिए। वह उस घड़े के समान होता है जिसके भीतर विष भरा होता है और उसके मुँह में दूध लगा होता है! |
| यावद् भयेत् भेतव्यं, तावद् भयं अनागतम्। आगतं तु भयं दृष्ट्वा, प्रहृतव्यं किं शंकयाः।। |
अनुवाद:- तब तक भयभीत न हों, जब तक भय सामने नही आ जाता। जैसे ही भय सामने आता दिखाई पड़े, उसका मुकाबला करने में कैसी शंका ? अर्थात् भय से भयभीत नही होना चाहिए! |
| उद्यमेन हि सिध्यन्ति, कार्याणि न मनोरथैः। न हि सुप्तस्य सिंहस्य, प्रविशन्ति मुखे मृगाः।। |
अनुवाद:- कार्य परिश्रम से सिद्ध होते हैं, मनोरथ से नही। क्योंकि सोये हुए जंगल के राजा शेर के मुख में भी हिरण स्वयं आकर प्रविष्ट नही होते हैं। |
| रूपयौवनसम्पन्नाः, विशालकुलसम्भवाः। विद्याहीनाः न शोभन्ते, निर्गन्धाः इव किंशुकाः।। |
अनुवाद:- रूप और यौवन से सम्पन्न, विशालकुल में जन्म लेने वाला भी बिना विद्या के सुशोभित नही होता। वह उस टेसू के फूल के समान होता है। जिसमें रूप तो होता है परन्तु सुगन्ध नही होती! |
| विद्वत्त्वं च नृपत्वं च, नैव तुल्यं कदाचन्। स्वदेशे पूज्यते राजा, विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।। |
अनुवाद:- विद्वान् और राजा की कभी भी तुलना नही की जा सकती। क्योंकि राजा केवल अपने देश में पूज्य होता है और विद्वान की सर्वत्र पूजा की जाती है। |
Wednesday, 24 March 2010
“उत्तराखण्ड का प्रवेश-द्वार” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
Saturday, 20 March 2010
“हिन्दी व्याकरण” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
“हिन्दी में रेफ लगाने की विधि”
| अक्सर देखा जाता है कि अधिकांश व्यक्ति आधा "र" का प्रयोग करने में बहुत त्रुटियाँ करते हैं। उनके लिए व्याकरण के कुछ सरल गुर प्रस्तुत कर रहा हूँ! रेफ लगाने की विधि हिन्दी में रेफ अक्षर के नीचे “र” लगाने के लिए सदैव यह ध्यान रखना चाहिए कि ‘र’ का उच्चारण कहाँ हो रहा है ? यदि ‘र’ का उच्चारण अक्षर के बाद हो रहा है तो रेफ की मात्रा सदैव उस अक्षर के नीचे लगेगी जिस के बाद ‘र’ का उच्चारण हो रहा है । उदाहरण के लिए - प्रकाश, सम्प्रदाय, नम्रता, अभ्रक, चन्द्र आदि । हिन्दी में रेफ या अक्षर के ऊपर "र्" लगाने के लिए सदैव यह ध्यान रखना चाहिए कि ‘र्’ का उच्चारण कहाँ हो रहा है ? “र्" का उच्चारण जिस अक्षर के पूर्व हो रहा है तो रेफ की मात्रा सदैव उस अक्षर के ऊपर लगेगी जिस के पूर्व ‘र्’ का उच्चारण हो रहा है । उदाहरण के लिए - आशीर्वाद, पूर्व, पूर्ण, वर्ग, कार्यालय आदि । रेफ लगाने के लिए आपको केवल यह अन्तर समझना है कि जहाँ पूर्ण "र" का उच्चारण हो रहा है वहाँ सदैव उस अक्षर के नीचे रेफ लगाना है जिसके पश्चात "र" का उच्चारण हो रहा है । जैसे - प्रकाश, सम्प्रदाय, नम्रता, अभ्रक, आदि में "र" का पूर्ण उच्चारण हो रहा है । |
Monday, 15 March 2010
Tuesday, 2 March 2010
“सामान सौ बरस का, पल की खबर नही!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
“मत्यु का समय निश्चित है!”
आज दो घटनाक्रम सुनाने का मन है- 1- पाण्ड्वों के अज्ञातवास के समय बियाबान जंगल में जब पाँचों भाइयों को प्यास ने सताया तो युधिष्ठिर ने पानी लाने के लिए क्रम से सभी भाइयों को भेजा परन्तु एक भी लौटकर नही आया! अब स्वयं युधिष्ठर पानी लाने और भाइयों की खोज में निकल पड़े! कुछ दूर पर उन्हें एक स्वच्छ जल का सरोवर दिखाई दिया! सरोवर के समीप जाने पर उन्होंने देखा कि चारों भाई यहाँ मूर्छित पड़े हुए हैं! युधिष्ठर को भी बहुत जोर की प्यास लगी हुई थी अतः वब जैसे ही जल की ओर बढ़े- एक यक्ष की आवाज उन्हे सुनाई दी! ”सावधान! पानी को हाथ मत लगाना! पहले मेरे प्रश्नों के उत्तर दो! बाद में पानी लेना! अन्यथा तुम्हारा भी हाल तुम्हारे भाइयों जैसा हो जायेगा!” युधिष्ठर रुक गये और यक्ष से कहा कि प्रश्न पूछिए- यक्ष ने युधिष्ठर से बहुत से प्रश्न किये जिनमें से एक प्रश्न था- “किम् आश्यर्यम्?” (आश्चर्य क्या है?) युधिष्ठर ने इसका उत्तर दिया- “संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि प्रत्येक जीवित प्राणी अपने को अमर समझता है!” 2- एक बार मृत्यु के देवता यमराज किसी कार्यक्रम में पधारे! जब वे अपने आसन की ओर जा रहे थे तो उनकी नजर कबूतर के एक जोड़े पर पड़ी! कबूतरों को देखकर वे बहुत जोर से हँसे! गरुड़ ने जब यह देखा तो मन में सोचा कि इन कबूतरों का अन्त समय आ गया है! यदि इनकी मृत्यु की घड़ी टल जाये तो अच्छा है! गरुड़ की उड़ने की गति कई हजार मील प्रति घण्टा होती है। अतः गरुड़ जी इन कबूतरों को लेकर कैलाश मानसरोवर की ओर चले गये। वहाँ इ्न्होंने कबूतरों को एक गुफा में छिपा दिया और तत्काल सभा मे लौटकर आ गये! कार्यक्रम समाप्त होने पर जव यमराज उठकर जाने लगे तो देखा कि कबूतर अपने स्थान पर नहीं हैं! इससे यमराज चिन्तित हुए तो अब गरुड़ जी बहुत जोर से हँसे! यमराज ने गरुड़ से पूछा कि तुमने कबूतरों को कहाँ छिपाया है? गरुड़ बोले- महाराज! जब तक आप उन तक पहुँचोगे तब तक मृत्यु की घड़ी टल चुकी होगी! इसलिए मैंने उन्हें कैलाश मानसरोवर के पास एक गुफा में छिपा दिया है! इस पर यमराज बोले- “गरुड़ जी आपने मेरी बहुत बड़ी समस्या हल कर दी है। इन कबतरों की मृत्यु तो कैलाश मानसरोवर के समीप पड़ने वाली गुफा में ही लिखी हुई है! मैं तो सोच रहा था कि इन कबूतरों को कैसे गुफा तक ले जाऊँ!” अब गरुड़ अपना माथा पकड़ कर बैठ गये! कहने का तात्पर्य यह है कि मृत्यु की घड़ी तथा स्थान पहले से ही निर्धारित होता है! मगर प्राणी को इसका ज्ञान नही होता है! क्योंकि वह तो अपने को अमर समझता है! इसीलिए तो किसी शायर ने कहा है- “सामान सौ बरस का, पल की खबर नही!” |
Tuesday, 23 February 2010
“गुरूद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
“संक्षिप्त इतिहास”
Friday, 19 February 2010
“दो सौ रुपये दीजिए! सम्मान लीजिए!!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
“तस्कर साहित्यकार”
| कुछ दिन पूर्व मेरे पास एक जुगाड़ू कवि आये। बोले- “मान्यवर! अपना एक फोटो दे दीजिए!” मैंने पूछा- “क्या करोगे?” कहने लगे- “आपको बाल साहित्य के पुरस्कार से सम्मानित करना है! मैं एक कार्यक्रम करा रहा हूँ। उसमें केवल उन्हीं को सम्मानित किया जायेगा जो दो सौ रुपये की रसीद कटावायेंगे।” मैंने कहा- “कार्यक्रम की रूपरेखा बताइए!” उन्होंने बताना शुरू किया-“7-8 महीने पूर्व धनानन्द प्रकाश की पत्नी की डैथ हुई थी, वो उनकी स्मृति में पुरस्कारों का व्यय वहन कर रहे हैं। एक उद्योगपति ने खाने-रहने और वेन्यू की व्यवस्था कर दी है! इसके अलावा जनरल चन्दा-उगाही भी करेंगे। ” मैंने कहा- “मित्रवर! दान के नाम पर तो हजार-पाँच सौ रुपये दे सकता हूँ। लेकिन पुरस्कार खरीदने के लिए दो सौ रुपये मेरे पास नही हैं।” अच्छा एक बात बताइए- “पुरस्कार और रहने खाने की व्यवस्था तो मुफ्त में हो रही है तो दान-चन्दा और पुरस्कार के एवज में 200 रुपये क्यों माँग रहे हो?” अब वो बुरा सा मुँह बना कर बोले- “अरे यार! क्या मैं किसी के बाप का नौकर हूँ? आखिर मुझे भी तो पारिश्रमिक चाहिए!” जानना चाहते हो इन साहित्यकारों को क्या कहते हैं? इनके लिए तो एक ही नाम है- “तस्कर साहित्यकार!” |
Friday, 12 February 2010
“महर्षि दयानन्द सरस्वती को शत्-शत् नमन!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
आज स्वामी दयानन्द बोधरात्रि है! शिवरात्रि को ही बालक मूलशंकर को बोध हुआ था! परम शैव भक्त कर्षन जी तिवारी के घर टंकारा गुजरात में बालक मूल शंकर का जन्म हुआ था! शिव भक्त होने के कारण इस बालक ने भी शिवरात्रि का व्रत रखा था! रात्रि में शिव मन्दिर में बालक मूलशंकर आखों पर पानी के छींटे डाल-डाल कर जगता रहा कि आज सच्चे शिव के साक्षात् दर्शन हो जायेंगे! आधी रात के पश्चात जब सब भक्त जन सो रहे थे तो कुछ चूहे शिव की पिण्डी पर चढ़कर प्रसाद खाने लगे और वहीं पर विष्टा भी करने लगे! यह देखकर मूलशंकर को बोध हुआ! उन्होंने कहा कि सच्चा शिव तो कोई और ही है! यह शिव जब अपनी रक्षा भी नही कर सकता तो जग का कल्याण कैसे करेगा? यह कह कर उन्होंने व्रत तोड़ दिया और सच्चे शिव की खोज में निकल पड़े! हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने कुरीतियों का खण्डन किया और सत्य सनातन वैदिक धर्म का प्रचार किया! वेदों का महाभाष्य किया तथा दुनिया को सत्य धर्म का मार्ग बताया! महर्षि दयानन्द सरस्वती को शत्-शत् नमन! |
Monday, 8 February 2010
“समीर लाल का स्वर सुन लिया!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
“लाइव-संस्मरण”
“…… ….. की आवाज पतली है?”
Thursday, 4 February 2010
"माँ तुम्हारी आरती में ही मेरा संसार है” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
Monday, 1 February 2010
कृपा करो बिजली महारानी! (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक)
Tuesday, 26 January 2010
“तब और अब” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
Saturday, 23 January 2010
“संस्मरण” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
| दादी चम्मच का प्रयोग किया करो! |
| (चित्र गूगल सर्च से साभार) आज से 45-50 साल पुरानी बात है। उन दिनों एक कबीले की संयुक्त हबेली हुआ करती थी। किसी घर में अच्छी साग-सब्जी बनती थी तो माँग कर खाने में बहुत आनन्द आता था। दादी के हाथ में कढ़ी लगी थी। उसने जीभ से चाट कर अपना हाथ साफ किया और जा पहुँची कड़ाही के पास। जल्दी में चमचा नही मिला तो जूठे हाथ से ही कढ़ी मेरी कटोरी में ड़ाल दी। मैंने कहा- “दादी हाथ तो धोकर साफ कर लिया होता।” इस पर दादी ने उत्तर दिया- “भैया! हाथ चाटकर तो साफ कर लिया था। देख मेरे हाथ में कुछ लगा है क्या?” मैंने कहा- “दादी! हाथ तो साफ है लेकिन जूठन तो लगा ही है।” घर आकर जब मैंने अपनी माता जी को दादी की बात सुनाई तो उन्होंने मेरे हाथ से कटोरी लेकर भैंस की सानी में यह झूठी कढ़ी डाल दी और मेरे लिए तुरन्त कढ़ी बना कर दी! इस संस्मरण को लगाने का मेरा उद्देश्य यह है कि - “किसी का भी झूठा न तो हमें खुद खाना चाहिए और न किसी दूसरे को खिलाना चाहिए!” |
Friday, 15 January 2010
“ओह…आज तो भयंकर कुहरा है!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
Tuesday, 12 January 2010
"कितना कुहरा है?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
खटीमा की सड़कों में दिल्ली जैसी भीड़-भाड़ रहती है। मोटर साइकिलों ने साधारण साइकिलों को तो मात दे दी है लेकिन आज तो मोटर साइकिलों के चक्के जाम हो गये हैं। आज दोपहर को 1 बजे भी मेरे घर के सामने पिथौरागढ़ राष्ट्रीय-राजमार्ग पर केवल इक्का-दुक्का साइकिल ही नजर आ रहीं हैं। |