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Wednesday, 20 May 2009

‘‘उस पार आनन्द है?’’ (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

लगभग 20 वर्ष पहले की बात है। रात के 1 और 2 बजे के मध्य का समय रहा होगा। मैं लघुशंका के लिए उठा और वापिस आकर फिर अपने बिस्तर में लेट गया।

थोड़ी देर में मुझे आभास हुआ कि मेरा पाजामा और कमीज कई जगह से भीगा हुआ है।

मैं अपनी बुद्धि दौड़ाने लगा कि यह सब कैसे हुआ होगा?

सोचते-सोचते दिमाग ने काम करना शुरू कर दिया । सब बातें याद आने लगी।

मैं जिस समय लघुशंका के लिए गया था तो काफी नींद में था। बाथरूम में जाकर मैं मूर्छित हो कर गिर पड़ा था। यह तो याद नही कि कितने समय तक यह मूर्छा रही ? परन्तु जैसे ही होश में आया था। मैं अपने बिस्तर में आकर लेट गया था।

उस अचेत अवस्था में मैने कैसा अनुभव किया?

यही बताने के लिए इस घटना को पोस्ट के रूप में प्रकाशित कर रहा हूँ।

जब मैं अचेत अवस्था में था तो मुझे इतना आनन्द आ रहा था कि कि उसे शब्दों में वर्णन कर पाना सम्भव नही है। सुना है कि स्वर्ग में सुख ही सुख होता है इसके अलावा और कुछ नही।

मैं भी सुख ही सुख अनुभव कर रहा था। न घर परिवार की चिन्ता थी तथा न ही दुनियादारी के बन्धन। अर्थात्..........................अपार आनन्द। जो शायद उस पार ही है।

दूसरी घटना आज से 2 वर्ष पूर्व की है। मेरी पीछे वाली निचली दाड़ में बहुत तकलीफ थी। शहर के कई नामी डेण्टिस्टों को दिखाया परन्तु कोई लाभ नही हुआ।

संयोग से उन दिनों प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और मैं सरकार में आयोग का सदस्य भी था। उस समय सरकारी अस्पताल में नई उम्र के एक होशियार दाँतो के डाक्टर मेहरा थे। जब उन्हें दिखाया तो उन्होंने मेरी दाड़ का एक्स-रे किया और बताया कि इसे निकालना पड़ेगा।

मैने उनसे कहा कि इसे निकाल दीजिए। वह संकोचवश् मना नही कर सके और कम्पाउण्डर से कहा कि दाड़ निकालो। मैं तुम्हारी मदद करूँगा। क्योंकि डाक्टर साहब के हाथ में बैण्डेज बँधी हुई थी।

कम्पाउण्डर तो कम्पाउण्डर ही ठहरा। उससे दाड़ पूरी तरह सुन्न करनी नही आयी और जम्बूड़ लेकर उसने जैसे ही दाड़ खींची मैं अत्यधिक दर्द के कारण मूर्छित हो गया।

जब मुझे होश आया तो मैंने अपने सामने अस्पताल के पुरे डाक्टरों की फौज खड़ी हुई देखी।

आप विश्वास करें या न करें। परन्तु मुझे उस समय भी मूर्छित अवस्था में स्वर्ग जैसा आनन्द आ रहा था। जहाँ दुख, कष्ट और क्लेश का नामो निशान तक नही था।

मैं सारे सांसारिक बन्धनों से अपने को मुक्त पा रहा था।

8 comments:

  1. kuch anubhuti sirf mhsus hi ki ja skti hai uska vrnn sbdo se pre hota hai .

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  2. मूर्छित होने की तैयारी प्रारंभ
    करने की बेला आ गई है!

    सांसारिक तनावों से मुक्ति के लिए
    यह एक अच्छा साधन हो सकता है,
    पर मुझे लगता है कि
    यह सब अनायास होने पर ही संभव है!

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  3. shatri jee ko naman... bahut baDi baatein hai... aapne samajha dii hamne samjh lii... badhai...

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  4. ये अनुभूति उन्हें ही होती है जो दूसरों की सँवेदनायें मेह्सूस करते हैं और भगवान कीसत्ता मे आस्था रखते हैं उन्हें भगवान जीवन के सत्य का आभास देता है ताकि वो दुनिया को बता सकें कि भगवान की सत्ता मे कितना सुख है ध्यान मे भी आदमी इसी सुख का अनुभव करता है आभार्

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  5. बड़ा ही रोचक लगा आपका यह संस्मरण....चलिए इससे इतना तो पता लगा कि इस देह से मुक्ति के उपरांत दुःख कष्ट नहीं सुख ही रखा हुआ है....

    अच्छा है,इस तरह की जानकारी यह मनुष्य के मृत्यु भय को कम करने में सहायक होगा ...

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  6. काफी रोचक संस्मरण है ....

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  7. jis aseem aanand ke liye insaan sari umra daudta firta hai uska anubhav aapko murchit hone par hua.......ise aap bhagwan ki aseem anukampa samjhein........is anubhav ke liye bade bade rishi muni apna poora jeevan laga dete hain aur tab bhi yeh unhein naseeb nhi hota jo aapko sahajta mein anubhav ho gaya.........is anubhav ko wo hi jan sakta hai jisne ye mehsoos kiya ho..........sach us paar sirf anand hi anand hai .

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