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Monday, 18 May 2009

"पं0 लक्ष्मीनारायण मिश्र का एकांकीकारों में विशेष स्थान है।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


सन् 1985-86 की बात है। उन दिनों पं0 लक्ष्मीनारायण मिश्र जी हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग के अध्यक्ष थे। 1986 में गाजियाबाद में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन हो रहा था।
पं0 लक्ष्मीनारायण मिश्र जी मुझे और डॉ. सभापति मिश्र (जो इलाहाबाद के पास हंडिया महाविद्यालय में हिन्दी के विभागाध्यक्ष थे।) को बहुत पसन्द करते थे।
पारस होटल गाजियाबाद में पं0 जी के ठहरने की व्यवस्था की गयी थी। उनके साथ सहयोगी के रूप में डॉ. सभापति मिश्र और मैं स्वयं मौजूद था। दोपहर के समय पं0 जी से मिलने के लिए 2-3 व्यक्ति और आ गये।
पं0 जी का गद्य और पद्य पर समान अधिकार था।
मैंने पं0 जी से कुछ सुनाने के लिए कहा-
तो पं0 जी बोले- ‘‘आप बताइए क्या सुनना चाहते हो?’’
मैंने कहा- ‘‘पं0 जी आज तो रसराज ही सुना दीजिए।’’
मेरे आग्रह को पं0 लक्ष्मीनारायण मिश्र जी ने ठुकराया नही और शुरू कर दिया- रसराज। मैं यह निसंकोच लिखना चाहता हूँ कि मैने अपने जीवन में कभी इतना अच्छा प्रकृति का श्रंगार नही सुना।
आज पं0 लक्ष्मीनारायण मिश्र जी इस दुनिया में नही हैं। परन्तु उनके साथ बिताये वो क्षण मुझे जीवनभर नही भूलेंगे।
प्रस्तुत है उनके कृतित्व की एक झलक-
‘‘कला के मूल में जब तक जीवन की व्यापक भावना नही रहती, पर वह पूरी नही हो पाती। कला की सफलता जीवन को पकड़ने में है, उससे विद्रोह करने में नही।’’पं0 लक्ष्मीनारायण मिश्र जी का यह कथन स्पष्ट करता है कि वे सोद्देश्य रचनाधर्मी थे।उन पर पाश्चातय नाटककार इन्सन, शा, मैटरलिंक आदि का खासा प्रभाव था। लेकिन फिर भी उनके एकांकियों में भारत की आत्मा बसती थी।
डा0 रामचन्द्र महेन्द्र के शब्दों में-
‘‘मिश्र जी का मूल स्रोत यही अतीत भारतीय नाट्यशास्त्र है। उनका यथातथ्यवाद, मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि और और यथार्थवाद संस्कृत नादकों से ही मिले हैं। वे अन्तरंग में सदैव भारतीय है। उन्होंने भारतीय जीवन दर्शन के अनुरूप परिस्थितियों तथा कर्म व्यापारों का गठन किया है। प्राचीनता से भारतीय संस्कार लेकर नवीनता की चेतना उनमें प्रकट हुई है। फिर, यदि वे पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक या विचारकों के समकक्ष आ जाते हैं, तो हमें उनकी यह मौलिकता माननी चाहिए, अनुकरण नही।’’
पं0 लक्ष्मीनारायण मिश्र जी ने प्रचुर मात्रा में गद्य तथा पद्य दोनो मे ही साहित्य स्रजन किया है। मौलिक स्रजन से लेकर अनुवाद तक उन्होंने सोद्देश्य लेखन किया है। उन्होने लगभग 25 नाटकों ओर 100 एकांकियो का सृजन किया है। अशोक वन, प्रलय के मंच पर, कावेरी में कमल, बलहीन, नारी का रंग, स्वर्ग से विप्लव, भगवान मनु आदि उनके प्रख्यात एकांकी संग्रह हैं।
मिश्र जी के एकांकी विषय वस्तु की दृष्टि से पौराणिक, ऐतिहासिक, तथा मनोवैज्ञानिक पृष्ठ भूमि लिए हुए हैं।
उनके एकांकियों में पात्र कम संख्या में रहते हैं। वे उनका चरित्रांकन इस प्रकार करते हैं कि वे लेखक के मानसपुत्र न लग कर जीते-जागते और अपने निजी जीवन को जीते हुए लगते हैं।
मिश्र जी की सम्वादयोजना सार्थक, आकर्षक, सरल, संक्षिप्त, मर्मस्पर्शी तथा नाटकीय गुणों से परिपूर्ण होती है। जिसमें तार्किकता और वाग्विदग्धता तो देखते ही बनती है, उदाहरण के लिए ‘‘बलहीन’’ का सम्वाद देखें-
देवकुमार- तब तुमने स्त्री से विवाह किया है?
रजनी- संसार में धोखा बहुत होता है।
देवकुमार किसने रख दिया तुम्हारा नाम?
देवकुमारी रखा होता तो भ्रम में न पड़ती।
पं0 लक्ष्मीनारायण मिश्र जी के एकांकी सहज हैं और रंग-मंचीय परम्पराओं की कसौटी पर खरे उतरते हैं। उनकी सफलता इस बात में है कि वे अपने उद्देश्य की पूर्ति उपदेशक बन कर नही अपितु कलाकार के रूप में करते हैं।
डॉ. रामकुमार वर्मा, लक्ष्मीनारायण लाल, पं0 उदयशंकर भट्ट, तथा उपेन्द्र नाथ अश्क आधुनिक युग के प्रमुख एकांकीकारों में गिने जाते हैं परन्तु पं0 लक्ष्मीनारायण मिश्र का स्वर इन सबसे अलग रहा हे। हिन्दी के एकांकीकारों में उनका अपना एक विशेष स्थान है।
अपने गुरू-तुल्य पं0 लक्ष्मीनारायण मिश्र जी को मैं शत्-शत् नमन करते हुए उनको अपने श्रद्धा-सुमन समर्पित करता हूँ।

4 comments:

  1. शास्त्री जी ।
    आपका लेख अच्छा है। उच्च कक्षाओं के छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।

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  2. मयंक जी ।
    एम.ए में पं0 लक्ष्मीनारायण मिश्र जी को पढ़ा है। इस उपयोगी लेख के लिए धन्यवाद।

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  3. मयंक जी,
    इन जानकारीपूर्ण और शिक्षाप्रद
    आलेखों का प्रकाशन करते रहिएगा!

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  4. shikshaprad lekh ke liye dhanyvaad.

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