‘‘अगर बुरा लगे तो क्षमा करना’’
हमारे विद्यालयों ओर विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जा रहा है कि ताजमहल एक कब्र है। बादशाह शाहजहाँ ने अपनी बेगम मुमताजमहल की याद में यह कब्र बनाई गयी थी।
इसे बनवाने के लिए कितने मजदूर, कितने वर्ष काम करते रहे?
नक्शा किसने बनाया था?
भवन कब बनकर तैयार हुआ?
उस पर कितनी लागत आई थी?
यह आज सब कुछ तैयार कर दिया गया है।
कौन पूछे कि बनाने वाले को तो उसी के बेटे ने जेल में डाल दिया था। उसकी हालत आर्थिक रूप से क्या थी? कि जिन्दा बाप ऐ-आबतरसानी। ऐ बेटे! तू अजब मुसलमान हैकि जिन्दा बाप को पानी की बून्द-बून्द के लिए तड़पा रहा है। तुझसे तो हिन्दू मूर्ति-पूजक बेहतर हैं जो श्राद्ध के नाम पर मरने के बाद भी माँ-बाप को भोजन भेज रहे हैं। किसी ने यह तो पूछना नही है कि उस जेल में पड़े लाचार बादशाह के पास इतना धन था भी या नही कि जो ताज बनवा सकता।
इतिहासकार ने लिखा है कि ताज के गिर्द पैड बनवाने में ही खजाना खाली हो गया था। हम पाठकों से यह निवेदन करेंगे कि यदि उन्हें कुछ अवसर मिले तो एक बार ताजमहल अवश्य देखें।
१ - ताजमहल के अन्दर प्रवेश करने से पहले मुख्यद्वार तक पहुँचने के लिए जो चाहर-दीवारी बनी है, उसमें सकड़ों छोटे बड़े कमरे बने हैं।
गाइड बतायेगा कि इनमें बादशाह के घोड़े बँधते थे, घुड़सवार यहाँ ठहरते थे।
हाँ! आप किसी गाइड से यह मत पूछ लेना कि कब्रिस्तान में घुड़सवार क्यों रहते थे? क्या मुरदे रात को उठ कर भाग जाते थे, जिन्हें रोकना जरूरी था? या, जीवित मुर्दे रहते थे, जिनकी रक्षा और सेवा के लिए घुड़सवार चाहिए थे?
२ - यहाँ प्रविष्ट होते ही एक कुआँ है जो पहले यन्त्रों के द्वारा चलाया जाता था। उस कुएँ की कई परतें हैं। सारा कुआँ यन्त्र से खाली किया जा सकता था। यदि जरूरत हो तो उसमें से पीछे बहने वाली यमुना नदी में सुरक्षित पहुँचा जा सकता था। निचले तल में कोई भी सामान सुरक्षित करके रखा जा सकता था और साथ ही ऊपर के तल को यमुना के पानी से इस प्रकार भरा जा सकता था कि नीचे की तह का किसी को पता भी चले और सामान भी सुरक्षित रह जाये।
(क्या यह विलक्षण कलायुक्त कूप इस स्थान को मुर्दो की बस्ती की जरूरत की चीज बता सकता है।)
३ - आगे खुले मैदान में दो कब्रें बनी हैं। इतिहास साक्षी है कि मुमताज आगरा में नही मरी थी। वह तो खण्डवा के पास बुरहानपुर में १० -१२ वर्ष पहले मरी थी और वहीं दफनाई गयी थी। आज भी वहीं उसकी कब्र बनी है।
परन्तु गाइउ आपको बतायेगा कि बुरहानपुर से कब्र में से निकाल कर लाश १२ वर्ष बाद खोद कर लाई लाई गयी और यहीं आगरा में सुरक्षित इस स्थान पर कब्र में नीचे रख दी गयी। जब ताज का निर्माण पूरा हो गया तो वहाँ से फिर खोद कर निकाली गई और उसे ताज भवन में दफना दिया गया। उस ऊँचे गुम्बद के नीचे जहाँ पटल लगा है, मलिका मुमताज महल नीचे की कब्र में हमशा की नींद सो रही है।
परन्तु आप हैरान होंगे कि जहाँ असली कब्र बताई जाती है वह स्थान तो भूमि ही नही है। वह ताज भवन के दुमंजिले की छत है। पीछे बहने वाली यमुना नदी उससे २० - २५ फीट नीचे ताज की दीवार के साथ सट कर बह रही है। यानि कब्र के नाम पर दुनिया की आँखें में धूल झोंक दी गयी है। कब्रें छतों पर नही भूमि पर बनतीं हैं।
४ - उसके पीछे की दीवार में (यमुना में खड़े होकर देखने पर साफ दिखाई देता है कि दीवार में बहुत सारी खिड़कियाँ बनी हैं, जिन्हें पत्थर - मिट्टी भरकर बन्द करने की कोशिश की गई है। परन्तु वे अधखुली खिड़कियाँ चुगली कर रही हैं।) अन्दर ताज की कब्र की सीढ़ी के सामने भी एक दरवाजा है। उसे ताला लगा कर बन्द किया गया है, जिस पर पटल लगा है-
सरकारी आदेश से अमुक सन् में यह द्वार बन्द किया गया है।
यदि आप यह दरवाजा खुलवा कर कभी अन्दर झाँक सकें तो वहाँ पुरानी टूटी मूतियाँ और मन्दिर के खण्डहर मिल जायेंगे। वहाँ उस मंजिल में पचासों कमरे हैं जिनकी खिड़कियाँ जमुना जी की तरफ खुलती हैं।
इस पर हमसे कहा जाता है कि इस बात पर विश्वास कर लो कि यह कब्रिस्तान है। ये कमरे क्या मुरदों के निवास के लिए बनाये गये थे?
५ - भवन के सामने भूमि पर ताज का मानचित्र बनाया गया है। जो भारतीय वास्तुकला के नियमानुसार है।
ताज शिखर पर जो मंगलघट बना है। उस घट के मुख पर नारिकेल और आम्रपत्रिकाएँ बनाई गयी हैं और त्रिशूल चमक रहा है। वही सब कुछ मानचित्र में भी बना है।
इतने सारे प्रमाण होते हुए भी अंग्रेज लोग २०० साल तक हमें यह पढ़ाते रहे कि यह मुस्लिम संरचना है।
आजादी के साठ से अधिक वर्ष बीत जाने पर भी आज तक हमारे कालिजों में इतिहास की खोजो के नाम पर वही पढ़ाया जा रहा है जो कि अंग्रेज हमें पढ़ाते थे।
(अमृतपथ, देहरादून जुलाई ,२००९ से साभार)
hamein to is bare mein koi jankari nhi hai..........aapne pahli baar batayi hai.......aaj tak aisa kuch suna bhi nhi.
ReplyDeletekya kah sakte hain kiska dosh hai.........us waqt ke logon ka ya aaj ke.
shastri ji,
ReplyDeletejankari gyanvardhak aur tark yukt h.
Aur tarak se kisi bhi baat ka loha manvaya ja sakta h.
Aapne ithiskaro ko jo pol kholi hi uski ek prati ithaskar smiti Delhi tatha RSS walo ko bhi bhej do. Apna kya lagta h. Khud bojhh marenge.
Gussa aata bahut bar En syllabus bananae walo ko.
Jo sarkar aaj tak Netaji ke baar mein koi baat sapashat nahi kar saki, ya jo sarkar yeh kahti h ki Bhagat Singh ugarvadi tha, un netao ko neta kahne mein bhi sahrm aat h. Maaf karna m hindi mein type nahi kar sakta. Kyonki mujhe Kruti jaise fonts mein hi type karna aasan lagta h. Aur fint convertor ke through font convert karna achchha nahi lagta.
Khud ka likha Comment dubara nahi padhta hu KYONKI MERA MANANA H KI YEH BHI EK PATAR AUR PATAR DUBARA PADHNE SE JHHUTHE HO JATE H.
PUNAH - PUNAH AABHAR.
RAMESH SACHDEVA
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अद्भुत और अनोखी जानकारी..
ReplyDeleteहमे इस बारे मे पता ही नही था..इतिहास के नाम पर जो भी पढ़ाया जाता है.
सब कुछ दिमाग़ मे वहीं चलता है.
इतिहास के पीछे की अच्छी घटनाएँ आप ने बताई जो वास्तव मे
दुर्लभ थी..
हम ऐसे रोचक और ज्ञांवर्धक जानकारी के लिए आपको बधाई देते है..
बधाई हो!!!
शास्त्री जी
ReplyDeleteसादर प्रणाम !
एक घटना मै भी आप को बताता हूँ, हमारे एक गुरु है वैसे वो भाई ज्यादा है, इतिहास कि अच्छी जानकारी है उनको, वे एकबार ताजमहल देखने गए तो उन्होंने एक लडके को वही कुए में अपना विजिटिंग कार्ड डालते देखा तो उससे पूछा कि भाई ये क्या कर रहे हो? तो उसने कहा ये प्रेम का प्रतीक है इससे मुझे भी मुमताज मिलेगी. तो गुरु जी ने उससे कहा मुमुताज़ आज के हिसाब से सैकडों वर्ष कि होगी यैसी मुमताज से प्यार करोगे? और सोलहवां बच्चा पैदा करते वक्त मुमुताज मरी थी, क्या उस प्रेम को आज के युग में साकार कर पाओगे? तथा भारतीय इतिहास में शाहजहाँ के जिन चार पुत्रों का उल्लेख है जिसे तत्कालीन राजशाही ने मान्यता दी उनमे मुमताज का एक भी पुत्र नहीं था, अब बताओ क्या यैसे प्रेम कि कमाना तुम इस प्रेम के प्रतीक से करते हो जिसमे वासना से लेकर सभी बुराइयाँ झलकती है सिवाय प्रेम को छोड़कर. ये सुनते ही वो हक्का-बक्का रह गया और उसके पास इसका कोई उत्तर नहीं मिला.
यहाँ बात यह नहीं है कि उसने बाद में क्या सोचा बल्कि मूल प्रश्न यह है कि वास्तव में हमें इतिहास के नाम क्या पढाया जा रहा है?
रत्नेश त्रिपाठी
मैने तो ताजमहल देखा ही नहीं मेरे लिये तो ये जानकरी रोचक और ग्यानवर्धक है आभार्
ReplyDeleteकमाल की जानकारी. मुझे भी इस इतिहास की जानकारी नहीं थी.
ReplyDeleteमेने इसे पहले भी पढा है, सुरेश जी के ब्लांग पर कहो तो आप को लिंख भी भेज दुगां, दुसरा मै ताज के हर कमरे मै घुमा हुं,लेकिन उस समय बहुत छोटा था,चारो मिनारो पर भी चढा हुं ओर नीचे जो तह खाने है, वहा भी अन्दर तक गया हुं, लेकिन ज्यादा अन्दर तक नही, फ़िर ताज मै जहा कब्र है वहा भी, यानि मेरा बचपन इस ताज मै ही बीता है, आप ने उस कुये के बारे सही बताया है, उस कुये मै बहुत से गुप्त दरवाजे भी है, आप की बात मै दम है, लेकिन अब कोन सुने गा, कहते है कि यह एक शिव मंदिर था.
ReplyDeleteधन्यवाद
बेहतरीन जानकारी!!
ReplyDeletejhalla khud itihaas ka chatr rahaa hai .beetee sadi ke saatven dashak mai meerut college mai ek patle duble se itihaaskaar aaye the tab unhone jo taaj kaa chitr kheenchaa thaa uski aapne pusthee karne ka saahas kiyaa hai .badhaai.aapke is blog ki badtee lokpriytaa se lagtaa hai ki ayodhyaa ke baad ab..................
ReplyDeletejhallevichar.blogspot.com
Bade bhai,
ReplyDeletebahut achchhi jaankari dee hai aapne.
sarahneey evam vichaarneey hai.badhai!
आपसे मैं पूरी तरह सहमत हूं। पर मजबूरी वही है जो रोज-रोज दिखाया, पढाया, समझाया जाता रहेगा उस पर एक न एक दिन विश्वास हो ही जाता है।
ReplyDeleteएक उदाहरण देता हूं। जो भी पार्टी सत्ता में आती है वह अपनी सुविधा के अनुसार पाठ्य पुस्तकों में फेर बदल करवा देती है। तो सैंकड़ों साल जो हमारी छाती पर मुंग दलते रहे तो उन्होंने क्या-क्या फेर बदल किये होंगे हमारे इतिहास में उसकी तो कल्पना भी सिहरा देती है।
सादर ब्लॉगस्ते!
ReplyDeleteआपका संदेश अच्छा लगा।
अब सरकोजी मामा ठहरे ब्रूनी मामी की नग्न तस्वीर के दीवाने। वो क्या जाने बुर्के की महिमा। पधारें "एक पत्र बुर्के के नाम" सुमित के तडके "गद्य" पर आपकी प्रतीक्षा में है
इस विषय में किसी मिस्टर ओक नाम के इतिहासकार एवं लेखक के विचार पढे थे,जिन्होने ये सिद्ध करने का प्रयास किया था कि ताजमहल वास्तव में "तेजोमाहल" अर्थात भगवान शिव का स्थान है. आज आपके इस लेख ने हमारे उस विश्वास को पूर्णत: दृ्ड कर दिया कि सचमुच में ऎसा ही होगा।
ReplyDeleteआभार इस बेहतरीन जानकारी का......
rochak aur gyanvardhak jankare ke liye badhai....
ReplyDeleteTaaz Dekhne Ki Jigyasa Badha Di Aapne...
ReplyDeleteSir Ji.
ReplyDeleteAapne bilkul nai jankari di hai.
hum to abhi tak is rahasya se anbhigya the. Dhanyavaad.
ताज की पोल खोलने के लिए धन्यलाद!
ReplyDeleteMayank ji!
ReplyDeleteAapane logon ki aankhen khol di hain. vakai men yahi sachchai hogi.
आपने जो तर्क दिये हैं। उनको पढ़ कर तो यह लगा कि यह कोई देवालय ही रहा होगा।
ReplyDeleteधन्यवाद!
AAPNE TO IENA DIKHA DIYA HAI.
ReplyDeleteapne jo jankari di hai uske bare me suna hai mai abhi fubrery mah me hi taj gai thi .vhai jyada samy tonhi mil paya par gumbad ke upar om aur trishul saf dikhte hai .
ReplyDeleteak bat aur jab chekiing ho rhi thi to mere pars me durga chaleesa ki kitab thi tab mujhe un logo ne hidayt di ki mai andar ise n pdhu tab mujhe kafi aashchry hua tha .
मैं तो चार बार जा चुकी हूँ आगरा क्यूंकि मुझे ताजमहल बहुत अच्छा लगा! आपके पोस्ट के दौरान अच्छी जानकारी मिली!
ReplyDeleteI can suggest to visit to you a site, with an information large quantity on a theme interesting you.
ReplyDeleteBilkul sahi, hamare vastukala se bi milta hai. Lekin ab hum kah k hi kya karenge. Jab Annaji haq mangte hain to sarkar bahri jo jati hai. 12 din bhuke rahna padta hai. aur agar hum taj mangege to pata nahi sarkar ki kya hogi?
ReplyDeleteaap kahna chate ho ki taaz ko shajahan ne nahi banai, hmne v taz ko deka hai aap ne itni sari bata di pr aap ne ye nahi bataya ki puri tazz mahal me quran ki prtiya likhi hai ........
ReplyDeleteq apni trha se jhut muth k mngadn kahani bana k india ko todne ka kam kr rahe ho...
ye sb jante hai taz ko kisne banaya ,kaise bana aur kb bana iska pukhta sabut hai ,,aur dusri trf aap jaise log bargala rahe hai, ki taz ek mandir tha bina kisi sabut k ,pr tazzub to tb hota hai jb ispr sb yakin krte hai ..aur ek baat shajahan ko aurngjeb ne banndi jarur banaya tha rajniti dristi kon se waise wo apne baap ka ijjat bahut krta tha aur taz banne k baad banddi bana tb jb shajahaan ne ek kale sangmarm ka ek aur taz banane ka nirnay kiya tb uske bete ne suse mahal me nazar band krya kun ki us waqt des me aakal ho gaya tha shajahan kale sangmarmar ki taz banae jaraha tha .........des ko brgalana chodo