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Tuesday, 19 May 2009

‘‘काश् हर बालक ऐसा ही होता!’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

(इशान्त कुमार, कक्षा-शिशु "क", आयु 4 दिन कम तीन साल)

आजकल विद्यालयों में नवीन प्रवेश धड़ल्ले से चल रहे हैं। हर रोज की तरह मैं भी अपने विद्यालय के कार्यालय में बैठा था। तभी एक अभिभावक अपनी पुत्र को लेकर शिशु कक्षा में प्रवेश कराने के लिए आये।

उस बालक की आयु 4 दिन कम तीन साल थी। पहले तो मैंने इस बालक के प्रवेश में आनाकानी की परन्तु उनके आग्रह के कारण मुझे इसको प्रवेश देना ही पड़ा।

अब इस बालक का प्रवेश विद्यालय में हो गया था। वह बड़े ही चाव से अपनी कक्षा में बैठ गया। अक्सर यह देखने में आता है कि नवीन प्रवेश होने पर या तो 1-2 दिन कक्षा में रोते हैं या घर जाने की रट लगाये रहते हैं। लेकिन यह बालक दूसरे बालकों से मिन्न प्रवृत्ति का था। यह अपनी कक्षा में शान्त भाव से बैठा रहा था। छुट्टी होने पर उसकी माता उसे विद्यालय में लेने के लिए आयी। परन्तु वह बालक घर जाने के लिए तैयार ही नही था। वह जिद करने लगा कि वह विद्यालय में ही रहेगा।

काश् हर बालक ऐसा ही होता, जिसमें विद्यालय के प्रति इतनी लगाव होता।

7 comments:

  1. होनहार बीरबान के होत चिकने पात .. उसे शुभकामनाएं।

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  2. जी हां शास्त्री जी, कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं.मै खुद भी विद्यालय से जुडी हूं, और देखती हूं कि हर नये सत्र में ऐसे एक दो विद्यार्थी ज़रूर आते हैं.

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  3. मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखने पर
    उसके विद्यालय-प्रेम के
    कई कारण हो सकते हैं!
    जैसे - विद्यालय का वातावरण
    उसके घर के वातावरण से
    बेहतर होना और ... ... .

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  4. और ... ... .

    . ... ... विद्यालय के
    शिक्षक-शिक्षिकाओं द्वारा
    पहले ही दिन से उसके साथ
    अच्छा व्यवहार किया जाना!

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  5. शुभकामनाएँ और साधुवाद!

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  6. ji han, kuch bachche aise bhi hote hain aur wo hi bade hokar kuch ban pate hain jinhein aisa lagav hota hai.

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