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Friday, 17 June 2011

‘‘18 जून-बलिदान-दिवस पर विशेष’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

अमर वीरांगना झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई के

बलिदान-दिवस पर उन्हें अपनी श्रद्धांजलि समर्पित करते हुए
श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान की
यह पूरी अमर कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ।
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सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटि तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी।
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम पिता की वह संतान अकेली थी।
नाना के संग पढ़ती थी वह नाना के संग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाली की गाथाएँ उसको याद जबानी थीं।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता का अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार।
नकली युद्ध व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्ट्र कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में।
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुभट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में।
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छाई,
किन्तु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई।
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं,
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निःसंतान मरे राजा जी रानी शोक-समानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया।
फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फिरंगी की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया।
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया,
राजाओं नब्वाबों के भी उसने पैरों को ठुकराया।
रानी दासी बनी यह दासी अब महारानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों-बात.
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात।
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात,
जबकि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र निपात।
बंगाले-मद्रास आदि की भी तो यही कहानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोई रनिवासों में, बेगम गम से थी बेजार,
उनके गहने।कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार।
सरेआम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार,
नागपूर के जेवर ले लो, लखनऊ के लो नौलख हार।
यों परदे की इज्जत पर। देशी के हाथ बिकानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटिया में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान।
नाना धुंधुंपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रणचंडी का कर दिया प्रकट आह्वान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरमन से आई थी।
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं,
मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी।
जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

नाना, धुंधुंपंत, ताँतिया, चतुर अजीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम।
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम,
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़ चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में।
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में।
जख्मी होकर वाकर भागा उसे अजब हैरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थककर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार।
यमुना-तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी,
अब के जनरल स्मिथ सन्मुख था, उसने मुँह की खाई थी।
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आईं थीं,
युद्ध-क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर, पीछे ह्यूरोज आ गया हाय! घिरी अब रानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार।काटकर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था यह संकट विषम अपार।
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर-गति पानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी।
अभी उम्र थी कुल तेईस की, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी।
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी।
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू होगी तू खुद अमिट निशानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

♥ सुभद्रा कुमारी चौहान ♥

28 comments:

musafir said...

हमने ये कविता चौथी पाचवी मे पढी थी आज यहाँ
पढ़ कर अछ्छा लगा.

वन्दना said...

ये कविता हमेशा नयी महसूस होती है और वैसी ही ऊर्जा प्रदान करती है आज भी।
महारानी लक्ष्मीबाई को हमारा शत शत नमन्।

Babli said...

बलिदान दिवस पर बेहतरीन प्रस्तुती! ये कविता बार बार पढने में अच्छा लगता है! रानी लक्ष्मीबाई को मेरा शत शत नमन!

Patali-The-Village said...

महारानी लक्ष्मीबाई को हमारा शत शत नमन्।

डॉ टी एस दराल said...

सालों बाद पूरी कविता पढ़ाने के लिए आपका आभार शास्त्री जी ।
पूरी गाथा है लक्ष्मी बाई की ।
पढ़कर जोश सा आ जाता है । झाँसी की रानी अमर रहे ।

Vaanbhatt said...

सुभद्रा कुमारी चौहान की इस अमर रचना ने रानी लक्ष्मी बाई के बलिदान को जीवंत कर दिया था...बचपन से अब तक जब भी इस कृति को पढ़ने का मौका मिलता है...रोंगटे खड़े हो जाते हैं...

शालिनी कौशिक said...

ek bar fir aapne josh bhar diya.aabhar.

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

जब भी पढो यह ओजपूर्ण कविता मन को छू जाती है.......रानी लक्ष्मीबाई को मेरा शत शत नमन!

संध्या शर्मा said...

महारानी लक्ष्मीबाई को हमारा शत शत नमन... कविता आज भी याद है पूरी की पूरी... अमर रचना......... आभार

kshama said...

Zabardast rachana hai ye!

चैतन्य शर्मा said...

वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई को नमन्...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति ... अपने समय में पढ़ी भी थी और शिक्षिका के रूप में पढाई भी थी

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

महारानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस पर राष्ट्रीय स्वर की कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान की इस अमर और ओजपूर्ण रचना को प्रस्तुत कर आपने स्तुत्य कार्य किया है |

झाँसी की रानी, मर्दानी का कोटि-कोटि वंदन ..

सुभद्रा जी की लेखनी को शत-शत नमन ..

mahendra srivastava said...

बहुत सुंदर

सुमित प्रताप सिंह said...

झांसी की रानी की लाश को देख कर ह्यूरोज़ ने कहा था कि १८५७ के वीर सेनानियों में इकलौती मर्द रानी लक्ष्मी बाई ही थी. आज उनके बलिदान दिवस पर उनको शत-शत नमन और प्रणाम सुभद्रा कुमारी चौहान को जिन्होंने इस कालजयी रचना का निर्माण किया...

Vivek Jain said...

शास्त्री जी, आपका बहुत बहुत आभार- विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

very nice composition....JHANSI ki rani ki jai ho...

Dilbag Virk said...

kaljayi rachna punah pdhvaane ke lie dhnyvad

veerubhai said...

शुक्रिया आपका !इस कविता का काफी बड़ा हिस्सा हमें भी कंठस्थ है जो बचपन में अन्ताक्षरी प्रतियोगिता में गाया है बच्चन जी की मधुशाला के संग ,लहर और आंसू के संग .याद दिलादिया आपने वह रचनातमक परिवेश (१९६० के दशक का ).आभार .

कमलेश भट्ट said...

vki ds }kjk ;g ,d og iz;k'k gS ftl ls ;qokvks dks ,d izjs.kk feyrh gS 'kqdjh;k vki izjs.kk ds JkSrz gSgekjs

Khare A said...

ek nayab rachna "Subhudra ji ki" kuch part padha tha 6-7th me shayd, aaj puri padhi! aankeh nam ho aayi!

BrijmohanShrivastava said...

शायद चौथे या पांचवें क्लास में पढी होगी। वह भी पूरी नहीं थी बहुत सा हिस्सा काट कर कोर्ष में रखी थी कविता यहां पूरी कविता पढने को मिली । धन्यवाद

Udan Tashtari said...

अच्छा लगा एक लम्बे अंतराल के बाद इस रचना को पढकर. आभार.

Sriprakash Dimri said...

शास्त्री जी .. ..चौहान जी की कालजयी महानायिका रानी लक्ष्मी बाई के सर्वोच्च बलिदान एवं वीरता को अभिव्यक्त करती ओजस्वी रचना को पढवाने के लिए कोटि कोटि अभिनन्दन
http://spdimri.blogspot.com/

Mrs. Asha Joglekar said...

Subhadra kumari chuhan jee kee ye kawita wastw me kal jayee hai .Ise padhwane ka anek dhnyawad

BrijmohanShrivastava said...

चुरा नहीं रहा अनुमति लेना चाहता हूं सुभद्रा कुमारी चौहान कवियत्री का फोटो कापी करलूं क्या ?

JHAROKHA said...

aadarniy sir
rani laxhmi -bai to ek nayab heera hi ban kar aai thin .
aur ek ran-chandi ban kar angrejon ke housale bhi past kiye .
waqai me unki kurbaani vyarth nahi gai .
aaj bhi ham sabhi ke dilon me kaviyitri subhadra kumaari chouhan ji ki kavita vaas karti hai.
aaj bhi ham bachchon ko jab fancy -dress me part dilwate hain to rani laxhmi -bai hi banana pasand karte hain.
un virangana ko shat -shat naman
bahut hi behtreen prastuti.
bar bar padhne ko man karta hai
hardik badhai
v sadar naman
poonam

रेखा said...

वीर रस से भरी कविता , बचपन में पढ़ी थी. आज भी जोश भर देती है.