समर्थक

Monday, 1 August 2011

“मेरी पन्तनगर यात्रा” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मेरी एक दिन की पन्तनगर यात्रा
बहुत दिन हो गये थे घर में पड़े-पड़े!
रोज़मर्रा का वही काम। सुबह ठना कम्प्यूटर खोलना, मेल चेक करना और ब्लॉगिंग करना। 
इस काम से अब खीझ होने लगी थी! इसलिए सोचा कि कहीं पर घूम आया जाए। 
तभी अपने शिष्य सुरेश राजपूत का फोन आ गया कि गुरू जी मेरे पास आ जाइए ! 
मेरा भी मन था कहीं घूमने जाने का। 
तब मैंने 30 जुलाई को अपराह 3 बजे कार निकाल ही ली 
और चल पड़ा पन्त नगर की यात्रा के लिए।
रास्ते में किच्छा का रेलवे क्रॉसिंग पड़ा वह बन्द था इस लिए मुझे रुकना पड़ा।
KICHCHHA
सोचा कि कैंमरे से कुछ फोटो ही खींच लिए जाएँ।
IMG_1206
तभी मीटर गेज की रेलगाड़ी किच्छा की ओर से आती हुई दिखाई पड़ी!
उसके बाद मैं पन्तनगर पहुँच गया!
सीधे सुरेश जी के घर पहुँचा और पेटभर कर चाय नाश्ता किया!
IMG_3999

यह है सुरेश राजपूत का घर। 
दोमंजिले पर रहते हैं वो अपनी माता जी के साथ।
IMG_4147
सुरेश जी के घर के बाहर अमरूद के पेड़ लगे हैं।
IMG_4146

जिन पर अमरूद के फल लगे थे!
IMG_4145
खाली जगह में भिण्डी के पौधे भी लगाए हुए हैं।
IMG_4144
इन पर भिण्डी के फूल और कलियाँ भी दिखाई दे रहीं थीं।
IMG_4143

घर के बाहर रोड के किनारे नीम का एक पेड़ भी मुझे दिखाई दिया।
IMG_4151
जिसके नीचे ही मैंने अपनी कार खड़ी की थी।
नीम के पेड़ पर निम्बौरियाँ लदी हुई थीं और वो पर कर नीचे टपक रहीं थी।
IMG_4153
इसके बाद हम लोग पन्तनगर के अन्तरराष्ट्रीय अतिथि गृह में गये। 
सुरेश जी ने मेरे रात्रि विश्राम का प्रबन्ध यहाँ ही किया था।
IMG_4140
गेस्ट हाउस के बाहर का नजारा बहुत मनमोहक था।
IMG_4139
चारों ओर हरियाली ही हरियाली पसरी थी
IMG_4138
मैदान में चीड़ का यह विशालकाय वृक्ष 
उत्तराखण्ड के पहाड़ी राज्य का आभास करा रहा था !
सुरेश जी ने अपनी फोटो भी इसी चीड़ के पेड़ के नीचे खिंचवाई।
IMG_4142
इसके बाद मेरी भी फोटो सुरेश जी ने खींच ही ली!
IMG_4141
सुरेश राजपूत जी ने अपने घर की सीढ़ियों के साथ 
दीवार में गणेश जी की बहुत सारी पेंटिग अपने हाथों से बनाईं हैं।
IMG_3987
IMG_3992
IMG_3989
यहाँ आने और जाने पर मैं गणेश जी को प्रणाम करना न भूला!
इस प्रकार से मेरी एक दिन की पन्तनगर विश्वविद्यालय की यात्रा सम्पन्न हुई!

Thursday, 21 July 2011

"खटीमा मॉर्निंग में साहित्यिक गोष्ठी की धूम!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

खटीमा मॉर्निंग में साहित्यिक गोष्ठी की धूम!
अब यह 1 मिनट का वीडिओ देखिए!
साहित्य शारदा मंच खटीमा के बैनर तले एक कविगोष्ठी का आयोजन किया गया!
साधना न्यूज चैनल द्वारा इसकी कवरेज दिखाई गयी!
आयोजक-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"

खटीमा (उत्तराखण्ड) में वर्षा ऋतु के स्वागत में
सावन के प्रथम दिन राष्ट्रीय वैदिक विद्यालय में
एक कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया!
गोष्ठी का शुभारम्भ और अतिथियों का स्वागत किया गया!
गोष्ठी की अध्यक्षता रामनगर नैनीताल के पधारे
शायर सगीर अशरफ ने की,
मुख्यअतिथि- कवि एवं साहित्यकार अशोक् कुमार भट्ट
(अ.पुलिस अधीक्षक-ऊधमसिंहनगर) तथा
विशिष्ट अतिथि- मा. पुष्कर सिंह धामी
(राज्यमन्त्री-उत्तराखण्ड सरकार) थे।
जिसका संचालन कवि देवदत्त प्रसून" किया!
इसके पश्चात अतिथियों के द्वारा
माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण
एवं दीप प्रज्वलन किया गया।
गोष्ठी का शुभारम्भ देवदत्त प्रसून की सरस्वती वन्दना से हुआ।
खटीमा राजकीय महाविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष
डॉ. सिद्धेश्वर सिंह ने अपना काव्य पाठ किया-
आइए इक ख़त लिखें हम जिन्दगी के नाम।
उम्र की ना-आशना आवारगी के नाम।।"
तत्पश्चात राजकीय इंटर कॉलेज में हिन्दी के प्राध्यापक
डॉ. गंगाधर राय ने राजनीतिक परिपेक्ष्य में चुटकी लेते हुए कहा-
सत्ता की कुर्सी पर बैठकर तुमने
लिया है मामा कंस का अवतार।
इसलिए प्रजातन्त्र को
कर दिया है तुमने तार-तार।।
राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत सरस पायस के सम्पादक
ने अपने काव्य पाठ में नवगीत का स्स्वर पाठ किया।
हास्य व्यंग्य के कवि गेंदालाल शर्मा निर्जन ने कहा-
सारे देश में घूम के देखो बेईमानों का ढेर है,
कर्णधार जो देश के वो चिकनी मिट्टी के शेर हैं।
प्रवीण सिंह प्रजापति ने ने भी हास्य का शमा बाँधते हुए कहा-
मैं दीवानी ढूँढता हूँ, मैं दीवाना हूँ,
मैं दीवानी ढूँढती हूँ, मैं दीवानी हूँ,...
--
पीलीभीत से पधारे गजलकार राम किशोर शर्मा ने कहा-
आ स्वयं दिवाकर सन्धि करे,
कल का फिर प्रातनहीं होगा.....
पीलीभीत से ही पधारे ओज के कवि पुष्पेन्द्र शर्मा दीप ने कहा-
हर दफा ये कमाल होता है,
सबके दिल को मलाल होता है....
पीलीभीत के सिद्धकवि जीतेश राज ने
अपनी ग़ज़ल पेश करते हुए कहा-
जरा मुट्ठी में सारा जहान भरते हैं!
ये मन के पंछी भी कैसी उड़ान भरते है....
खटीमा के प्रख्यात चिकित्सक डॉ. चन्द्र शेखर जोशी ने कहा-
मेरे बगल के खेत में एक मकान उग आया है,
पड़ोसी का कबूतर फिर, नमकीन-बिस्कुट चुग आया है....
किच्छा से पधारे शायर नबी अहमद मंसूरी ने कहा-
नियामत है ये खुदा की
कहीं बारिश कही कहर है....
रूमानियत के शायर
गुरू सहाय भटनागर बदनाम ने कहा
देश पर फिदा जानो तन कर गये,
जान देकर भी रौशन यहाँ कर गये
सितारगंज से पधारे शायर यूनुस मलिक ने कहा-
तिफ्ल जो मुफलिसी में पलते हैं,
वो खिलौनों को कब मसलते हैं....
लालकुँआ नैनीताल से पधारीं
शैलसूत्र पत्रिका की सम्पादिका श्रीमती आशा शैली ने कहा-
बस परिन्दों की तरह नजर आते हैं लोग
जिन्दगी की राह मैं ऐसे भी मिल जाते हैं लोग...
युवा कवि कमलेश भट्ट ने कहा-
कल हम न होंगें तो क्या हमें याद करोंगे,
अगर याद करोगे ते हमें पास कहाँ पाओगे?....
संचालक देवदत्त प्रसून ने कहा-
बात हमारी तुमको अच्छी नहीं लगी
सच्ची थी लेकिन वो तुमको अच्छी नहीं लगी....
गोष्ठी के आयोजक डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा-
बड़ी हसरत दिलों में थी गगन में छा गये बादल!
हमारे गाँव में भी आज चलकर आ गये बादल!!
मुख्य अतिथि कवि एवं साहित्यकार अशोक् कुमार भट्ट ने कहा-
सफलताओं ने दिये मुझे सिर्फ ठहराव।
रही घाट में बँधी वह कैसी नाव…”
इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि मा. पुष्कर सिंह धामी
(राज्यमन्त्री-उत्तराखण्ड सरकार) ने अपने उद्बोधन में कहा
कि यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे आज
खटीमा और सुदूर स्थानों से पधारे कवियों की
रचनाओं का रसास्वादन करने का अवसर मिला।
इस अवसर पर उन्होंने अपने छात्र जीवन में लिखी
रचना का पाठ करते हुए कहा-
स्वतन्त्रता के प्रेमी की अम्बर के आगे सीमा है,
उसकी क्षमता के आगे तूफान बहुत ही धीमा है!
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे शायर सगीर अशरफ ने कहा-
जो बच्चे कूड़े में रोज़ी तलाश करते हैं,
मैं उनमें कोई सिकन्दर तलाश करता हूँ!
अन्त में-
मुख्यअतिथि कवि एवं साहित्यकार अशोक् कुमार भट्ट
(अ.पुलिस अधीक्षक-ऊधमसिंहनगर) को
साहित्य शारदा मंच के अध्यक्ष डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने
संस्था के सर्वोच्च सम्मान साहित्य श्री से अलंकृत किया,
जिसे विशिष्ट अतिथि मा. पुष्कर सिंह धामी
(राज्यमन्त्री-उत्तराखण्ड सरकार) के
कर कमलों से प्रदान किया गया!
आभार दर्शन करते हुए आयोजक डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने
सभी को हरेला और शब्बेबारात की शुभकामनाएँ भी प्रेषित कीं!

Wednesday, 29 June 2011

“दुनिया का सबसे कुशल वास्तुविद” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

बया
दुनिया का सबसे कुशल वास्तुविद
बात बहुत पुरानी है। उन दिनों में कक्षा 9 में नजीबाबाद में पढ़ता था। वहाँ से 4-5 किमी दूर मेरे मौसा जी का गाँव अकबरपुर-चौगाँवा था। मेरे मौसा श्री जयराम सिंह अधिक पढ़े-लिखे तो नहीं थे मगर तार्किक बहुत थे। मुझे वो बहुत पसंद करते थे क्योंकि मैं उनके साथ खेती-बाड़ी के काम में उनका हाथ भी बँटा देता था।
जब भी मैं उनके गाँव में जाया करता था तो रास्ते में रेतीला बंजर और खजूर के पेड़ों का जंगल पार करना पड़ता था जिसके 500 मीटर बाद मौसा जी का गाँव बसा हुआ था। इन खजूर के पेड़ों पर बया के बहुत सारे घोंसले लटके होते थे। जिन पर बया चिड़ियाएँ कलरव करती हुई मुझे बहुत अच्छी लगती थीं।
आज उनके बारे में पाठकों को कुछ बताना चाहता हूँ।
बया गौरय्या जैसी ही एक चिड़िया होती है। जिसको जुलाहा पक्षी भी कहा जाता है। क्योंकि यह दुनिया का सबसे कुशल शिल्पी होता है।
बहुत से लोग शायद यह नहीं जानते होंगे कि बया हर मौसम में उसके अनुकूल अपना घोंसला बनाता है। 
बात शुरू करते हैं गर्मियों से। तो यह गर्मियों में अपना घर बहुत हवादार बनाता है। जिसमें कि प्राकृतिक हवा आती-जाती रहे।
जैसे ही इसे बरसात के आगमन का आभास होता है यह बरसात के अनुकूल घोसला बनाने में जुट जाता है। बारिश से बचने के लिए यह विशेष प्रकार का घर बुनता है जो उलटी सुराहीनुमा होता है। अर्थात यह इस घोंसले में आने-जाने के लिए नीचे की ओर द्वार रखता है।
जैसे ही बारिश का मौसम समाप्त होता है तो उस समय यह जाड़ें की ऋतु के अनुकूल अपना घोंसला बुनने लगता है। इसकी बनानट ऐसी होती है कि इसमें शीत की हवाएँ घोंसले के भीतर नहीं जा सकती हैं।
एक बार मैं बरसात के मौसम में मौसा जी के गाँव गया तो शाम को चौपाल पर बया के बारे में चर्चा चल पड़ी। मौसा जी ने बताया कि बया के तुरही नुमा घर में रौशनी का भी इन्तजाम रहता है। इस पर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ।
मैंने मौसा जी से पूछा मौसा जी बया के घोसलें में रौशनी कैसे होती है?
मौसा जी ने बताया कि बया अपनी चोंच में गीली मिट्टी ले जाकर उसको अपने घोंसले की दीवारों में चिपका आता है और शाम होते ही जुगनुओं (खद्योतों) को अपनी चोंच में पकड़कर घोंसले के भीतर ले जाता है और उनको गीली मिट्टी में इस प्रकार लगा देता है कि उसका मुँह मिट्टी में धँस जाए और उसका पीछे का हिस्सा जो प्रकाशित होकर टिमटिमाता है वह बाहर की ओर रहे। इस प्रकार बया का अंधेरा घोंसला प्रकाशमान होता रहता है।
मुझे मौसा जी बात पर सहज ही विश्वास न हुआ तो उन्होंने एवरेडी की 3 सेल वाली टॉर्च साथ ली और मुझे खजूरियों के वृक्षों के जंगल की ओर ले गये। इस चमत्कारी बात की सत्यता को जानने के लिए गाँव के कुछ और लोग भी हमारे चल पड़े।
जंगल में पहुँच कर मौसा जी ने टॉर्च बन्द कर दी और कहा कि इन लटकते हुए घोंसलों में झाँक कर देखो।
यब मैंने 2-4 घोंसलों के नीचे जाकर झाँककर देखा तो उनमें से टिम-टिम करता हुआ प्रकाश आलोकित होता हुआ नज़र आया।
अब तो आप समझ ही गये होंगे कि बया दुनिया का सबसे बड़ा भवनइंजीनियर और वास्तुविद् होता है।

Friday, 17 June 2011

‘‘18 जून-बलिदान-दिवस पर विशेष’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

अमर वीरांगना झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई के

बलिदान-दिवस पर उन्हें अपनी श्रद्धांजलि समर्पित करते हुए
श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान की
यह पूरी अमर कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ।
-0-0-
सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटि तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी।
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम पिता की वह संतान अकेली थी।
नाना के संग पढ़ती थी वह नाना के संग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाली की गाथाएँ उसको याद जबानी थीं।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता का अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार।
नकली युद्ध व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्ट्र कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में।
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुभट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में।
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छाई,
किन्तु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई।
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं,
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निःसंतान मरे राजा जी रानी शोक-समानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया।
फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फिरंगी की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया।
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया,
राजाओं नब्वाबों के भी उसने पैरों को ठुकराया।
रानी दासी बनी यह दासी अब महारानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों-बात.
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात।
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात,
जबकि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र निपात।
बंगाले-मद्रास आदि की भी तो यही कहानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोई रनिवासों में, बेगम गम से थी बेजार,
उनके गहने।कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार।
सरेआम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार,
नागपूर के जेवर ले लो, लखनऊ के लो नौलख हार।
यों परदे की इज्जत पर। देशी के हाथ बिकानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटिया में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान।
नाना धुंधुंपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रणचंडी का कर दिया प्रकट आह्वान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरमन से आई थी।
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं,
मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी।
जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

नाना, धुंधुंपंत, ताँतिया, चतुर अजीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम।
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम,
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़ चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में।
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में।
जख्मी होकर वाकर भागा उसे अजब हैरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थककर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार।
यमुना-तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी,
अब के जनरल स्मिथ सन्मुख था, उसने मुँह की खाई थी।
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आईं थीं,
युद्ध-क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर, पीछे ह्यूरोज आ गया हाय! घिरी अब रानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार।काटकर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था यह संकट विषम अपार।
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर-गति पानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी।
अभी उम्र थी कुल तेईस की, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी।
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी।
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू होगी तू खुद अमिट निशानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

♥ सुभद्रा कुमारी चौहान ♥