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Friday, 23 October 2009

"अन्तिम संस्कार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

"भस्मान्तम् शरीरम्"

वेद में कहा है-"भस्मान्तम् शरीरम् !" 
अर्थात् शरीर के भस्म हो जाने के पश्चात कोई भी क्रिया शेष नही रहती है।
मेरे मामा जी कट्टर आर्य-समाजी थे। कुछ दिनों से उनका स्वास्थ्य बहुत खराब चल रहा था। एक दिन मैं उनसे मिलने के लिए बरेली गया। घर की कुशल-क्षेम जानने के बाद उन्होंने मुझसे कहा- 
"बेटा ! मेरा घर अब रहने योग्य नही रहा है। शरीर जर्जर हो गया है। पता नही कब प्राण निकल जायें।"
मैंने कहा- "मामा जी ! आप अच्छे हो जायेंगे। ऐसी बातें क्यों कहते हो?"
वो कहने लगे- "देखो ! मैं तुम पर बहुत भरोसा करता हूँ। मैं अपने पास अपने अन्तिम क्रिया-कर्म के लिए 4-5 हजार रुपया हमेशा बण्डी की अन्दर वाली जेब में रखता हूँ। तुम आर्य-समाजी हो। इसलिए तुम्हें यह बात बता रहा हूँ।"
मैंने कहा- "मामा जी ! मुझे इस पैसे का क्या करना होगा?"
वो बोले- "मेरे मरने के बाद तुम इस पैसे को निकाल लेना और मेरे क्रिया-कर्म में इस सारे पैसे को खर्च कर देना। इससे 20 किलो हवन सामग्री, 11 किलो देशी घी लेना और लकड़ियाँ 5 कुन्टल से कम मत लेना। पूर्ण वैदिक-रीति से वेद-मन्त्रों के पाठ के साथ मेरा अन्तिम संस्कार करवाना।"
मामा जी का एक ही पुत्र है, जो बरेली में पशु-चिकित्साधिकारी है।
मामा जी ने आगे कहना प्रारम्भ किया- "इस पैसे को तुम मेरे पुत्र के हाथ में मत देना। क्योंकि वो लोगों की बातों में आकर कंजूसी कर सकता है।"
इस घटना के दस दिन बाद मामा जी का देहावसान हो गया।
उनके पुत्र डॉ.इन्द्रदेव माहर ने मुझे फोन किया। मैं 2 घण्टे के भीतर ही खटीमा से बरेली पहुँच गया। 
बरेली के एक आर्य समाजी श्री रामस्वरूप स्नातक जी भी तब तक वहाँ पहुँच गये थे।
जब मामा जी की बण्डी की जेब देखी तो उसमें चार हजार आठ सौ कुछ रुपये निकले।
उन्ही के पैसों से उनकी इच्छा के अनुसार सामान खरीद कर उनकाअन्तिम संस्कार पूरे विधि-विधान से किया गया। वेद मन्त्रों से लगभग 200 आहुतियाँ घी और सामग्री की दी गयीं।
श्मशान की वेदी पर जब उनका अन्तिम संस्कार किया जा रहा था तो एक और शव का क्रिया-कर्म कर रहे लोग बड़े कौतूहल से देख रहे थे। बाद में इन लोगों ने प्रश्न किया कि इतना घी सामग्री लगाने की और इतना खर्च करने की क्या जरूरत थी?
मैं तो कुछ बोला नही परन्तु स्नातक जी ने कहा कि आप लोगों का हमसे ज्यादा खर्चा हो जायेगा।
ये लोग बोले- "कैसे?"
स्नातक जी ने कहा- "अस्थियाँ लेकर आप लोग कहाँ जाओगे?"
इन्होंने कहा- "हरिद्वार और सोंरो।"
स्नातक जी ने कहा- "इसमें कितना खर्च होगा?"
इन्होंने कहा- "लगभग 8-10 हजार।"
स्नातक जी ने कहा- " लेकिन हमारा तो केवल 6-7 हजार ही कुल खर्च होगा।"
ये लोग बोले- "कैसे?"
स्नातक जी ने कहा- "हम लोग 3 दिनों तक गृह-शुद्धि के लिए प्रातः-सायं यज्ञ करेंगे। तीसरे दिन अस्थियाँ चुन कर पास की नदी में विसर्जित करेंगे, उसके बाद कुछ नही।"
स्नातक जी ने आगे कहा- "वेद कहता है- "भस्मान्तम् शरीरम्" अर्थात् शरीर के भस्म हो जाने के बाद कुछ भी क्रिया शेष नही रहती। जब शरीर पञ्च तत्वों में विलीन हो गया तो किसके लिए यह सब ढोंग-ढकोसला?"
स्नातक जी की बात का उन पर इतना प्रभाव हुआ कि उन्होंने भी अपने ताऊ जी की बाद की सारी क्रियाओं को यज्ञ के साथ ही वैदिक रीति से सम्पन्न कराया।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

15 comments:

  1. jee........bahut achcha laga padh kar......

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  2. kaash aryasamaj desh ko jagane mein aur sakriya bhoomika nibha paye,isi asha ke saath
    aap ka
    dr.minocha

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  3. प्रभावी विचार.

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  4. यही सत्य है..एकदम सच प्रस्तुत किया आपने..

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  5. शास्त्री जी सबकी अपनीअपनी विधी विधान

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  6. Bade hee tarkik tareeqe se aapne apnee baat kahee hai..!

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  7. "भस्मान्तम् शरीरम्" अर्थात् शरीर के भस्म हो जाने के बाद कुछ भी क्रिया शेष नही रहती। जब शरीर पञ्च तत्वों में विलीन हो गया तो किसके लिए यह सब ढोंग-ढकोसला?"
    तो फिर "हम लोग 3 दिनों तक गृह-शुद्धि के लिए प्रातः-सायं यज्ञ करेंगे। उसके बाद कुछ नही।" यह भी तीन दिन तक क्यों???

    अपने- अपने विचार, अपनी अपनी भावनाएं.....
    आरती बुद्धि कुछ कहती है, धार्मिक बुद्धि कुछ कहती है, अनजान को जो समझाया जाय, ऐसे मौके पर उससे जो कराया जाये, विना प्रतिवाद किये सब कर देता है, शायद माहौल के कारण या फिर लोग क्या कहेगें.............ता ज़िन्दगी उसे....इस डर से....

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

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  8. चन्द्र मोहन गुप्त जी!
    आपकी बात सही है। मन, मस्तक, शरीर, देश, वेश और परिवेश इनकी शुद्दि के लिए यज्ञ तो प्रतिदिन करना ही चाहिए।

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  9. सही है अपने अंतिम संस्कार के लिये पूर इंतजाम करके जाना पड़ेगा ऐसे तो हम बहुत ऐश से रहते हैं परंतु शरीर छोड़ने के समय सारी कंजूसी की हदें पार कर देते हैं। धन्यवाद वक्त रहते चेताने का।

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  10. LEKH BAHUT HI BADHIYA LIKHA HAI

    MERE KHYAL SE TO JAB YE SHARIR PANCHTATV MEIN VILEEN HO GAYA TO USKE BAAD KOI KRIYA SHESH NHI BACHTI KYUNKI PANCHTATVA SE HI YE SHARIR BANA HAI AUR HAR TATVA APNE TATVA MEIN MIL GAYA TO USKE BAAD KISKI SHANTI AUR KISKI MUKTI KE LIYE KUCH BHI KARNA........AATMA AUR SHARIR DO ALAG CHEESE HAIN JAB AATMA NIKAL GAYA TO SHARIR KA KUCH BHI HO ,KYA FARK PADTA HAI CHAHE KOI ISE JALA DE YA DAFNA DE ,KOI FARK NHI PADTA.
    AUR AATMA WO TO MUKT HAI HI HAMESHA TO USKE LIYE KUCH KARNA NA KARNA YE SIRF AAM LOGON KE MAN KA VAHAM HAI........AATMA PARMATMA KA ANSH HAI JO USSE JA MILTA HAI PHIR USKE LIYE KUCH KARNA SHESH NHI RAHATA.
    DOOSRI BAAT AGAR KOI APNI BHAVNAON KE VASHIBHOOT KUCH KARNA BHI CHATA HAI TO KISI GARIB YA JAROORATMAND KE LIYE KUCH KARE TO KAM SE KAM UN LOGON KA TO BHALA HO JAYEGA AUR KARNE WALE KE MAN KO SHANTI PRAPT HO JAYEGI KI CHALO IS BAHANE EK NEK KAAM TO KIYA.
    BAKI IS TARAH KE KARAMKAND KARNE SE KOI FAYADA NHI KI 13 DIN TAK YE KARO YA WO.
    JISE JAHAN JANA THA WO JA CHUKA USKE BAAD JO KARO TO AISA KARO JISSE KHUD KI AATMA KO SHANTI MILE.

    YE MERE KHYAAL HAIN .......KRIPAYA BURA MAT MANIYEGA.

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  11. आदमी को जीते जी कर्म अच्छे करने चाहिए, बाकी तो प्रभु की इच्छा है.

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  12. kयदि सभी लोग अस्थियों को श्मशान पर ही छोड़ दें तो शायद अव्यव्स्था हो जाय। अस्थियों को नदी में बहाने से श्मशान साफ़-सुथरा रहेगा ना?

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  13. हमारे श्रद्धा-सुमन अर्पित हैं!

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  14. ...Gudh baten, par kuchh chijon par kisi ka vash nahin hota.

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  15. अनुकरणीय.............. साधुवाद.

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