ब्लॉग जगत में श्रीमती वन्दना गुप्ता मेरी एक अच्छी मित्र हैं। उन्होंने अपने ब्लॉग पर
‘‘कुछ अनुत्तरित प्रश्न’’ पोस्ट प्रकाशित की। जिसे पढ़कर मेरे मन में उनके प्रति सम्वेदना का भाव जाग्रत हुआ और मैंने अपनी टिप्पणी में लिखा-
‘‘वन्दना जी!आपने तो जीवन का वो पृष्ठ खोल कर सामने रख दिया। जिसे हर व्यक्ति छिपाता रहता है। आपका साहस काबिले-तारीफ है। समय की प्रतीक्षा करो, सब ठीक हो जायेगा।’’
वन्दना जी के ब्लाग पर माडरेशन सक्षम है, लेकिन उनकी महानता देखिए कि उन्होंने मेरी टिप्पणी को प्रकाशित कर दिया।
थोड़ी देर बाद उनका मेल मुझे प्राप्त हुआ जिसमें लिखा था-
‘‘शास्त्री जी! ये सब मेरे साथ नही हुआ है। सिर्फ लिखा है- आज के हालात पर, जो अधिकांश के साथ घट चुका है।’’
उनकी इस पोस्ट ने कुछ ऐसे प्रश्न उछाल दिये हैं। जिन पर हमें गम्भीरता से सोचने की आवश्यकता है। वो प्रश्न निम्न हैं-
‘‘क्या आज मैं घर के कोने में पड़ी एक अवांछित वस्तु से ज्यादा नही ?
क्या अब मुझे इस सत्य को स्वीकारना होगा?
क्या मुझे अब जिन्दगी को गुजारने के लिए एक नए सिरे से सोचना होगा?
क्या कभी मेरा भी कोई अस्तित्व होगा ?
न जाने कितने अनुत्तरित प्रश्न मुखर हो उठे हैं ।
शायद अब उम्र के इस पड़ाव पर इन प्रश्नों का उत्तर खोजना होगा।’’
ऐसी घटनाएँ रोजमर्रा की जिन्दगी में अक्सर घटती ही रहती है, परन्तु हमारी मानवीय सम्वेदनाएँ इतनी शून्य हो गयी है कि हमारा ध्यान उन पर जाता ही नही है।
प्रसंगवश् मुझे एक कथानक याद आ रहा है।
‘‘एक कलयुगी पुत्र अपने बूढ़े पिता से मुक्ति पाना चाहता था। इसके लिए उसने एक युक्ति निकाली कि क्यों न पिता को जंगल में छोड़ दिया जाये। अतः वह अपने पिता को जंगल में ले जाने लगा। साथ में उसका 12 वर्ष का पुत्र भी था। जो इस बात को लेकर बड़ा दुखी था। इसलिए उस बालक ने अपने हाथ में एक पेन्ट का डिब्बा ले लिया और ब्रुश से पेड़ो पर निशान लगाता हुआ साथ-साथ चलने लगा।
अचानक बालक के पिता ने जब उससे पूछा कि बेटा यह कया कर रहे हो।
पुत्र ने उत्तर दिया-‘‘पापा जी! कुद दिनों के बाद आप जब बूढ़े हो जायेंगे तो आपको भी तो जंगल में छोड़ने के लिए इसी रास्ते से आना होगा। मैं कहीं रास्ता न भूल जाँऊ। इसीलिए पेड़ों पर निशान लगाता जा रहा हूँ।"
इतना सुनते ही कलयुगी पुत्र की अक्ल ठिकाने पर आ गयी और वह अपने बूढ़े पिता को वापिस घर ले आया।
कहने का तात्पर्य यह है कि जो व्यवहार हम अपने घर के बड़े-बूढ़ों के प्रति कर रहे हैं उसको हमारी आने वाली पीढ़ी भी संस्कार के रूप में हमसे सीख रही है। इसलिए हम कोई भी ऐसा काम न करें जो कि आने वाले कल में हम पर ही भारी न पड़ जाये।