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Thursday, 10 June 2010

“भय का भूत” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

यह घटना मेरे बचपन की है। मेरी आयु उस समय 13-14 वर्ष की रही होगी। मेरा बचपन नजीबाबाद, उ0प्र0 मे बीता, वहीं पला व बड़ा हुआ ।
पास ही में एक गाँव अकबरपुर-चौगाँवा है, वहाँ मेरे मौसा जी एक मध्यमवर्ग के किसान थे । मैं अक्सर छुट्टियों में वहाँ चला जाता था । खेती किसानी में मुझे रुचि थी इसीलिए मौसा जी भी मुझको पसन्द करते थे ।
नवम्बर का महीना था। मैं और मौसा जी खेत में पानी लगाने के लिए चले गये। पानी लगाते हुए कुछ रात सी हो गयी थी । मौसा जी का खेत सड़क के किनारे पड़ता था, खेत में एक पीपल का पुराना पेड़ भी था । मैने मिट्टी तेल की लालटेन जला ली और पीपल के पेड़ में टाँग दी । उस समय नजीबाबाद में कोई भी अदालत नही थी । अतः लोग बिजनौर रेलगाड़ी से अदालत के काम से जाया करते थे । उस दिन रेलगाड़ी भी कुछ लेट हो गयी थी । अतः लोगों को गाँव लौटते हुए रात के लगभग 10 बज गये थे ।
अगले दिन मैं और मौसा जी मुखिया की चौपाल पर बैठे थे । तभी गाँव के कुंछ लोगों ने अपनी व्यथा सुनानी शुरू कर दी ।
कहने लगे- रात को हमने पीपल के पेड़ में भूतों की लालटेन जलती देखी थी , खेत में उनके चलने की आवाज भी आ रही थी । हम लोगों ने जब यह नजारा देखा तो भाग खडे हुए और चार मील का रास्ता तय कर दूसरे रास्ते से 11 बजे घर पहुँचे ।
अब तो मेरा हँसते-हँसते बुरा हाल था । मौसा जी भी खूब रस ले-ले कर बात को सुन रहे थे ।


किसी ने सच ही कहा है कि भय का ही भूत होता है ।
डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’ 
(पूर्व सदस्य-अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग,उत्तराखण्ड सरकार) 
कैम्प-खटीमा, जिला-ऊधमसिंहनगर, पिनकोड- 262 308 
फोन/फैक्सः 05943-250207, मोबाइल- 09368499921

21 comments:

  1. आपकी इस घटना से यह तो सीख मिल ही गयी की भय का भूत ही डराता है....बढ़िया संस्मरण

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  2. बढ़िया संस्मरण शास्त्री जी ।
    इसे पढ़कर अब किसी को कोई संशय नहीं रहेगा कि भूत सिर्फ मन का भय है।

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  3. Haan sach! Ek waqaya, meri Dadi ne sunaya tha..lekin uska ant bada bhayankar hua tha..kabhi likhungi..

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  4. भूत तो भय का ही होता है !!

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  5. aksar aisa hota hai..bahut badhiya sanmarana shastri ji dhanywaad

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  6. हा हा हा हा ....मज़ा आ गया इस संस्मरण में... वाकई में भूत सिर्फ वहम होता है.... पर कहीं अगर सही में कहीं हुआ तो? ही ही ही ही ....

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  7. इस पोस्ट के लिेए साधुवाद

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  8. हमारे अन्‍दर का डर ही भूत बनकर हमें डराता है, बढिया संस्‍समरण है।

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  9. आपने बिल्कुल सही फ़रमाया है! मैं आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ! शानदार और रोचक संस्मरण !

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  10. bahut kaam ki baat kahi aapne.Badhai!!

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  11. हा हा हा…………………बहुत ही मज़ेदार संस्मरण्।

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  12. सुन्दर वैसे भी भूत कुछ नही होता भूत का लबादा ओढ़े भ्रम हमें डराता रहता है

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  14. शुक्रिया शास्त्री जी .
    आपके इतने अलफ़ाज़ ही काफ़ी हैं ,
    आपका चर्चा मंच भी अच्छा लगा और 'मन का भूत' और गंगदत्त कथा भी ;बचपन की कुछ
    स्मृतियाँ ताज़ा हो उठीं ,बाल दिवस पर ज़रूर शेयर करुँगी .

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  15. BAU JEE NAMASTE....
    MERI NANI BHI APNE BACHPAN KI EK KAHANI SUNATI HAIN.....
    HAAN, USME LALTEN NAHIN DIYE HAIN!
    JAI HO!

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  16. भाई जिस अबोध और निर्भयी बचपने में हम पढ़े-लिखे लोग भूत का भय भरते हैं, उनका क्या किया जाये........

    कहानी बढ़िया रही........

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर

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  17. ek sandesh deta sansmaran.........bahut accha lagaa.

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