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Thursday, 17 July 2014
Tuesday, 24 June 2014
"आज से ब्लॉगिंग बन्द" (डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक')
मित्रों।
फेस बुक पर मेरे मित्रों में एक श्री केवलराम भी हैं।
उन्होंने मुझे चैटिंग में आग्रह किया कि उन्होंने एक ब्लॉगसेतु के नाम से एग्रीगेटर बनाया है। अतः आप उसमें अपने ब्लॉग जोड़ दीजिए।
मैेने ब्लॉगसेतु का स्वागत किया और ब्लॉगसेतु में अपने ब्लॉग जोड़ने का प्रयास भी किया। मगर सफल नहीं हो पाया। शायद कुछ तकनीकी खामी थी।
श्री केवलराम जी ने फिर मुझे याद दिलाया तो मैंने अपनी दिक्कत बता दी।
इन्होंने मुझसे मेरा ईमल और उसका पासवर्ड माँगा तो मैंने वो भी दे दिया।
इन्होंने प्रयास करके उस तकनीकी खामी को ठीक किया और मुझे बता दिया कि ब्लॉगसेतु के आपके खाते का पासवर्ड......है।
मैंने चर्चा मंच सहित अपने 5 ब्लॉगों को ब्लॉग सेतु से जोड़ दिया।
ब्लॉगसेतु से अपने 5 ब्लॉग जोड़े हुए मुझे 5 मिनट भी नहीं बीते थे कि इन महोदय ने कहा कि आप ब्लॉग मंच को ब्लॉग सेतु से हटा लीजिए।
मैंने तत्काल अपने पाँचों ब्लॉग ब्लॉगसेतु से हटा लिए।
अतः बात खत्म हो जानी चाहिए थी।
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कुछ दिनों बाद मुझे मेल आयी कि ब्लॉग सेतु में ब्लॉग जोड़िए।
मैंने मेल का उत्तर दिया कि इसके संचालक भेद-भाव रखते हैं इसलिए मैं अपने ब्लॉग ब्लॉग सेतु में जोड़ना नहीं चाहता हूँ।
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बस फिर क्या था श्री केवलराम जी फेसबुक की चैटिंग में शुरू हो गये।
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यदि मुझसे कोई शिकायत थी तो मुझे बाकायदा मेल से सूचना दी जानी चाहिए थी । लेकिन ऐसा न करके इन्होंने फेसबुक चैटिंग में मुझे अप्रत्यक्षरूप से धमकी भी दी।
एक बानगी देखिए इनकी चैटिंग की....
"Kewal Ram
आदरणीय शास्त्री जी
जैसे कि आपसे संवाद हुआ था और आपने यह कहा था कि आप मेल के माध्यम से उत्तर दे देंगे लेकिन आपने अभी तक कोई मेल नहीं किया
जिस तरह से बिना बजह आपने बात को सार्जनिक करने का प्रयास किया है उसका मुझे बहुत खेद है
ब्लॉग सेतु टीम की तरफ से फिर आपको एक बार याद दिला रहा हूँ
कि आप अपनी बात का स्पष्टीकरण साफ़ शब्दों में देने की कृपा करें
कोई गलत फहमी या कोई नाम नहीं दिया जाना चाहिए
क्योँकि गलत फहमी का कोई सवाल नहीं है
सब कुछ on record है
इसलिए आपसे आग्रह है कि आप अपन द्वारा की गयी टिप्पणी के विषय में कल तक स्पष्टीकरण देने की कृपा करें 24/06/2014
7 : 00 AM तक
अन्यथा हमें किसी और विकल्प के लिए बाध्य होना पडेगा
जिसका मुझे भी खेद रहेगा
अपने **"
--
ब्लॉग सेतु के संचालकों में से एक श्री केवलराम जी ने मुझे कानूनी कार्यवाही करने की धमकी देकर इतना बाध्य कर दिया कि मैं ब्लॉगसेतु के संचालकों से माफी माँगूँ।
जिससे मुझे गहरा मानसिक आघात पहुँचा है।
इसलिए मैं ब्लॉगसेतु से क्षमा माँगता हूँ।
साथ ही ब्लॉगिंग भी छोड़ रहा हूँ। क्योंकि ब्लॉग सेतु की यही इच्छा है कि जो ब्लॉगर प्रतिदिन अपना कीमती समय लगाकर हिन्दी ब्लॉगिंग को समृद्ध कर रहा है वो आगे कभी ब्लॉगिंग न करे।
मैंने जीवन में पहला एग्रीगेटर देखा जिसका एक संचालक बचकानी हरकत करता है और फेसबुक पर पहल करके चैटिंग में मुझे हमेशा परेशान करता है।
उसका नाम है श्री केवलराम, हिन्दी ब्लॉगिंग में पी.एचडी.।
इस मानसिक आघात से यदि मुझे कुछ हो जाता है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी ब्लॉगसेतु और इससे जुड़े श्री केवलराम की होगी।
आज से ब्लॉगिंग बन्द।
और इसका श्रेय ब्लॉगसेतु को।
जिसने मुझे अपना कीमती समय और इंटरनेट पर होने वाले भारी भरकम बिल से मुक्ति दिलाने में मेरी मदद की।
धन्यवाद।
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
Saturday, 21 June 2014
"छोटे पुत्र विनीत का जन्मदिन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मित्रों!
आज मेरे छोटे पुत्र का जन्मदिन है।
खाओ आज मिठाई जमकर,
जन्मदिवस है आज तुम्हारा।
महके-चहके जीवन बगिया,
आलोकित हो जीवन सारा।।
बाबा-दादी, पापा-मम्मी,
सब देंगे उपहार आपको।
वर्षगाँठ है आज तुम्हारी,
देंगे अपना प्यार आपको।।

Wednesday, 30 April 2014
"हँसता उपवन मेरी नज़र में" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
Wednesday, 19 February 2014
"वर्चस्व स्वीकार करने से कतरा रहें हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
स्वीकार करने से कतरा रहें हैं सब!
क्या समाचार चैनल? क्या राजनीतिक दल? सभी आप की
लोकप्रियता को देखकर बेचैन हो रहे हैं। परन्तु स्वीकार करने से कतरा रहे हैं।
विचारणीय प्रश्न है कि ऐसा क्यों?
आम आदमी आज आम के साथ जाने का मन बना चुका है।
इसीलिए आप के साथ आम आदमियों का लगाव और जुड़ाव बढ़ गया है। लेकिन कुछ लोग आज भी
लकीर के फकीर बने हुए हैं। स्वतन्त्रता के पश्चात दो बड़े दलों और कई दशकों से
क्षेत्रीय दलों को के दंश को सहते-सहते आम आदमी आज परेशान-निराश और हताश हो चुका
है।
देश के आजाद होने के बाद जन-गण-मन को आशा की एक
किरण दिखाई दी थी कि अपना सुराज होगा, भ्रष्टाचार-रिश्वतखोरी, हत्या और लूट-पाट
से निज़ाद मिलेगी परन्तु ऐसा हो न सका और जनता ठगी हुई यह सब देखती रही।
राजनीतिक दलों में प्रजातन्त्र के स्थान पर परिवारवाद
ने अपनी जड़ें पुख़्ता करलीं। धनबल और बाहुबल से मतदान होने लगा, जिसके कारण साफ-सुथरे
लोग पिछड़ते चले गये और सत्ता पर छँटे हुए लोगों का क़ब्ज़ा होता चला गया। इसीलिए
मँहगाई अपने पाँव पसारती चली गयी। जिनको अर्थशास्त्री की उपाधि से विभूषित किया
था वो वास्तव में अर्थशास्त्री ही निकले और अपने देश में अर्थ का युग साकार
दिया।
ऐसे में उदय हुआ आम आदमी पार्टी (आप) का। जिसने
दिल्ली में विधानसभा का चुनाव पहलीबार लड़ा और यह साबित कर दिया कि आम अगर मैदान
में उतर जाये तो खास की हालत खराब कर देगा। परिणाम इसकी पुष्टि करता है कि
सत्तादल की मुख्यमन्त्री भी अपनी सीट नहीं बचा पायी और जिसे अदना सा आम आदमी
समझा था उससे परास्त हो गयी।
आज भी दलील तो सभी पुराने दिग्गज देने में लगे
हैं। मगर भयभीत हैं आम से। क्योंकि वो स्वयं भी यह जानते हैं कि वो सुधरनेवाले
नहीं हैं। जनता के धन पर शुरू से ही डाका मार कर सड़कछाप आज अरबों की सम्पत्ति
के स्वामी बन बैठे हैं वो भला भविष्य में अपनी आदत को कैसे बदल पायेंगे?
इस सन्दर्भ में मुझे एक संस्मरण याद आ रहा है-
“लगभग 4 साल पुरानी बात है एक सज्जन सरकारी
नौकरी में रहते हुए करोड़ों रुपये अनैतिक रूप से कमाकर सेवानिवृत्ति के पश्चात
अपने नगर में आ गये। थोड़े ही दिन में उन्होंने समाज में अपनी घुसपैठ भी करली और
एक जनकल्याण संस्था का गठन कर लिया। लोगों ने इसमें ज खोलकर अपना आर्थिक सहयोग
दिया। यह देखते ही इन महापुरुष क नीयत बदल गयी और संस्था का सारा धन डकार गये। दस-पाँच
हजार रुपये खर्च करके एक-दो छोटे कार्यक्रम किये और लाखों का फर्जी बिल बना दिया
कर संस्था को दिवालिया कर दिया।
इसके बाद जब देखा कि समाज में छवि खराब हो गयी
है तो इन्होंने जातिवाद को बढ़ावा देकर जातिविशेष की समिति गठित कर ली। लोगों से
जाति के नाम पर दिलखोलकर दान-चन्दा लिया और एक दो बार बिरादरी की दावत करके
लाखों का चन्दा यहाँ से भी हजम कर लिया।"
कहने का तात्पर्य यह है कि जिनके मुँह खून लग
जाता है
वो दाल-रोटी में कैसे सन्तोष कर सकते हैं।
आज छोटे-बड़े तमाम राजनतिज्ञों का यही हाल है।
वाक्पटुता से जनता पर डोरे डाले जा रहे हैं। प्रजा को सब्ज़बाग दिखाये जा रहे
हैं। लेकिन क्या ये अपनी आदत बदल पायेंगे।
ऐसे मैं आम जनता ने आप की झाड़ू को थाम कर
भ्रष्टाचार और रिश्वत खोरी के खिलाफ वोट करने का मन बना लिया है।
अन्त में एक बात और कहना चाहँगा कि यदि कोई नया
दल भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, अत्याचार-अनाचार से लड़ने के लिए तैयार हो रहा है
तो उसका विरोध इसलिए क्यों कि हम अमुक....दल के व्यक्ति हैं इसलिए विरोध करना
हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।
मित्रों! इतना अवश्य ध्यान रखिए कि कोई भी दल
आपके हाथों में सोने के कंगन नहं पहनायेगा। आप जो कार्य कर रहे हैं वही करते
रहेंगे और अपना व अपने परिवार का पेट पालते रहेंगे।
पुराने राजनीतिक आज तक भाषणबाजी ही तो करते रहे
हैं।
जबकि अधिकांश लिप्त हैं भोली जनता को ठगने में।
एक बात मेरी समझ में अब तक नहीं आ सकी है कि जब
आप (आम आदमी पार्टी) का कोई वजूद राजनतिक दल और चैनल वाले मानने को तैयार ही
नहीं हैं तो बार-बार आप का जिक्र और चर्चाएँ क्यों की जा रही हैं। यह साबित करता
है कि आम का वजूद है और सारे दल आज भयभीत हैं आप से। भारतीयता का दम भरने वाली
धर्मविशेष की राजनीति करने वाली पार्टी और गान्धी जी की विरासत सम्भाल रही खास
पार्टी तो आज आम से खासी भयभीत दिखायी देती है। ऐसे में कुनबे पर आधारित दलों का
भले ही स्पष्टरूप से कोई विरोध न हो लेकिन भयभीत तो वो भी हैं ही। यह बात अलग है
कि उन्हें इस बात से कुछ सान्त्वना इसलिए मिलती प्रतीत हो रही है कि दो राष्ट्रीय
दलों का कुछ वोटबैंक खिसकेगा तो उसका प्रसाद शायद उनके हिस्से में भी आयेगा।
दोस्तों! मेरा किसी दलविशेष से कोई लगाव नहीं
है लेकिन इतना अवश्य है कि जो भ्रष्टाचार मुक्त शासन की बात करेगा मैं उसके साथ
हमेशा रहूँगा।
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Saturday, 15 February 2014
"बाबा नागार्जुन और डॉ.रमेश पोखरियाल 'निशंक'..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बात 1989 की है। उन दिनों बाबा नागार्जुन खटीमा प्रवास पर थे। उस समय खटीमा में डिग्री कॉलेज में श्री वाचस्पति जी हिन्दी के विभागाध्यक्ष थे। बाबा उन्हीं के यहाँ ठहरे हुए थे।
वाचस्पति जी से मेरी मित्रता होने के कारण बाबा का भरपूर सानिध्य मुझे मिला था। अपने एक महीने के खटीमा प्रवास में बाबा प्रति सप्ताह 3 दिन मेरे घर में रहते थे। वो इतने जिन्दा दिल थे कि उनसे हर विषय पर मेरी बातें हुआ करतीं थी।

मैं उन सौभाग्यशाली लोगों में से हूँ जिसे बाबा नागार्जुन ने अपनी कई कविताएँ स्वयं अपने मुखारविन्द से सुनाईं हैं। "अमल-धवल गिरि के शिखरों पर बादल को घिरते देखा है" नामक अपनी सुप्रसिद्ध कविता सुनाते हुए बाबा कहते थे- "बड़े-बड़े हिन्दी के प्राध्यापक मेरी इस कविता का अर्थ नही निकाल पाते हैं। मैंने इस कविता को कैलाश-मानसरोवर में लिखा था। झील मेरी आँखों के सामने थी। और वहाँ जो दृश्य मैंने देखा उसका आँखों देखा चित्रण इस कविता में किया है।"
जब बाबा की धुमक्कड़ी की बात चलती थी तो बाबा जयहरिखाल (लैंसडाउन-दुगड्डा का नाम लेना कभी नही भूलते थे। उन्होंने वहाँ 1984 में जहरीखाल को इंगित करके अपनी यह कविता लिखी थी-
"मानसून उतरा है
जहरीखाल की पहाड़ियों पर"
बादल भिगो गये रातों-रात
सलेटी छतों के
कच्चे-पक्के घरों को
प्रमुदित हैं गिरिजन
सोंधी भाप छोड़ रहे हैं
सीढ़ियों की
ज्यामितिक आकृतियों में
फैले हुए खेत
दूर-दूर
दूर-दूर
दीख रहे इधर-उधर
डाँड़े की दोनों ओर
दावानल दग्ध वनांचल
कहीं-कहीं डाल रही व्यवधान
चीड़ों की झुलसी पत्तियाँ
मौसम का पहला वरदान
इन तक भी पहुँचा है
जहरीखाल पर
उतरा है मानसून
भिगो गया है
रातों-रात
इनको
उनको
हमको
आपको
मौसम का पहला वरदान
पहुँचा है सभी तक"
जब भी जहरीखाल का जिक्र चलता तो बाबा एक नाम बार-बार लेते थे। वो कहते थे-"शास्त्री जी! जहरी खाल में एक लड़का मुझसे मिलने अक्सर आता था। उसका नाम कुछ रमेश निशंक करके था वगैरा-वगैरा....। वो मुझे अपनी कविताएं सुनाने आया करता था।"
उस समय तो बाबा ने जो कुछ कहा मैंने सुन लिया। मगर मन में विचार किया कि होगा कोई नवोदित!
आज जब बाबा के संस्मरण को याद करता हूँ तो बात खूब समझ में आती है।
जी हाँ! यह और कोई नही था जनाब! यह तो रमेश पोखरियाल "निशंक" थे।
कौन जानता था कि बाबा को जहरीखाल में अपनी कविता सुनाने वाला व्यक्ति एक दिन उत्तराखण्ड का माननीय मुख्यमऩ्त्री डॉ.रमेश पोखरियाल "निशंक" के नाम से जाना जायेगा।
Sunday, 12 January 2014
"मेरा गाँव मिल गया है" की समीक्षा (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
दिल का दर्पण है,
काव्य संग्रह "मेरा
गाँव मिल गया है"
आज उत्तरायणी
कौतिक मेले में खटीमा के प्रख्यात चिकित्सक डॉ.चन्द्र शेखर जोशी की काव्यपुस्तिका "मेरा गाँव मिल गया है" का विमोचन किया
गया।
दो घंटे के अल्प समय में "मेरा गाँव मिल गया है" को बाँचने का काम
करके कुछ शब्द लिखने का प्रयास किया है।
मुझे अधिकांश कविगोष्ठियों में प्रियवर चन्द्र शेखर जोशी का काव्यपाठ सुनने
का अवसर मिला है। जिसमें उनकी सहजभाव से रचित अभिव्यक्तियों का दिग्दर्शन हुआ
है। जिस बात को तुकान्त छन्द में बाँधकर प्रयास करके कहता है। उसे डॉ.चन्द्र शेखर
जोशी सीधी-सादी जबान में बिना लाग-लपेट के सहजता से व्यक्त कर देते हैं। उनकी यही
शैली उनकी लोकप्रियता में चारचाँद लगा देती है।
"मेरा
गाँव मिल गया है" के बारे में दो शब्द लिखते हुए हेमवती नन्दन बहुगुणा
स्नातकोत्तर महाविद्यालय, खटीमा के एसोसियेट प्रोफेसर (हिन्दी) डॉ.सिद्धेश्वर
सिंह कहते हैं-
“शब्द संसार में सहृदय सृजन ...डॉ.चन्द्र
शेखर जोशी चिकित्सक है, हृदयरोग विशेषज्ञ हैं और इस संग्रह की कविताओं को देखकर
निश्चिततौर पर कहा जा सकता है कि दृदय की बनावट, उसके क्रिया संकेतों, उसकी
व्याधि व निदान को तो समझते ही हैं, हृदय के मर्म और हृदय की बात को बखूबी समझते
हैं और उसे वाणी देने में भी सफल व सृजनशील हैं।“
इस काव्यसंग्रह की प्रमुख रचनाओं की
झलक इस प्रकार है।
“दुविधा” शीर्षक से रचित रचना में कवि ने
पर्वतीय बुजुर्ग का जीवन्त चित्र खींचते हुए लिखा है-
“तजुर्बा जमाने का चेहरे पर लिखे
आज राह चलते क बूबू दिखे
चूसे हुए आम सा चेहरा
आंखों तले गड्ढों का पहरा
तेज फर्राटा सड़कों पर
गांव का बूढ़ा-बहरा...”
दसौला गाँव (पहाड़ीगाँव) का दृश्य खींचते
हुए कवि लिखता है-
“पूरब के पहाड़ की
काली छाया डराती है
मेरे यहाँ
भोर-भोर नहीं आती है
यहाँ ओस
बहुत ठण्ड पीती है
लम्बा जीती है...”
एक और रचना “बूँद सी किस्मत” में कवि
लिखता है-
“मैं बूँद सी
किसम्त लिए
फिरता हूँ
कभी पत्ते पर
कभी पत्थर पर गिरता हूँ...”
हम सबकी जिन्दगी में हर साल पर्व
आते हैं मगर हम कभी उन पर अपनी व्यवहारिकता नहीं दिखाते हैं। लेकिन कवि ने अपनी सोच
को इस छोटी सी क्षणिका “लुप्तप्राय जीव” के माध्यम से कुछ इस प्रकार व्यक्त किया
है-
“जो थे
जन्मजात इमानदार
सिर्फ उनको ही
बुलाया था
जनाब!
पिछला गणतन्त्रदिस
अकेले ही मनाया था”
“जीवन संगीत” रचना में कवि कहता
है-
“दर्द सी मुस्कान का
कब किसने राज खोला
हद जब बेहद हो गयी
सुरसंग साज बोला...”
पालतू पशु “श्वान” के बारे में कवि
कहता है-
“वह चौपायी श्वान
मैं दोपाया इन्सान
जब साथ-साथ रहते
नैनै उसके, मुझसे कहते
है इन्सान, करता परेशान
तुम्हारा सन्तुलित, मौन बेईमान...”
समीक्षा की दृष्टि से मैं कृति के बारे
में इतना जरूर कहना चाहूँगा कि काव्यसंकलन "मेरा गाँव मिल गया है" में मानवता, प्रेम और हृदय की सम्वेदना मणिकांचन संगम है।
कृति पठनीय ही नही अपितु संग्रहणीय भी है और कृति में अतुकान्त काव्य का
नैसर्गिक सौन्दर्य निहित है। जो पाठकों के हृदय पर सीधा असर करता है।
मुझे पूरा विश्वास है कि यह काव्यसंग्रह सभी वर्गों के पाठकों में मानवीय सम्वेदना जगाने
में सक्षम है। इसके साथ ही मुझे आशा है कि यह "मेरा गाँव मिल गया है" समीक्षकों की दृष्टि से भी उपादेय सिद्ध होगा।
डॉ.चन्द्र शेखर जोशी द्वारा रचित "मेरा गाँव मिल गया है" काव्यसंकलन को
मार्डर्न यूटोपियन सोसायटी, जमुना मेमोरियल हास्पीटल, खटीमा (उत्तराखण्ड) द्वारा
प्रकाशित किया गया है तथा हिमालया प्रिन्टर्स, खटीमा द्वारा मुद्रित किया है। जिसमें
56 पृष्ठ है और इसका मूल्य मात्र 70/- रु. है।
पुस्तक मिलने का पता है-
मार्डर्न
यूटोपियन सोसायटी,
प्रथम तल,
जमुनामेमोरियल हास्पीटल,
खटीमा, जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड)
मो.नम्बर-09897733900,
09837783984
शुभकामनाओं के साथ!
समीक्षक
(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
कवि एवं साहित्यकार
टनकपुर-रोड, खटीमा
जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262
308
E-Mail
. roopchandrashastri@gmail.com
Website. http://uchcharan.blogspot.com/
फोन-(05943) 250129
मोबाइल-09368499921
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